Tamil Nadu CM Vijay और अभिनेत्री Trisha Krishnan को लेकर नया विवाद, DMK मुखपत्र Murasoli ने जो सवाल उठाये वो आपको भी सोचने पर मजबूर करेंगे

By नीरज कुमार दुबे | Aug 18, 2026

तमिलनाडु की सियासत में स्वतंत्रता दिवस का मंच इस बार राष्ट्रध्वज, विकास और भ्रष्टाचार के मुद्दों से ज्यादा एक फिल्मी चेहरे और राजनीतिक तंज का अखाड़ा बन गया। मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के साथ अभिनेत्री त्रिशा कृष्णन की मौजूदगी को लेकर डीएमके के मुखपत्र ‘मुरासोली’ ने ऐसा हमला बोला है, जिसने सत्ता और विपक्ष के बीच पहले से गर्म राजनीतिक माहौल में एक नया मसाला डाल दिया है।

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डीएमके के आधिकारिक मुखपत्र ‘मुरासोली’, जिसकी स्थापना पूर्व मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि ने की थी, उसने सवाल उठाया कि क्या किसी आधिकारिक स्वतंत्रता दिवस समारोह में एक अभिनेत्री को इस तरह पहली पंक्ति में बैठाना और मुख्यमंत्री के साथ इस तरह सलामी का आदान-प्रदान करना उचित था। संपादकीय ने इसे लेकर बेहद तीखी भाषा का इस्तेमाल किया और कहा कि इस दृश्य को वे लोग भी स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं, जिन्होंने विजय को वोट दिया था।

‘मुरासोली’ का तंज यहीं नहीं रुका। उसने सवाल किया कि आखिर ऐसी व्यवस्था को उचित ठहराने की जरूरत ही क्यों पड़ी? अखबार ने सोशल मीडिया पर कथित तौर पर चल रहे उन संदेशों का भी हवाला दिया, जिनमें लोग लिख रहे हैं, ‘हमने आपको वोट दिया था... अब हमें वोट देने का अफसोस है।’

डीएमके ने त्रिशा प्रकरण को विजय सरकार के शुरुआती तीन महीनों की कथित बेचैनी से भी जोड़ दिया। ‘मुरासोली’ ने मुख्यमंत्री के स्वतंत्रता दिवस भाषण के उस हिस्से को निशाना बनाया, जिसमें विजय ने जनता से सरकार का साथ बनाए रखने की अपील की थी। विजय ने कहा था कि सरकार का काम अभी खत्म नहीं हुआ है और जनता आगे भी सरकार के साथ बनी रहे, तभी वह उनके लिए अच्छी योजनाओं को लागू कर पाएंगे। डीएमके ने इसी अपील को पकड़कर सवाल दागा कि अगर सरकार को अपने काम पर इतना भरोसा है तो फिर जनता से इस तरह साथ बने रहने की अपील क्यों करनी पड़ रही है?

हालांकि स्वतंत्रता दिवस के अपने संबोधन में विजय ने स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धांजलि दी और तमिलनाडु को रिश्वत तथा भ्रष्टाचार से बचाने को अपनी सरकार की प्राथमिकता बताया। उन्होंने 376 वर्ष पुराने किले में 80वें स्वतंत्रता दिवस पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने का अवसर देने के लिए जनता का आभार भी जताया।

हम आपको यह भी बता दें कि डीएमके के मुखपत्र ने विजय सरकार पर फिल्मी दुनिया से जुड़े लोगों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां देने को लेकर भी सवाल उठाए। संपादकीय में विजय की आखिरी फिल्म ‘जननायकन’ के निर्माता वेंकट नारायण, ‘बिगिल’ और ‘कोड’ की निर्माता अर्चना कल्पथी तथा ‘लियो’ के निर्माता जगदीश पलानीसामी जैसे नामों का उल्लेख किया गया।

इसके अलावा सरकार पर मंत्रियों और विधायकों के खिलाफ शिकायतों से निपटने के तरीके को लेकर भी हमला बोला गया। ‘मुरासोली’ ने एक विजय समर्थक द्वारा विधायक के खिलाफ की गई यौन शिकायत का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि शिकायतकर्ता को ही पार्टी से बाहर कर दिया गया, जबकि संबंधित मंत्री को पुलिस सुरक्षा मिली। अखबार ने सोशल मीडिया पर सरकार की आलोचना करने वालों के खिलाफ कार्रवाई और अदालतों की ओर से प्रशासन की आलोचना का भी जिक्र किया।

देखा जाये तो दिलचस्प बात यह है कि त्रिशा का नाम तमिलनाडु की राजनीति में पहली बार इस तरह नहीं उछला है। इसी महीने विधानसभा में विपक्ष के नेता उदयनिधि स्टालिन को त्रिशा को लेकर कथित दोहरे अर्थ वाले बयान के मामले में गिरफ्तार किया गया था। पुलिस ने उन पर अश्लील शब्दों के इस्तेमाल और महिला की गरिमा का अपमान करने समेत विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज किया था। डीएमके ने हालांकि उस टिप्पणी को गलत ढंग से पेश किए जाने का दावा किया और कहा कि उसका संदर्भ सरकार के कामकाज से था, किसी व्यक्ति विशेष से नहीं।

हम आपको बता दें कि विजय और त्रिशा की नजदीकियों को लेकर लंबे समय से सार्वजनिक अटकलें लगती रही हैं। मई में विजय के शपथ ग्रहण समारोह में भी त्रिशा मौजूद थीं और उस दौरान उनके भावुक होने की तस्वीरें चर्चा में आई थीं। विजय की पत्नी संगीता ने फरवरी में तलाक की याचिका दायर की थी, जिसमें मानसिक क्रूरता, भावनात्मक उपेक्षा, अलगाव और कथित विवाहेतर संबंध जैसे आरोप लगाए गए थे। हालांकि उन्होंने इस महीने याचिका वापस ले ली। इन घटनाओं के बीच त्रिशा की सार्वजनिक मौजूदगी ने स्वाभाविक रूप से राजनीतिक चर्चाओं को और हवा दी है। हालांकि इन निजी दावों और सार्वजनिक अटकलों को लेकर कोई निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

फिलहाल विजय की पार्टी टीवीके की ओर से ‘मुरासोली’ के इस तीखे हमले पर कोई जवाब सामने नहीं आया है। लेकिन संदेश साफ है कि डीएमके ने मुख्यमंत्री विजय के खिलाफ राजनीतिक मोर्चा खोल दिया है और स्वतंत्रता दिवस के मंच पर हुई एक सलामी को उसने सरकार की नीयत, लोकप्रियता और राजनीतिक शैली पर सवाल उठाने का हथियार बना दिया है।

बहरहाल, सियासत में प्रतीक कभी-कभी भाषण से ज्यादा बोलते हैं। इस बार एक सलामी ने वही काम किया है। अब देखना यह है कि विजय इसे महज विपक्ष का राजनीतिक प्रहार मानकर आगे बढ़ते हैं या इस विवाद का जवाब भी उसी धार से देते हैं, जिस धार से ‘मुरासोली’ ने हमला किया है।

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