By नीरज कुमार दुबे | Jul 30, 2026
पंजाब विधानसभा चुनावों से पहले राज्य की राजनीति में एक नया नैरेटिव गढ़ने की कोशिश तेज होती दिखाई दे रही है। सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक ऐसा माहौल बनाने का प्रयास हो रहा है कि कट्टरपंथी राजनीति को जनभावना का पर्याय बना दिया जाए। इसी कड़ी में एक दिन पहले चंडीगढ़ में हुए प्रदर्शन ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या लोकतांत्रिक विरोध के नाम पर कानून व्यवस्था को चुनौती देना और युवाओं को उग्र राजनीति की ओर धकेलना पंजाब के भविष्य के लिए शुभ संकेत है? देखा जाये तो राज्य के लोगों को बेहद सतर्क रहने की जरूरत है, क्योंकि चुनावी जमीन तैयार करने के लिए भावनात्मक मुद्दों को हथियार बनाया जा रहा है।
हम आपको बता दें कि यह प्रदर्शन वारिस पंजाब दे के सांसद अमृतपाल सिंह और अन्य सिख नेताओं की रिहाई की मांग को लेकर आयोजित किया गया था। प्रदर्शनकारी पंजाब के राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया और मुख्यमंत्री भगवंत मान के आवास की ओर मार्च करना चाहते थे, लेकिन चंडीगढ़-मोहाली सीमा पर भारी पुलिस बल और बैरिकेडिंग के कारण उन्हें रोक दिया गया। इसके बाद प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच टकराव की स्थिति बन गई और माहौल लंबे समय तक तनावपूर्ण बना रहा।
हालांकि इस पूरे आंदोलन को केवल एक रिहाई अभियान के रूप में देखना बड़ी भूल होगी। इसके पीछे कहीं अधिक व्यापक राजनीतिक रणनीति दिखाई देती है। अमृतपाल सिंह 2024 के लोकसभा चुनाव में खडूर साहिब से निर्दलीय सांसद चुने गए थे और अब वारिस पंजाब दे ने उन्हें 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव के लिए मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित कर दिया है। ऐसे में लगातार हो रहे प्रदर्शन उनके राजनीतिक प्रभाव को जीवित रखने और उन्हें राज्य की राजनीति के केंद्र में बनाए रखने की कोशिश के रूप में देखे जा रहे हैं।
वारिस पंजाब दे का दावा है कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत अमृतपाल सिंह की निरोधात्मक हिरासत समाप्त हो चुकी है, इसलिए उन्हें रिहा किया जाना चाहिए। लेकिन दूसरी ओर सरकार और अदालतों का कहना है कि 2023 के अजनाला पुलिस स्टेशन हमले समेत कई गंभीर आपराधिक मामलों के कारण उनकी हिरासत जारी है और उन्हें अस्थायी राहत देना राज्य की सुरक्षा के लिए खतरा हो सकता है। यही वजह है कि उनकी रिहाई संबंधी याचिकाओं को लगातार खारिज किया गया है।
इस आंदोलन का एक दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि अमृतपाल सिंह की रिहाई की मांग को तथाकथित "बंदी सिंह" के मुद्दे से जोड़कर व्यापक धार्मिक और भावनात्मक समर्थन जुटाने का प्रयास किया जा रहा है। इससे आंदोलन को केवल एक व्यक्ति तक सीमित रखने की बजाय उसे व्यापक पंथिक विमर्श का रूप देने की रणनीति अपनाई गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इससे संगठन पारंपरिक सिख राजनीति पर अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है।
यही वह बिंदु है जहां वारिस पंजाब दे की विचारधारा और उसकी कार्यशैली पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं। लोकतंत्र में किसी भी नागरिक या संगठन को शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार है, लेकिन यदि आंदोलन का स्वरूप लगातार टकराव, उग्र नारों, कानून व्यवस्था को चुनौती देने और युवाओं में व्यवस्था-विरोधी मानसिकता को बढ़ावा देने वाला बन जाए, तो यह केवल राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का विषय नहीं रह जाता। ऐसी राजनीति समाज में ध्रुवीकरण बढ़ा सकती है और पंजाब जैसे संवेदनशील राज्य को फिर से वैचारिक अस्थिरता की ओर धकेलने का खतरा पैदा कर सकती है।
राजनीतिक दृष्टि से भी यह आंदोलन कई संदेश देता है। एक ओर यह आम आदमी पार्टी सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश है ताकि किसी भी सख्त कार्रवाई को "सिख विरोधी" करार दिया जा सके, वहीं दूसरी ओर यह शिरोमणि अकाली दल के पारंपरिक पंथिक वोट बैंक में सेंध लगाने की रणनीति भी माना जा रहा है। लगातार सड़क पर उतरकर संगठन अपने समर्थकों को यह संदेश देना चाहता है कि वह स्वयं को पंजाब की नई राजनीतिक ताकत के रूप में स्थापित करने की तैयारी में है।
बहरहाल, पंजाब के मतदाताओं के सामने आने वाले समय में सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वे भावनात्मक नारों और उग्र राजनीति की बजाय राज्य के विकास, रोजगार, शिक्षा, नशे की समस्या और कानून व्यवस्था जैसे वास्तविक मुद्दों को प्राथमिकता दें। लोकतंत्र में असहमति आवश्यक है, लेकिन यदि चुनावी लाभ के लिए कट्टरपंथी सोच और टकराव की राजनीति को सामान्य बनाने की कोशिश की जाती है, तो उसका नुकसान पूरे समाज को उठाना पड़ सकता है। इसलिए पंजाब के लोगों को हर राजनीतिक नैरेटिव का गंभीरता से मूल्यांकन करना होगा और ऐसे किसी भी प्रयास से सतर्क रहना होगा जो समाज को बांटने या युवाओं को उग्र विचारधारा की ओर मोड़ने का माध्यम बन सकता है।
-नीरज कुमार दुबे