US और Iran फिर आमने सामने, हमले के जवाब में तेहरान ने Bahrain और Kuwait में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर बरसाईं मिसाइलें

By नीरज कुमार दुबे | Jul 08, 2026

एक तरफ अमेरिका अपनी आजादी की 250वीं वर्षगांठ का जश्न मना रहा है, तो दूसरी तरफ ईरान अपने मारे गए सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई को अंतिम विदाई दे रहा है। लेकिन जश्न और मातम के इन दो बिल्कुल अलग दृश्यों के बीच एक बार फिर युद्ध भड़क उठा है। जिस वक्त दुनिया को उम्मीद थी कि युद्धविराम के बाद हालात संभलेंगे, उसी वक्त अमेरिका और ईरान फिर आमने सामने आ गए। दोनों देशों के बीच ताजा सैन्य टकराव ने न सिर्फ पश्चिम एशिया को फिर से बारूद के ढेर पर खड़ा कर दिया है, बल्कि पूरी दुनिया की चिंता भी बढ़ा दी है।

अमेरिका की इस कार्रवाई पर ईरान ने तीखी प्रतिक्रिया दी। तेहरान ने इसे युद्धविराम का खुला उल्लंघन बताते हुए कहा कि वह अपने राष्ट्रीय हितों और सुरक्षा की रक्षा के लिए हर जरूरी कदम उठाएगा। ईरान के संयुक्त सैन्य मुख्यालय ने अमेरिका की कार्रवाई को खुला आक्रमण करार देते हुए करारा जवाब देने की चेतावनी दी। संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकिर कालीबाफ ने कहा कि दबाव और धमकी का दौर खत्म हो चुका है और ईरान किसी भी कीमत पर झुकने वाला नहीं है।

अमेरिकी हमलों के कुछ ही घंटों बाद ईरान ने पलटवार करते हुए बहरीन और कुवैत में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। ईरानी सेना और क्रांतिकारी बलों ने दावा किया कि उन्होंने बहरीन के ईसा वायुसेना अड्डे, पांचवें नौसैनिक क्षेत्र तथा कुवैत के अली अल सलेम वायुसेना अड्डे पर मिसाइल और मानव रहित विमानों से संयुक्त हमला किया। ईरान ने यह भी दावा किया कि उसने एक अमेरिकी मानव रहित विमान को मार गिराया। इसके बाद बहरीन और कुवैत में हवाई हमले की चेतावनी देने वाले सायरन बज उठे और लोगों को तुरंत सुरक्षित स्थानों पर जाने को कहा गया। बहरीन में कई विस्फोटों की आवाजें भी सुनी गईं, जबकि कुवैत ने कहा कि उसकी वायु रक्षा प्रणाली शत्रुतापूर्ण मिसाइलों और मानव रहित विमानों को रोकने में लगी हुई है।

यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब ईरान अपने सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई को अंतिम विदाई दे रहा है। युद्ध के शुरुआती दिनों में मारे गए खामेनेई के अंतिम संस्कार को तनाव कम होने की अवधि माना जा रहा था और उम्मीद थी कि उनके दफन के बाद स्थायी समझौते पर बातचीत शुरू होगी। इस बातचीत में होरमुज जलडमरूमध्य को फिर से पूरी तरह खोलने और ईरान के विवादित परमाणु कार्यक्रम जैसे मुद्दे शामिल होने थे। लेकिन ताजा सैन्य कार्रवाई ने इन उम्मीदों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अंतिम संस्कार के दौरान बड़ी संख्या में जुटे लोगों ने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के खिलाफ नारे भी लगाए, जिससे माहौल और अधिक तनावपूर्ण हो गया।

