अमेरिका-ईरान समझौते से पहले उभरते विरोध के स्वर

By डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा | Jun 17, 2026

हांलाकि अमेरिका-ईरान के बीच सीजफायर समझौते पर राजी होने के समाचार से दुनिया के देशों ने राहत की सांस ली है पर समझौता कितने दिन चलेगा और इसके साइड इफेक्ट क्या होंगे, इसे लेकर अभी से कयास लगने आरंभ हो गए हैं। इजरायल ने जहां सीज फायर समझौते से अभी तक तो अपने को अलग कर लिया हैं वहीं मिडिल ईस्ट फोरम ने समझौते की शर्तों को लेकर जो प्रतिक्रिया दी है उसे भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं माना जा सकता। एक बात यह भी साफ हो जानी चाहिए कि जो मैसेज दुनिया के देशों के सामने गया है वह साफ है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप युद्ध से गले तक भर आये हैं और अब सवाल इज्जत बचाने का रह गया है। अमेरिका में मध्यावधि चुनाव भी जल्दी ही होने हैं। इसके अलावा दुनिया के अन्य देशों की तो छोड़ो अमेरिकियों का ही ट्रंप पर भरोसा नहीं रहा है। अमेरिका में ट्रंप की रेंकिंग लगातार नीचे जा रही है। ट्रंप भले ही अपने 80 वें जन्मदिन पर युद्ध विराम की बात कर रहे हो पर यदि निष्पक्ष विष्लेषण किया जाए तो इस युद्ध में अमेरिका ने खोया ही खोया है। ट्रंप ने अपनी क्रेडिट रेंकिंग खोई है तो निर्णय लेने से पहले उसके परिणामों को लेकर गंभीर नहीं होना देखा गया है। हांलाकि समूची दुनिया विष्व शांति चाहती है और सभी चाहते हैं कि युद्ध विराम जल्दी से जल्दी हो। पर एक बात और साफ हो जानी चाहिए कि ईरान के तेवर अभी तक तीखे है और वह कुछ खोना नहीं चाहता। 

अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि यह वहीं पाकिस्तान है जिसने तालीबान के मामलें में दुनिया को धोखा दिया वहीं ओसामा बिन लादेन को शरण दी। वैसे भी पाकिस्तान को आंतक को पनाह देने वाला देश माना जाता है। अब अमेरिका और अरब देश ईरान के पुननिर्माण के लिए करीब 300 अरब डॉलर देंगे। ईंधन की आपूर्ति बाधित होने से 146 देशों को ईंधन के दाम बढ़ाने पड़े और इसका सीधा सीधा असर इन देशों के नागरिकों पर पड़ा। देखा जाए तो 108 दिन बर्बादी के बाद कहीं जाकर अमेरिका-ईरान समझौते की लिए राजी हुए हैं पर अमेरिका का एक साथी और युद्ध में संलग्न इजरायल ने इस समझौते को सीरे से खारिज कर दिया है। बल्कि समझौता प्रयासों के दौरान ही लेबनान पर हमले तेज ही किये हैं। इजरायल किसी भी हालत में ईरान को परमाणु संपन्न देश नहीं चाहता। अब अमेरिका इजरायल के बीच संबंधों में बिगाड़ के आसार भी साफ दिखने लगे हैं। यह भी कयास लगाये जाने लगे हैं कि खाड़ी के देश अमेरिका से संबंधों पर नए सिरे से विचार करें। अभी तो समझौते पर हस्ताक्षर भी जेनेवा में 19 जून को होना है। 

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मिडिल इस्ट फोरम के पॉलिसी एनालिसिस निदेशक माइकल रुबिन की तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है और उनका मानना है कि इससे मध्य पूर्व में नए संघर्ष के हालात बनेंगे। पश्चिमी एशिया में संघर्ष की राह प्रशस्त होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि युद्ध विराम समझौते से ईरान लाभ में रहने वाला है। उसे पुननिर्माण के लिए अच्छी खासी सहायता राशि मिलेगी। दूसरी यह भी एक प्रतिक्रिया आई है कि जिस तरह से द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति रुजवेल्ट ने  जर्मनी से निपटने के लिए फासीवादी इटली पर भरोसा कर समझौता किया था। 

खैर इतना तो तय है कि दुनिया के देश युद्ध से तंग आ गए हैं। तत्काल युद्ध बंद होना चाहिए यह सभी चाहते हैं। दुनिया के किसी भी कोने में युद्ध के हालात नहीं बनने चाहिए। अमेरिका-ईरान युद्ध ने समूची दुनिया को प्रभावित किया है। ईंधन की आपूर्ति बाधित होने से हालात खराब हुए हैं और आने वाले समय में दुनिया के देशों को होर्मुज का वैकल्पिक रास्ता भी खोजना ही पड़ेगा क्योंकि ईंधन यानी के तेल और एलपीजी की निर्भरता अधिकांश देशों की है और रास्ता रोकना या फिर टोल लगाना किसी दादागिरी से कम नहीं हैं। ऐसे में अमेरिका ईरान युद्ध से दुनिया के देशों को सबक लेना होगा। समझौते में स्थायित्व होना और इजरायल को भी समझौते की टेबल पर लाने के प्रयास किये जाते हैं तो परिणाम सकारात्मक प्राप्त हो सकते हैं नहीं तो इजरायल और लेबनान व अन्य देशों के बीच तनाव व संघर्ष के हालात बने ही रहेंगे और उसके परिणाम अच्छे नहीं हो सकतें। अब लोगों की निगाह 19 जून पर जेनेवा में समझौते पर हस्ताक्षर होने और समझौते की सभी पक्षों द्वारा ईमानदारी से पालना करने पर टिकी हुई हैं। इजरायल को भी समझौते की टेबल पर लाना होगा नहीं तो पश्चिम एशिया में शांति के हालात बनना मुश्किल ही रहेंगे। भले ही मजबूरी या अपनी साख बचाये रखने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति ने शांति की पहल की है इसे सफल होना ही होगा। 

- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

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