साक्षात्कार- प्रकृति की ज़रूरतों को हमने पीछे छोड़ दिया हैः जल पुरुष राजेन्द्र सिंह

By डॉ. रमेश ठाकुर | Oct 31, 2020

लॉकडाउन में मानवीय हरकतें थमने के बाद प्रकृति चारों ओर इठलाने और चहकने लगी थी। गंगा से लेकर आकाश सभी साफ पानी की तरह चमक रहे थे। लेकिन अब फिर से मानवीय हिमाकतों ने प्रकृति की सुंदरता में जहर घोल दिया है। प्रदूषण की चादर हर जगह फैल गई है। नदियों तालाबों में साफ दिखने वाला पाली फिर मैला हो गया है। दूषित पर्यावरण को देखकर जल पुरूष कहे जाने वाले देश के प्रसिद्ध पर्यावरणविद राजेंद्र सिंह खासे दुखी हैं। पानी को बचाने के लिए उन्होंने क्या कुछ नहीं किया, हम कभी नहीं भूल सकते। विभिन्न पर्यावर्णीय मसलों पर उनसे डॉ. रमेश ठाकुर ने विस्तृत बातचीत की। पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश-

उत्तर- इंसान खुद को प्रकृति से बड़ा समझने लगा है। विरासतों को पीछे छोड़कर विज्ञान से निर्मित वस्तुओं को जबसे अपनाना शुरू किया है, चीजें तभी से बदलनी आरंभ हो गई हैं। लॉकडाउन के दौरान मानवीय हलचलें बंद थीं, तो प्रकृति इठलाने लगी थी, नदी, नाले, तालाब, आकाश सभी पानी की तरह साफ दिखने लगे थे। लेकिन अब फिर से हमने प्रकृति को दूषित कर दिया। मैंने बापू की सीख से पर्यावरण को सुरक्षित करने के लिए यात्राएं चलाना आरंभ किया था। स्थानीय लोगों में चेतना जगाकर ग्राम सभा व नदी संसद द्वारा लोगों को अपना काम करने के लिए श्रमनिष्ठ बनाना आरंभ किया। लेकिन सरकार और सिस्टम को शायद मेरा प्रयास ज्यादा पसंद नहीं?

प्रश्न- धरोहरों को सहेजने और पानी को बचाने के आपके प्रयास काबिलेतारीफ हैं, तो भला हुकूमतों को क्यों दिक्कतें होती हैं?

उत्तर- धरती का सीना फाड़कर पानी निकाल कर गगनचुंबी इमारतों का निर्माण कराना, कोला-ठंडा के लिए पानी का खुले आम दोहन करना, ये सब सरकारों की मिली भगत से होता है। इस अनैतिक काम के लिए कंपनियां सरकारों को मोटा कमीशन देती हैं। लेकिन सरकार में बैठे लोग आने वाली पीढ़ियों का जरा भी ख्याल नहीं रखती। उन्हें शर्म आनी चाहिए वह उनके हिस्से का पानी ब्लैक करती हैं। पर्यावरण और पानी को बचाने के लिए हमें सामूहिक रूप से श्रमनिष्ठ होना होगा। साथ ही अपने को स्मरण कराके कल को बचाने के लिए आगे आना होगा।

प्रश्न- महात्मा गांधी ने भी इंसानों को प्रकृति से लगाव रखने को कहा था, उसे भी पीछे छोड़ दिया?

उत्तर- ऐसा प्रतीत होता है जैसे बापू के संदेशों को आधुनिक काल ने नकार दिया हो। उन्होंने कहा था कि ‘ये प्रकृति सबकी जरूरत पूरी कर सकती है लेकिन लालच किसी एक का भी पूरा नहीं कर सकती’। उनके बताए रास्तों को हम त्यागने जा रहे हैं। उसका ख़ामियाज़ा भी भुगत रहे हैं। पानी को बचाने के लिए मैंने ‘सत्याग्रह’ आंदोलन किया था। उसके बाद केंद्र सरकार चेती और गंगा की सफाई करने का निर्णय लिया। मेरी सरकार से मांग है कि यमुना, गंगा, घाघरा जैसे सभी बड़ी नदियों की सफाई और उन्हें सहेजने के लिए भी प्रयास किए जाएं।

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प्रश्न- आपको जल पुरूष कहा जाता है, अपने जीवन परिचय के विषय में कुछ बताएं?

