भूदान आंदोलन के लिए जाने जाते हैं विनोबा भावे

By प्रज्ञा पाण्डेय | Nov 15, 2019

भूदान आंदोलन के संस्थापक और गरीबों के मसीहा विनोबा भावे ने समाज के पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए बहुत से कार्य किए। संत प्रवृत्ति के विनोबा गांधी के शिष्य थे। आज ही के दिन उन महान व्यक्तित्व ने अपने प्राण त्याग दिए थे तो आइए हम आपको उनके जीवन के विविध पहलुओं से परिचित कराते हैं।

विनोबा भावे भारत के प्रसिद्ध समाज सुधारक और भूदान आंदोलन के संस्थापक थे। वह एक बहुत विद्वान और विचारशील व्यक्ति थे। इसके अलावा वह एक संत के रूप में प्रसिद्ध हुए। वह गांधी के प्रमुख शिष्यों में से एक थे। उन्होंने गीता, कुरान, रामायण और महाभारत पर गहन अध्ययन किया था। इसके अलावा उन्होंने दर्शनशास्त्र, अर्थशास्त्र तथा राजनीति शास्त्र का अध्ययन किया था। 

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विनोबा का बचपन

विनोबा भावे का जन्म गुजरात के गाहोदे में 11 सितम्बर 1895 को एक कुलीन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। विनोबा भावे का नाम विनायक नरहरि भावे था। विनोबा गांधी के विचारों से न केवल प्रभावित थे बल्कि उनके शिष्य भी थे। उन्होंने 1916 में गांधी आश्रम में शामिल होने के लिए अपनी हाई स्कूल की पढ़ाई छोड़ दी।

विनायक बहुत प्रतिभाशाली थे और गणित उनका प्रिय विषय था। बड़ौदा से स्नातक करने के बाद ही उन्होंने वैराग्य धारण करने के लिए घर छोड़ दिया और काशी चले गए। काशी में वैदिक पंड़ितों के साथ शास्त्रों का गहन अध्ययन किया। उसके बाद गांधी जी मिले और उनसे श्रम का पाठ पढ़ कर उनके साथ रहने लगे। विनोबा का 15 नवंबर 1982 को निधन हो गया।

उनका आजादी की लड़ाई में योगदान

विनोबा बहुत विद्वान थे और सच्चे देशभक्त थे। उन्होंने गांधीजी से प्रभावित होकर आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया। उन्होंने असहयोग आंदोलन में उत्साह पूर्वक हिस्सा लिया। इसके अलावा वह गांधी के खादी से बहुत प्रभावित थे। वह खुद भी चरखा कातते थे और दूसरों को भी चरखा कातने के लिए प्रेरित करते थे। स्वतंत्रता आंदोलन में विनोबा की भागीदारी से अंग्रेज बहुत कुपित हुए और उन्होंने विनोबा को जेल में डाल दिया। धुलिया जेल में रहने के दौरान कैदियों को भगवदगीता का पाठ मराठी में पढ़ाया। उनके द्वारा दिए गए भाषणों को इकट्ठा कर बात में किताब के रूप में प्रकाशित किया गया। इसके अलावा 1940 में गांधी जी ने व्यक्तिगत सत्याग्रह प्रारम्भ किया। विनोबा भावे देश के पहले व्यक्तिगत सत्याग्रही बने।

विनोबा और भूदान आंदोलन

1951 में अपनी यात्रा के दौरान तेलंगाना के पोचमपल्ली गांव में हरिजनों से मुलाकात के दौरान उन्होंने 80 एकड़ जमीन मांगी जिससे वह अपना पेट भर सकें। विनोबा के कहने पर एक जमींदार ने अपने पूरी जमीन दान में दे दी। यह देश में त्याग और अहिंसा का एक बड़ा उदाहरण था। तभी से विनोबा ने भूदान आंदोलन शुरू किया। यह आंदोलन 13 सालों तक चलता रहा। इस आंदोलन में विनोबा पूरे देश में घूमते रहे और गरीबों के लिए 44 लाख एकड़ भूमि दान के रूप में हासिल करने में सफल रहे। इस आंदोलन के दौरान मिली हुई जमीन में से 13 लाख एकड़ जमीन को भूमिहीन किसानों में बांट दिया गया। उनके भूदान आंदोलन को दुनिया भर में सराहा गया।

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सामाजिक कार्यकर्ता भी रहे विनोबा

विनोबा भावे ने सामाजिक में फैली बुराइयों को समाप्त करने के लिए बहुत प्रयास किए। गांधी जी प्रेरित होकर उन्होंने समाज के गरीब और पिछड़े तबके की भलाई के लिए भूदान आंदोलन छेड़ दिया। उन्होंने सर्वोदय शब्द को महत्व दिया जिसका अर्थ है सबका विकास। 1950 के दौरान उनके सर्वोदय आंदोलन के तहत कई कार्यक्रमों को लागू किए गए भूदान आंदोलन भी उन्हीं में से एक है।


विनोबा को मिले सम्मान

विनोबा को उनके कार्यों के लिए 1958 में पहला रेमन मैग्सेसे पुरस्कार प्रदान किया गया। इसके अलावा 1983 में मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया। 

प्रज्ञा पाण्डेय

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