By नीरज कुमार दुबे | Mar 17, 2026
अमेरिका की एक पुरानी और बेहद खराब आदत रही है कि वह अपने गिरेबान में झांकने की बजाय दुनिया भर को नसीहत देने और दूसरों का आंकलन करने में आगे रहता है। इसी कड़ी में अब यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलिजियस फ्रीडम (USCIRF) नाम के अमेरिकी आयोग ने एक बार फिर भारत को लेकर पक्षपातपूर्ण और भ्रामक रिपोर्ट जारी कर दी है, जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारत की खुफिया एजेंसी पर निशाना साधने की नाकाम कोशिश की गई है।
भारत सरकार ने इस मनगढ़ंत रिपोर्ट पर कड़ी प्रतिक्रिया जताते हुए इसे साफ तौर पर खारिज कर दिया है। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने दो टूक कहा है कि यह आयोग कई वर्षों से भारत की एक विकृत और चयनित तस्वीर पेश करता रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह रिपोर्ट तथ्यों पर नहीं बल्कि संदिग्ध स्रोतों और वैचारिक एजेंडे पर आधारित है। इस तरह की लगातार गलतबयानी से आयोग की विश्वसनीयता ही कमजोर होती है।
हम आपको बता दें कि जिस आयोग ने यह रिपोर्ट जारी की है, वह खुद अमेरिका की राजनीतिक संरचना से प्रभावित है। उसके सदस्यों की नियुक्ति वहां के राष्ट्रपति और राजनीतिक नेतृत्व करते हैं, ऐसे में उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। इसके बावजूद वह दुनिया भर में धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर ज्ञान बांटने निकल पड़ता है, जबकि अपने ही देश में मंदिरों पर हमले, भारतीय समुदाय के खिलाफ बढ़ती नफरत और असहिष्णुता पर चुप्पी साधे रहता है।
अमेरिका में नस्ल के आधार पर कितना भेदभाव होता है यह किसी से छिपा नहीं है। अमेरिका में आर्थिक विषमता कितनी बढ़ती जा रही है इस बारे में वहां कोई चिंता नहीं हो रही, अमेरिका में आये दिन बच्चे से लेकर बूढ़े तक गन उठा कर दूसरों पर सरेआम फायरिंग कर दे रहे हैं, इसकी किसी को चिंता नहीं है, अमेरिका के बैंक धराशायी होते जा रहे हैं उसकी किसी को चिंता नहीं है, अमेरिका के बड़े शहरों से अक्सर ऐसे वीडियो देखने को मिलते हैं जहां लोग सड़कों पर फटेहाल अवस्था में भूखे सो रहे हैं, उसकी भी अमेरिका को चिंता नहीं है क्योंकि अपने देश के हालात को ठीक करने की बजाय अमेरिकी अधिकारी वहीं बैठे-बैठे अपने आकाओं के मन मुताबिक यह रिपोर्ट तैयार करने में व्यस्त रहते हैं कि किस देश के लोगों को कितनी धार्मिक स्वतंत्रता मिल रही है, किस देश में प्रेस को कितनी स्वतंत्रता है या किस देश में मानवाधिकारों की क्या स्थिति है आदि आदि।
हम आपको बता दें कि USCIRF की ताजा रिपोर्ट में भारत को विशेष चिंता वाला देश बताने की कोशिश की गई है और यहां तक कहा गया है कि हथियारों की बिक्री और व्यापारिक नीतियों को धार्मिक स्वतंत्रता से जोड़ा जाए। यह न केवल भारत की संप्रभुता पर सीधा हमला है बल्कि यह दर्शाता है कि अमेरिका अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों को दबाव के औजार की तरह इस्तेमाल करना चाहता है। लेकिन भारत अब वह देश नहीं है जो इस तरह के दबाव में आ जाए।
जहां तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सवाल है, यह संगठन सौ वर्षों से देश में सामाजिक समरसता, सेवा और राष्ट्र निर्माण का कार्य करता रहा है। आपदा के समय सबसे पहले मदद पहुँचाने की बात हो या समाज के कमजोर वर्गों की सतत मदद करना हो, संघ के स्वयंसेवक हमेशा अग्रिम पंक्ति में खड़े नजर आते हैं। ऐसे संगठन पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश करना न केवल हास्यास्पद है बल्कि यह भारत की जमीनी सच्चाई से पूरी तरह अनभिज्ञता को दर्शाता है।
