वंदे मातरम् - सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की प्रथम उद्घोषणा

By अमित शाह | Nov 08, 2025

हमारे देश के इतिहास में ऐसे कई अहम पड़ाव आए, जब गीतों, कलाओं ने अलग-अलग रूपों में लोकभावनाओं को सहेजकर आंदोलन को आकार देने में अहम भूमिका निभाई। चाहे छत्रपति शिवाजी महाराज जी की सेना के युद्धगीत हों, आज़ादी के आंदोलन में सेनानियों के गान या आपातकाल के विरुद्ध युवाओं के सामूहिक गीत, गीतों ने भारतीय समाज को स्वाभिमान की प्रेरणा भी दी और एकजुट भी बनाया।


ऐसा ही है भारत का राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’, जिसका इतिहास किसी युद्धभूमि से नहीं,बल्कि एक विद्वान बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय जी के शांत लेकिन अडिग संकल्प से शुरू होता है। सन् 1875 में, जगद्धात्री पूजा (कार्तिक शुक्ल नवमी या अक्षय नवमी) के दिन, उन्होंने उस स्तोत्र की रचना की जो भारत की स्वतंत्रता का शाश्वत गीत बन गया। ‘वन्दे मातरम्’ केवल भारत का राष्ट्रीय गीत ही नहीं, सिर्फ स्वतंत्रता आन्दोलन का प्राण ही नहीं बल्कि यह बंकिमचन्द्र चटोपाध्याय जी द्वारा ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ की प्रथम उद्घोषणा है। इसने हमें याद दिलाया कि भारत केवल ज़मीन का एक टुकड़ा नहीं, बल्कि एक भू-सांस्कृतिक राष्ट्र है - जिसकी एकता उसकी संस्कृति और सभ्यता से आती है।

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जैसा कि महर्षि अरबिंद ने वर्णन किया, बंकिम आधुनिक भारत के एक ऋषि थे, जिन्होंने अपने शब्दों के माध्यम से राष्ट्र की आत्मा को पुनर्जीवित किया। अपने एक पत्र में, बंकिम बाबू ने लिखा: "मुझे कोई आपत्ति नहीं है यदि मेरे सभी कार्य गंगा में बहा दिए जाएँ। यह श्लोक ही अनंत काल तक जीवित रहेगा। यह एक महान गान होगा और लोगों के हृदय को जीत लेगा।" औपनिवेशिक भारत के सबसे अंधकारमय काल में लिखा गया, ‘वंदे मातरम्’ जागृति का प्रभात-गीत बन गया।


1896 में, रवींद्रनाथ टैगोर जी ने ‘वंदे मातरम्’ को धुन में पिरोया, जिससे इसे वाणी और अमरता प्राप्त हुई। यह गीत भाषा और क्षेत्र की सीमाओं से आगे बढ़कर पूरे देश में गूंज उठा। तमिलनाडु में सुब्रमण्यम भारती जी ने इसका तमिल अनुवाद किया और पंजाब में क्रांतिकारियों ने इसे गाते हुए ब्रिटिश राज को खुली चुनौती दी। 1905 में, बंग-भंग आंदोलन के दौरान ‘वंदेमातरम्’ के सार्वजनिक पाठ पर प्रतिबंध लगा दिया था, फिर भी, 14 अप्रैल, 1906 को बारीसाल में, हजारों लोगों ने इस आदेश की अवहेलना की। जब पुलिस ने शांतिपूर्ण सभा पर लाठीचार्ज किया, तो पुरुष और महिलाएँ सड़कों पर ‘वंदे मातरम्’ का नारा लगाते हुए लहूलुहान हो गए।


वहाँ से, ‘वंदे मातरम्’ का मंत्र, गदर पार्टी के क्रांतिकारियों के साथ कैलिफ़ोर्निया पहुँच गया, आज़ाद हिंद फ़ौज में गूँजा, जब नेताजी के सैनिक सिंगापुर से मार्च कर रहे थे और 1946 के रॉयल इंडियन नेवी की क्रांति में भी गूँजा, जब भारतीय नाविकों ने ब्रिटिश युद्धपोतों पर तिरंगा फहराया। खुदीराम बोस से लेकर अशफ़ाक़उल्ला ख़ान तक, चंद्रशेखर आजाद से लेकर तिरुपुर कुमारन तक, नारा एक ही था। यह अब सिर्फ़ एक गीत नहीं रहा; यह भारत की सामूहिक आत्मा की आवाज़ बन गया था। महात्मागांधी ने स्वयं स्वीकार किया था, ‘वंदे मातरम्’  में "सबसे सुस्त रक्त को भी जगाने की जादुई शक्ति" थी। महर्षि अरबिंद जी ने इसीलिए कहा था कि, यह "भारत के पुनर्जन्म का मंत्र" है।


26 अक्टूबर को ‘मन की बात’ कार्यक्रम में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने ‘वंदेमातरम्’ गीत के इस इतिहास की देशवासियों को फिर से याद दिलाई और राष्ट्रीय गीत ‘वंदेमातरम्’ के 150 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में 7 नवंबर से भारत सरकार की ओर से अगले एक वर्ष तक अलग-अलग कार्यक्रमों का आयोजन करने का निर्णय लिया। इन आयोजनों के माध्यम से देश भर में ‘वंदे मातरम्’ का पूर्ण गान होगा, जिससे देश की युवा पीढ़ी ‘सांस्कृतिकराष्ट्रवाद’ के विचार को आत्मसात कर पाए।


आज जब हम भारत पर्व मना रहे हैं और सरदार पटेल की जयंती पर उन्हें श्रद्धापूर्वक स्मरण कर रहे हैं, तो यह भी याद करते हैं कि कैसे सरदार साहब ने ‘एक भारत’ का निर्माण कर ‘वंदे मातरम्’ की भावना को ही मूर्त रूप दिया ‘वंदे मातरम्’ आज भी विकसित भारत 2047 के हमारे संकल्प में प्रेरणा देर हा है। अब, इस भावना को आत्मनिर्भर और श्रेष्ठ भारत में परिवर्तित करना हमारी ज़िम्मेदारी है।


‘वंदेमातरम्’ स्वतंत्रता का गीत है, अटूट संकल्प की भावना है, और भारत के जागरण का प्रथम मंत्र है। राष्ट्र की आत्मा से जन्मे शब्द कभी समाप्त नहीं होते, वे सदैव जीवित रहते हैं, पीढ़ियों तक गूंजते रहते हैं। समय आ गया है कि हम अपने इतिहास, अपनी संस्कृति, अपनी मान्यताओं और अपनी परंपराओं को भारतीयता की दृष्टि से देखें।


वंदेमातरम्!  


- अमित शाह

लेखक भारत के गृहमंत्री हैं।


(साभारः गृहमंत्री अमित शाह के ब्लॉग से)

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