स्त्री पुरुष का भेद समझने के लिए अर्धनारीश्वर रूपी भगवान शिव की महिमा को समझना होगा

By शुभा दुबे | Mar 05, 2025

पुरातन काल में तत्ववेत्ताओं ने शिव और पार्वती के एक सम्मिलित रूप की कल्पना की। जिसमें आधा शिव और आधा पार्वती, दोनों भाग मिलकर एक पूर्ण व्यक्ति बनता है जिसे अर्धनारीश्वर कहा गया। स्त्री पुरुष का भेद समझने के लिए अर्धनारीश्वर रूपी भगवान शिव की महिमा को समझना होगा। स्त्री पुरुष की पूरक है और पुरुष की पूरक स्त्री है। अर्थात बिना पुरुष के स्त्री अधूरी है और बिना स्त्री के पुरुष अधूरा है। भगवान अर्धनारीश्वर शिव के शरीर का दाहिना भाग नीलवर्ण का और बायां भाग प्रवाल अर्थात मूंगे की कान्ति के समान लाल वर्ण का है। उनके तीन नेत्र सुशोभित हैं। वे वाम भाग के हाथों में पाश और लाल कमल धारण किये हैं। उनकी दाहिनी ओर के दो हाथों में त्रिशूल और कपाल स्थित है। एक ही शरीर में बायीं ओर भगवती पार्वती और दायीं ओर भगवान शंकर का स्वरूप है। उनके अंगों में अलग−अलग आभूषण सुशोभित हैं, मस्तक के ऊपर बालचंद्र और मुकुट है।

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फिर ब्रह्मा जी भगवान शिव से पृथक हुई पराशक्ति को प्रणाम करके उनसे प्रार्थना करने लगे। ब्रह्मा जी ने कहा− शिवे! सृष्टि प्रारम्भ में आपके पति देवाधिदेव परमात्मा शम्भु ने मेरी सृष्टि की और उन्होंने मुझे सृष्टि रचने का आदेश दिया था। शिवे! तब मैंने देवता आदि समस्त प्रजाओं की मानसिक सृष्टि की, परन्तु बार−बार रचना करने पर भी उनकी वृद्धि नहीं हो रही है। अतः अब मैं स्त्री पुरुष के समागम के द्वारा सृष्टि का निर्माण करके प्रजाओं की वृद्धि करना चाहता हूं, किंतु अभी तक आपसे अक्षय नारी कुल का प्राकट्य नहीं हुआ है। नारी कुल की सृष्टि करना मेरी शक्ति से बाहर है। सारी सृष्टियों का उद्गम स्थान आपके सिवाय कोई नहीं है। इसलिए मैं आपसे प्रार्थना करता हूं। आप मुझे नारीकुल की सृष्टि करने की शक्ति प्रदान करें। इसी में जगत का कल्याण निहित है। हे वरदेश्वरी! मैं आपके चरणों में बार−बार प्रणाम करके आपसे एक और प्रार्थना करता हूं। आप समस्त जगत के कल्याण के लिए तथा वृद्धि के लिए मेरे पुत्र दक्ष की पुत्री होकर अवतार ग्रहण करें। ब्रह्मा जी के द्वारा इस प्रकार प्रार्थना करने पर शिवा ने तथास्तु ऐसा ही होगा कह कर उन्हें नारीकुल की सृष्टि करने की शक्ति प्रदान की।

उसके बाद माता ने अपनी भौहों के मध्यभाग से अपने ही समान प्रभावाली एक शक्ति की रचना की। उस शक्ति को देखकर कृपासागर भगवान शंकर जगदम्बा से बोले− देवि! ब्रह्मा जी ने कठोर तपस्या से तुम्हारी आराधना की है। अतः तुम उन पर प्रसन्न हो जाओ और उनका संपूर्ण मनोरथ पूर्ण करो। भगवान शंकर के आदेश को शिवा देवी ने सिर झुकाकर स्वीकार किया और ब्रह्मा जी के कथनानुसार दक्ष की पुत्री होने का वचन दिया। इस प्रकार शिवा देवी ब्रह्मा जी को सृष्टि रचना की अनुपम शक्ति प्रदान करके शम्भु के शरीर में प्रविष्ट हो गयीं। इसके बाद भगवान शंकर भी अंतर्ध्यान हो गये। तभी से इस लोक में स्त्री भाग की कल्पना हुई और सृष्टि प्रारम्भ हुई।

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