By संतोष उत्सुक | Dec 07, 2021
सर्दी की जल्दी उतरती शाम में सैर के कुछ शौक़ीन बंदे अभी पार्क में टहल रहे थे। साथ घूम रही पत्नी ने मुझे दिखाया, दूर क्यारी में खड़ी एक गाय पौधे खा रही है। गाय के पास खड़े व्यक्ति मोबाइल से फोटो खींच रहे हैं, कुछ जाने पहचाने लगे, हमें नज़दीक आते देखकर कहने लगे, ‘हम अभी वह्ट्सैप करते हैं, यहां का चौकीदार सही तरीके से अपनी ड्यूटी नहीं कर रहा है’। सर, वह्ट्सैप पर तो लोग मज़े ही लेंगे, तब तक गाय काफी पौधे चर लेगी मैंने कहा। जवाब आया आप पहले चौकीदार को ढूंढिए फिर घूमिए। वे वह्ट्सैप ही निपटाने लगे, इस बीच मैंने गाय को क्यारी से बाहर हांक दिया और कोशिश की तो चौकीदार भी मिल गए। वे भी अपने कमरे में मोबाइल पर खेल खेल रहे थे, बंद करते करते बोले, अभी थोड़ी देर पहले पूरे बाग़ का चक्कर लगा कर आया हूं, गाय यहां नहीं थी। किसी सैर करने वाले ने गेट ज्यादा खोल दिया होगा। उन्होंने ड्यूटी करते हुए गाय को पार्क से निकाल बाहर किया।
हमने उनसे कहा, बड़े लोगों की बड़ी बातें, ज़्यादा बड़े लोगों की ज्यादा बड़ी बातें और से सबसे बड़े लोगों की केवल बातें ही बातें। हमारी बातों से वे खुश हो गए बोले, वह्ट्सैप ईष्टपूजा का नया रूप है, हम तो ब्रह्म मुहर्त में ही ‘क्या क्या’ करना शुरू कर देते हैं और रात के बारह बजे तक प्रसाद बांटते रहते हैं। एक व्यक्ति कितनी ही जगह बतिया सकता है। वह्ट्सैप ने बातचीत में जान डाल रखी है। आपने सामने बैठकर बतियाना फ़िज़ूल हो गया है। तरक्की की जय हो, वह्ट्सैप की ज्यादा जय हो।
- संतोष उत्सुक