आरएसएस के बारे में गलत टिप्पणी कर रहे अमेरिकी आयोग को यह भी जानना चाहिए कि अपनी स्थापना के समय से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने राष्ट्र निर्माण को ही अपना प्रमुख उद्देश्य रखा है। आजादी के बाद से अब तक वक्त कैसा भी रहा हो, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने कभी भी कटुता नहीं रखी क्योंकि लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं में प्रत्येक स्वयंसेवक की अटूट आस्था है। अनेक चुनौतियों का सामना करते हुए भी संघ एक विशाल वटवृक्ष की तरह अडिग रहकर राष्ट्र और समाज की निरंतर सेवा करता रहा है। लेकिन यह बात अमेरिकी आयोग की रिपोर्ट लिखने वालों को वाशिंगटन में बैठ कर समझ नहीं आयेगी। यदि उन्हें भी राष्ट्रभक्ति, निस्वार्थ समाज सेवा और अपनी संस्कृति पर गौरव करने का भाव समझना-सीखना है तो संघ की शाखाओं पर आना पड़ेगा।
इसी तरह भारत की खुफिया एजेंसी रॉ, जो देश की सुरक्षा के लिए दिन रात काम करती है, उसे भी निशाने पर लेना एक सोची समझी साजिश जैसा लगता है। यह एजेंसी देश को बाहरी खतरों से बचाने में अहम भूमिका निभाती है। उसकी कार्यप्रणाली पर सवाल उठाना उन ताकतों को बढ़ावा देना है जो भारत की स्थिरता को कमजोर करना चाहती हैं।
अमेरिकी रिपोर्ट में यह भी आरोप लगाया गया है कि भारत में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति खराब हुई है, अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जा रहा है और विभिन्न राज्यों में कानूनों को सख्त किया जा रहा है। लेकिन यह आरोप आधे अधूरे तथ्यों पर आधारित हैं। भारत जैसे विशाल और विविधता से भरे देश में कुछ घटनाओं को पूरे देश की तस्वीर बताना सरासर गलत है। यहां एक अरब से अधिक लोग हर धर्म के साथ मिलकर रहते हैं और यही इसकी असली ताकत है।
भारतीय विदेश मंत्रालय ने सही सवाल उठाया है कि अमेरिका अपने यहां मंदिरों पर हो रहे हमलों, भारतीय मूल के लोगों के खिलाफ बढ़ती हिंसा और डर के माहौल पर कब ध्यान देगा। वहां की सड़कों पर जो हालात हैं, क्या वह धार्मिक स्वतंत्रता का आदर्श उदाहरण हैं। अगर नहीं, तो फिर दूसरों को उपदेश देने का नैतिक अधिकार कैसे बनता है?
यह भी ध्यान देने वाली बात है कि यह आयोग पहले भी भारत के खिलाफ इसी तरह की रिपोर्टें जारी करता रहा है और हर बार उसे करारा जवाब मिला है। भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि उसकी लोकतांत्रिक व्यवस्था, बहुलतावादी समाज और सांस्कृतिक विविधता को कमजोर करने की कोई भी कोशिश सफल नहीं होगी। सच तो यह है कि यह पूरी कवायद भारत की बढ़ती वैश्विक ताकत से घबराहट का परिणाम है। जब कोई देश तेजी से आगे बढ़ता है, तो कुछ शक्तियां उसे रोकने के लिए इस तरह के हथकंडे अपनाती हैं। लेकिन भारत अब इन साजिशों को समझता है और मजबूती से उनका जवाब देता है।
बहरहाल, यह कहा जा सकता है कि अमेरिका को पहले अपने घर की हालत सुधारनी चाहिए, फिर दूसरों को सलाह देनी चाहिए। भारत को किसी प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं है। यह देश अपनी विविधता, सहिष्णुता और लोकतांत्रिक मूल्यों के बल पर दुनिया में अपनी अलग पहचान रखता है और आगे भी रखेगा।