By नीरज कुमार दुबे | Jun 26, 2026
साल 2024 के लोकसभा और ओडिशा विधानसभा चुनावों के दौरान वीके पांडियन का बीजू जनता दल और सत्ता के भीतर लगातार बढ़ता प्रभाव पार्टी के अनेक वरिष्ठ नेताओं को रास नहीं आ रहा था। नवीन पटनायक जिस तरह पांडियन और उनकी पत्नी सुजाता राउत कार्तिकेयन को महत्व दे रहे थे, उससे संगठन के भीतर असंतोष बढ़ने लगा था। यही वजह रही कि बीजद के कई पुराने और प्रभावशाली नेता पार्टी से दूरी बनाने लगे और अनेक नेताओं ने संगठन तक छोड़ दिया। चुनाव प्रचार के दौरान विपक्ष ने भी पांडियन के बढ़ते प्रभाव और उनकी भूमिका को बड़ा मुद्दा बनाया था। हालांकि चुनाव में हार के बाद पांडियन सक्रिय राजनीति से अलग हो गए, लेकिन नवीन पटनायक का पांडियन परिवार के प्रति भरोसा और निकटता कम नहीं हुई।
हम आपको बता दें कि साल 2000 बैच की ओडिशा कैडर की आईएएस अधिकारी रहीं सुजाता ने मार्च 2025 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली थी। वह पूर्व नौकरशाह और बीजद के प्रमुख रणनीतिकार रहे वीके पांडियन की पत्नी हैं। पांडियन ने भी अक्टूबर 2023 में सेवा से त्यागपत्र देकर राजनीति में प्रवेश किया था और बाद में बीजद के चुनाव अभियान की कमान संभाली थी। हालांकि लोकसभा और ओडिशा विधानसभा चुनाव में बीजद की हार के बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति से दूरी बना ली थी।
दूसरी ओर, सुजाता के बीजद में शामिल होने के साथ ही पार्टी के भीतर और बाहर कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गई थीं। माना जा रहा था कि उन्हें संगठन में कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जा सकती है या फिर उन्हें भविष्य के नेतृत्व के रूप में आगे बढ़ाया जा सकता है। लेकिन नवीन पटनायक ने इन सभी अटकलों को शांत करते हुए स्पष्ट कहा है कि अगले चुनाव में वही पार्टी का नेतृत्व करेंगे। उन्होंने कहा कि सुजाता केवल एक सामान्य सदस्य के रूप में पार्टी में शामिल हुई हैं और फिलहाल उन्हें कोई संगठनात्मक पद नहीं दिया जाएगा। नवीन ने यह भी कहा कि समय के साथ वह पार्टी की कार्यप्रणाली को समझेंगी और विशेष रूप से महिलाओं के लिए काम करेंगी।
वहीं पार्टी में शामिल होने के बाद सुजाता ने खुद को सौभाग्यशाली बताते हुए कहा कि उन्हें पहले प्रशासनिक अधिकारी के रूप में और अब राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में नवीन पटनायक के नेतृत्व में ओडिशा की जनता की सेवा करने का अवसर मिला है। उन्होंने भगवान जगन्नाथ का आशीर्वाद और बीजद कार्यकर्ताओं का समर्थन मिलने की बात कही तथा जनता की सेवा के लिए समर्पित रहने का संकल्प दोहराया।
हम आपको यह भी बता दें कि बीजद में शामिल होने के अगले ही दिन सुजाता ने सोशल मीडिया पर अपनी राजनीतिक सोच भी सार्वजनिक की। उन्होंने कहा कि राजनीति का भविष्य “मैं” नहीं बल्कि “हम” में है। उन्होंने कहा, “मैं” व्यक्तिवाद, सत्ता के केंद्रीकरण और व्यक्तिगत श्रेय की राजनीति को बढ़ावा देता है, जबकि “हम” टीम भावना, साझा जिम्मेदारी और लोगों को राजनीति से ऊपर रखने की सोच का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि “हम” की राजनीति लोगों को जोड़ती है जबकि “मैं” की राजनीति विभाजन पैदा करती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उनके इस बयान का उद्देश्य पार्टी के भीतर मौजूद आशंकाओं और विरोध को कम करना था।
