JNU Admission Row: दिल्ली हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने Deprivation Points पॉलिसी के तहत दाखिले को दी मंजूरी

By अभिनय आकाश | Aug 18, 2026

दिल्ली हाई कोर्ट की डिवीज़न बेंच ने मंगलवार को एक अंतरिम आदेश में बदलाव किया, जिसने जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) की पोस्ट-ग्रेजुएट एडमिशन प्रक्रिया को रोक दिया था। इस बदलाव के साथ यूनिवर्सिटी को अपनी "डेप्रिवेशन पॉइंट्स" पॉलिसी के तहत एडमिशन जारी रखने की इजाज़त मिल गई है। चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की बेंच ने निर्देश दिया कि इस पॉलिसी के तहत JNU द्वारा किए गए एडमिशन, सिंगल जज के पास लंबित रिट याचिका के अंतिम फैसले के अधीन होंगे।

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बेंच ने गौर किया कि डेप्रिवेशन पॉइंट्स देने की प्रथा 1974 से चली आ रही है और पिछले हफ़्ते जारी किए गए अंतरिम आदेश ने पूरी एडमिशन प्रक्रिया को रोक दिया था। 

कोर्ट ने एडमिशन की समय-सीमा पर भी ध्यान दिया और देखा कि JNU ने 3 अप्रैल, 2026 को अपना ई-प्रोस्पेक्टस जारी किया था, एडमिशन की प्रक्रिया मई में शुरू हुई और काउंसलिंग का पहला राउंड 25 जून को खत्म हुआ। पोस्टग्रेजुएट कोर्स में एडमिशन लेने वाले छात्रों की क्लास 30 जुलाई को ही शुरू हो गई थीं।

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यह विवाद JNU के ई-प्रोस्पेक्टस के सेक्शन V से जुड़ा है, जिसके तहत उम्मीदवार 12 तक 'डेप्रिवेशन पॉइंट' (वंचित वर्ग के लिए अतिरिक्त अंक) पा सकते हैं। हर पॉइंट तीन अंकों के बराबर होता है और यह उम्मीदवार की पिछली स्कूली शिक्षा की भौगोलिक स्थिति जैसे कारकों के आधार पर दिया जाता है। सिंगल जज, जस्टिस जसमीत सिंह ने 14 अगस्त को JNU को निर्देश दिया था कि अगली सुनवाई तक डेप्रिवेशन पॉइंट के आधार पर एडमिशन को अंतिम रूप न दिया जाए। कोर्ट ने शुरुआती तौर पर पाया था कि यह तरीका CUET परीक्षा में उम्मीदवारों द्वारा प्राप्त अंकों को बदल सकता है और एक प्रतियोगी प्रवेश परीक्षा की पवित्रता को प्रभावित कर सकता है।

डिविजन बेंच के सामने JNU ने कहा कि डेप्रिवेशन-पॉइंट सिस्टम का पालन 1974 से किया जा रहा है, जिसमें समय-समय पर बदलाव किए गए हैं, और इसे यूनिवर्सिटी की एकेडमिक काउंसिल ने मंजूरी दी थी।

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JNU ने यह भी तर्क दिया कि कई एडमिशन पहले ही पूरे हो चुके थे और क्लास शुरू हो गई थीं, जबकि सिंगल जज के आदेश ने एडमिशन प्रक्रिया को असल में रोक दिया था।

याचिकाकर्ता, जो पोस्टग्रेजुएट कोर्स में एडमिशन का इच्छुक छात्र है, ने इस बदलाव का विरोध किया और कहा कि डेप्रिवेशन-पॉइंट सिस्टम उम्मीदवारों द्वारा प्राप्त CUET स्कोर को कमज़ोर करता है। डिविजन बेंच ने याचिकाकर्ता के अधिकार (locus) और चुनौती देने के समय पर भी सवाल उठाए, और देखा कि याचिका 1 जुलाई को दायर की गई थी, जबकि सिंगल जज ने इसे पहली बार 14 अगस्त को सुना था। बेंच ने कहा कि याचिकाकर्ता को चुनौती दिए गए प्रावधान के खिलाफ शुरुआती मामला (prima facie case) साबित करना होगा और संकेत दिया कि उठाए गए मुद्दों की जांच सिंगल जज द्वारा की जाएगी।

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