उत्तर- पानी को बचाने के लिए पूरा जीवन समर्पित किया हुआ है। जीवन खुली किताब जैसा है। देखिए, मेरा बचपन और तरुणाई बापू, विनोबा, जयप्रकाश के प्रकाश में ही बीता था। युवा काल चिकित्सा-शिक्षा और सरकारी सेवा में बीता। संपूर्ण युवा जीवन में बापू की सीख-जीवन का संदेश बन गई। मन में बस एक ही संकल्प हुआ, स्वयं काम किए बिना नहीं बोलेंगे। हमने पहले समझा, सहेजा, फिर रचना और सत्याग्रह करने का काम किया। यही मेरे जीवन के चार कदम बन गए। इन कदमों से हमारा प्रेम, विश्वास ही विश्व सत्य सिद्धांत बन गया था। इसमें जो भी बाधक बना, उससे पहले संवाद से बीच का रास्ता निकालने का प्रयास किया। फिर अपना सत्य पकड़ा और उसी पर अड़ गए। उसमें सिद्धी पाने तक उसे छोड़ा नहीं। सदैव सिद्धी मिली। खनन रोकना हो या गंगा की अविरलता-निर्मलता का गंगा सत्याग्रह हो इसमें कदम दर कदम हम आगे बढ़ रहे हैं। प्रकृति और मानवता के लिए शुभ कार्य करने वालों को दुनियाभर में ढूँढ़-ढूँढ़ कर उन्हें सम्मानित व उनके कार्यों को प्रतिष्ठित करने में जुट रहे हैं। 

प्रश्न- आप हिंद स्वराज और आधुनिक में कितना फर्क समझते हैं?

उत्तर- दोनों में धरती आसमान जैसा अंतर है। बापू हमेशा आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक व आध्यात्मिक क्रांति को विज्ञान के साथ जोड़ने की बात करते थे। लेकिन आज हम पूर्ण रूप से विज्ञान पर ही निर्भर हो गए हैं। हिंद स्वराज पीछे छूटता जा रहा है। उन्होंने हमें तकनीकी इंजीनियरिंग के खतरे बताकर भी हमें सचेत किया था। सही मायनों में उनका संपूर्ण जीवन दर्शन समाज के लिए संदेशवाहक है। बापू का सत्य मेरा भगवान है। इसके साथ अहिंसामय रास्ता ही जोड़ा जा सकता है। इसी विश्वास को बापू ने पैदा किया था। मैंने उसी विश्वास में अब श्रद्धा और आस्था पैदा कर ली है। यही विचार मेरा ईष्ट बन गया है। यही सत्याग्रह की शक्ति मुझे सदैव ऊर्जा प्रदान करती है। 

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प्रश्न- आप सरकारों के पर्यावरण संरक्षण और नदियों को बचाने के प्रयासों से संतुष्ट हैं?

उत्तर- अगर संतुष्ट होते तो हमें क्यों बीड़ा उठाना पड़ता। क्यों पानी को सहेजने के लिए सत्याग्रह आंदोलन करना पड़ता। हमारा पानी हमें ही उचित कीमतों में बेचा जा रहा है। कोला कंपनियां हमारा पानी हमें ही बेच रही हैं। क्या ये सिस्टम को नहीं पता है। पता है लेकिन वह जानबूझकर कोई एक्शन नहीं ले सकती। पानी को बेचने का सौदा उनके द्वारा ही किया जाता है।

-डॉ. रमेश ठाकुर के साथ बातचीत में जैसा जल पुरूष राजेंद्र सिंह ने कहा।

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