दरअसल, बीजद के भीतर सुजाता की एंट्री को लेकर एकमत स्थिति नहीं दिखी। जहां कई नेताओं ने उनका स्वागत किया, वहीं कुछ वरिष्ठ नेता कार्यक्रम से अनुपस्थित रहे। इनमें विधानसभा में बीजद के उपनेता प्रसन्न आचार्य, वरिष्ठ विधायक रणेंद्र प्रताप स्वाइन, पूर्व मंत्री बद्री नारायण पात्र और वरिष्ठ नेता प्रणब प्रकाश दास शामिल थे। पार्टी के एक वर्ग को आशंका है कि सुजाता के आने से पांडियन का प्रभाव फिर से बढ़ सकता है। हम आपको याद दिला दें कि साल 2024 के चुनाव में भाजपा ने पांडियन के प्रभाव और उनके तमिल मूल को प्रमुख मुद्दा बनाया था। बीजद की हार के बाद पार्टी के भीतर भी यह चर्चा तेज हुई थी कि पांडियन की शैली ने संगठन को नुकसान पहुंचाया।
हालांकि सुजाता का राजनीतिक और सामाजिक परिचय पांडियन से अलग माना जा रहा है। वह ओडिशा के केंद्रपाड़ा जिले की रहने वाली हैं, जिसे बीजू पटनायक की कर्मभूमि माना जाता है। यही कारण है कि राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि उनका ओडिया चेहरा बीजद को उस आलोचना से राहत दिला सकता है, जिसका सामना पार्टी को पांडियन के कारण करना पड़ा था।
हम आपको यह भी बता दें कि प्रशासनिक सेवा में रहते हुए सुजाता ने कई जनकल्याणकारी योजनाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सुंदरगढ़ में आदिवासी छात्राओं के लिए साइकिल योजना शुरू करने, मध्याह्न भोजन में अंडे शामिल कर पोषण स्तर सुधारने, ममता योजना को आगे बढ़ाने और विशेष रूप से मिशन शक्ति के विस्तार में उनका योगदान उल्लेखनीय माना जाता है। उनके नेतृत्व में महिला स्वयं सहायता समूहों का नेटवर्क लगभग सत्तर लाख महिलाओं तक पहुंचा, जो बाद में बीजद के सबसे मजबूत सामाजिक आधारों में शामिल हुआ।
उधर, भाजपा ने इस पूरे घटनाक्रम को बीजद का आंतरिक मामला बताया है। भाजपा महिला मोर्चा की प्रदेश अध्यक्ष ऐश्वर्या बिस्वाल ने कहा कि सुजाता के शामिल होने से भाजपा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। देखा जाये तो फिलहाल बीजद के सामने सबसे बड़ी चुनौती चुनावी हार के बाद संगठन को दोबारा मजबूत करना है। पार्टी से कई नेताओं के जाने और कार्यकर्ताओं में निराशा के बीच सुजाता की एंट्री को बीजद के पुनर्गठन की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि अभी उन्हें कोई बड़ा पद नहीं दिया गया है, लेकिन उनकी प्रशासनिक छवि, महिलाओं के बीच प्रभाव और नवीन पटनायक के करीबी दायरे से जुड़ाव के कारण उनकी भविष्य की भूमिका पर चर्चाएं जारी हैं।
बहरहाल, राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सुजाता का प्रवेश बीजद के लिए तत्काल दो संदेश देता है। एक तो यह कि पार्टी अब भी नवीन पटनायक के भरोसेमंद लोगों के हाथ में है। दूसरा यह कि बीजद अपनी पुरानी कल्याणकारी और महिला केंद्रित राजनीति को फिर से मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहती है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सुजाता केवल संगठनात्मक सहयोग तक सीमित रहती हैं या ओडिशा की राजनीति में एक प्रमुख राजनीतिक चेहरा बनकर उभरती हैं।
-नीरज कुमार दुबे