Veer Bal Diwas 2025: वीर बालकों की शहादत को सच्ची श्रद्धांजलि है ‘वीर बाल दिवस’

By योगेश कुमार गोयल | Dec 26, 2025

26 दिसम्बर को गुरु गोबिंद सिंह जी के चार छोटे साहिबजादों के बलिदान की याद में ‘वीर बाल दिवस’ मनाया जाता है। इन वीर बालकों ने छोटी उम्र में ही अपने धर्म के लिए अपनी जान न्यौछावर कर दी थी। वीर बाल दिवस वही दिन है, जब साहिबजादों 9 वर्षीय जोरावर सिंह और 6 वर्षीय फतेह सिंह को मुगलों द्वारा दीवार में जिंदा चुनवा दिया गया था। गुरु गोबिंद सिंह के चारों साहिबजादों ने अन्याय के आगे सिर झुकाने के बजाय अपने देश, अपने धर्म की रक्षा के लिए हंसते-हंसते अपना बलिदान कर अपनी वीरता और अपने आदर्शों से ऐसे उदाहरण प्रस्तुत किए, जो हर किसी के लिए अनुकरणीय हैं।

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मुगल सेना द्वारा अचानक आक्रमण किए जाने पर गुरु गोबिंद सिंह को पूरे परिवार के साथ 20 दिसम्बर 1704 को कड़कड़ाती ठंड में आनंदपुर साहिब किला छोड़ना पड़ा था। किले को छोड़कर जब वे सरसा नदी को पार कर रहे थे तो नदी में पानी के तेज बहाव के कारण उनके परिवार के सदस्य एक-दूसरे से बिछुड़ गए। उनके दोनों बड़े बेटे अजीत सिंह और जुझार सिंह उनके साथ चमकौर पहुंच गए जबकि माता गुजरी तथा दोनों छोटे बेटे जोरावर सिंह और फतेह सिंह अलग हो गए, जिनके साथ गुरु गोबिंद सिंह का निजी सेवक गंगू था। गंगू माता गुजरी और दोनों साहिबजादों को उनके परिवार से मिलाने का भरोसा देकर अपने गांव सहेड़ी ले गया और चंद सोने की मोहरों के लालच में इसकी खबर सरहिंद के नवाब वजीर खान को कर दी, जिसके बाद माता गुजरी और दोनों साहिबजादों को मुगलों द्वारा गिरफ्तार कर लिया।

साहिबजादों को वजीर खान के समक्ष पेश किया गया तो उसने उन्हें सिर झुकाकर खड़ा होने और इस्लाम धर्म अपनाने को कहा लेकिन इतने छोटे होकर भी दोनों ने सिर झुकाने और इस्लाम धर्म अपनाने से इन्कार करते हुए कहा कि हम अकाल पुरख और अपने गुरु पिता के अलावा किसी और के समक्ष सिर नहीं झुकाते। वजीर खां ने दोनों बच्चों को काफी ललचाया, डराया, धमकाया लेकिन वे टस से मस नहीं हुए। आखिरकार क्रूर वजीर खान ने दोनों को दीवार में जिंदा चुनवाने का आदेश दे डाला। जब उन्हें दीवार में चुना जाने लगा तो दोनों साहिबजादे जपुजी साहिब का पाठ करने लगे। 26 दिसम्बर 1705 को फतेह सिंह और जोरावर सिंह को दीवार में जिंदा चुनवा दिया गया और इस प्रकार दोनों साहिबजादों ने अपने धर्म की खातिर हंसते-हंसते अपने प्राणों की आहुति दे दी। दोनों इतने वीर थे कि दीवार पूरी बन जाने के बाद भी अंदर से इनके जयकारा लगाने की आवाजें आती रही।

कहा जाता है कि माता गुजरी को भी सरहिंद के किले से धक्का देकर मार डाला गया था। गुरु गोबिंद सिंह को जब इस घटनाक्रम के बारे में पता चला तो उन्होंने अपनी माता और छोटे साहिबजादों की शहादत से दुखी होने और मुगलों के अत्याचारों के समक्ष घुटने टेकने के बजाय औरंगजेब को एक जफरनामा (विजय पत्र) लिखा, जिसमें उन्होंने औरंगजेब को स्पष्ट चेतावनी दी कि तुम्हारे साम्राज्य को समाप्त करने के लिए खालसा पंथ तैयार हो चुका है। गुरु गोबिंद सिंह के सबसे बड़े बेटे थे अजीत सिंह, जिन्होंने चमकौर के युद्ध में केवल 17 साल की आयु में ही मुगल फौज के छक्के छुड़ा दिए थे। तीर खत्म होने पर उन्होंने तलवार निकालकर दुश्मनों से युद्ध किया लेकिन युद्ध के दौरान तलवार टूट जाने पर वे वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी शहादत के बाद गुरु जी के दूसरे बेटे जुझार सिंह ने रणभूमि में मोर्चा संभाला और अद्भुत वीरता का प्रदर्शन करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। खेलने-कूदने की छोटी सी उम्र में गुरु गोबिंद सिंह के साहिबजादों का बलिदान आज की युवा पीढ़ी को अपने देश और धर्म से प्रेम करने और इनकी रक्षा के लिए कुछ भी कर गुजरने को तत्पर रहने का संदेश देता है।

- योगेश कुमार गोयल

(लेखक साढ़े तीन दशक से पत्रकारिता में निरंतर सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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