इस बीच, होरमुज जलडमरूमध्य एक बार फिर इस पूरे संकट का सबसे संवेदनशील केंद्र बन गया है। दुनिया के कच्चे तेल और द्रवीकृत प्राकृतिक गैस का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से गुजरता है। हाल के दिनों में दो तेल वाहक जहाजों पर हमले और उनमें आग लगने की घटनाओं ने वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता पैदा कर दी है। कतर ने अपने जहाज अल रकैयात पर हुए हमले की कड़ी निंदा करते हुए इसके लिए ईरान को कानूनी रूप से जिम्मेदार ठहराया है। कतर का कहना है कि यह अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्ग की सुरक्षा और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर सीधा हमला है। वहीं ओमान के पास सऊदी ध्वज वाले एक अन्य तेल वाहक जहाज को भी नुकसान पहुंचने की खबर है।

ईरान हालांकि जहाजों पर हमलों में अपनी भूमिका से इंकार कर रहा है, लेकिन उसने यह जरूर कहा है कि जिन वाणिज्यिक जहाजों की आवाजाही उसके साथ समन्वय के बिना होगी, उन्हें जोखिम का सामना करना पड़ सकता है। अमेरिका का दावा है कि शुरुआती जांच में संकेत मिले हैं कि तीनों जहाजों पर हमला ईरान की ओर से किया गया था। यही कारण है कि वॉशिंगटन ने न केवल सैन्य कार्रवाई की बल्कि ईरानी तेल बिक्री पर फिर से प्रतिबंध लगाकर आर्थिक दबाव भी बढ़ा दिया।

इन घटनाओं का असर तुरंत अंतरराष्ट्रीय बाजार पर दिखाई दिया। अमेरिकी प्रतिबंध और सैन्य हमलों के बाद कच्चे तेल की कीमतों में दो से पांच प्रतिशत तक की तेजी दर्ज की गई। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि होरमुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही लंबे समय तक प्रभावित रही तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ेगा और तेल की कीमतें और ऊंचाई पर जा सकती हैं। इससे दुनिया भर के देशों में ईंधन महंगा होने के साथ महंगाई का नया दौर भी शुरू हो सकता है।

इस बीच, उत्तर अटलांटिक संधि संगठन यानि नाटो के प्रमुख ने अमेरिकी कार्रवाई को पूरी तरह जरूरी बताया और कहा कि ईरान युद्धविराम का उल्लंघन कर रहा था। दूसरी ओर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सहयोगी देशों की प्रतिक्रिया पर नाराजगी जताई। उनका कहना है कि उन्होंने इस संकट को अपने सहयोगियों की एकजुटता परखने के लिए एक परीक्षा की तरह इस्तेमाल किया, लेकिन कई देशों ने अमेरिकी सैन्य अभियानों में अपेक्षित सहयोग नहीं दिया। ट्रंप ने संकेत दिए कि इस घटनाक्रम ने उनके मन में पश्चिमी सैन्य गठबंधन को लेकर पहले से मौजूद संदेह और गहरा कर दिया है।

बहरहाल, पश्चिम एशिया का संकट अब केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रह गया है। इजराइल, लेबनान, गाजा, कतर, खाड़ी देश और यूरोपीय शक्तियां भी अलग-अलग स्तर पर इस संघर्ष से प्रभावित हो रही हैं। एक ओर कूटनीतिक प्रयास जारी हैं तो दूसरी ओर मिसाइल, मानव रहित विमान और सैन्य हमले लगातार शांति की संभावनाओं को कमजोर कर रहे हैं। ऐसे में अमेरिका की आजादी का जश्न और ईरान के सर्वोच्च नेता का अंतिम संस्कार इतिहास के दो अलग अध्याय नहीं बल्कि एक ही समय में लिखी जा रही उस नई कहानी के प्रतीक बन गए हैं, जिसमें युद्धविराम बेहद नाजुक है, भरोसा लगभग खत्म हो चुका है और पूरी दुनिया फिर इस आशंका से घिर गई है कि कहीं पश्चिम एशिया एक बार फिर बड़े युद्ध की आग में न झुलस जाए।

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