बंगाल की जनता ने स्पष्ट बहुमत वाली सरकार के साथ ही मजबूत विपक्ष को भी चुना है

By प्रवीण गुगनानी | May 03, 2021

पिछले वर्षों में संपूर्ण भारत में तुष्टिकरण की राजनीति की राजधानी बनकर कोई राज्य उभरकर आया है तो वह राज्य है पश्चिम बंगाल! तुष्टिकरण की राजनीति की प्रयोगशाला या राजधानी बनकर उभरा पश्चिम बंगाल इस घृणित राजनीति की एक बड़ी कीमत चुका बैठा है व आगामी दिनों में भी चुकाएगा यह स्पष्ट दिख गया है इस विधानसभा चुनाव के परिणाम में। अंततः ममता बनर्जी की तृणमूल पुनः पश्चिम बंगाल में सत्ता संभाल रही है व भाजपा वहां एक सुदृढ़ विपक्ष की भूमिका निभाने जा रही है। यह दुखद ही है की ममता बनर्जी का पुनः सत्तारुढ़ होना इस बात का परिचायक ही कहलायेगा कि बंगाल की जनता को तृणमूल की मुस्लिम राजनीति पसंद आ गई है। किंतु, दूसरा पक्ष यह भी है कि भाजपा को मिले लगभग सौ विधायक ममता की तानाशाही व मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति के विरुद्ध एक जनमत भी है और राष्ट्रनायक नरेंद्रभाई मोदी की विकास की राजनीति के पक्ष में एक सशक्त्त स्वर भी।

स्पष्ट है कि भाजपा इस चुनाव में बंगाल में सरकार बनाने का अपना लक्ष्य तो प्राप्त नहीं कर पाई किंतु पश्चिम बंगाल में तुष्टिकरण की राजनीति की बलि चढ़ाने में अवश्य सफल हो गई है। विगत दस वर्षों में जो ममता बनर्जी किसी मंदिर, मठ, आश्रम में जाते आते नहीं दिखीं, सतत निरंतर मुस्लिमों के भेष में, उनकी ही भाषा बोलते नजर आती थीं वही ममता मंदिरों और पुजारियों के आसपास चक्कर लगाते दिखने लगी थीं। ममता बनर्जी के बड़े खासमखास सिपहसलार, उनके मंत्री, कोलकाता के मेयर फिरहाद हाकिम की बात से देश को बंगाल की राजनीति में तुष्टिकरण के भयानक रूप को समझ लेना चाहिए। फिरहाद हाकिम उर्फ़ बाबी हाकिम ने पाकिस्तान के समाचार पत्र द डान को दिए एक साक्षात्कार में बड़े ही चुनौतीपूर्ण ढंग से कथित रूप से कहा था कि “मुस्लिमों के लिए बंगाल पाकिस्तान से भी अधिक सुरक्षित स्थान है।'' ये ममता बनर्जी व फिरहाद हाकिम का ही किया धरा है कि पूरे देश में जितने भी बांग्लादेशी घुसपैठिये घूम रहे हैं वे सभी बंगाल के रास्ते से ही देश में घुसे हैं। इन घुसपैठियों को बंगाल में इनका तंत्र बड़ी ही योजनापूर्ण पद्धति से इनके भारतीय परिचय पत्र आदि बनवा देता है व फिर इन्हें देश भर में अराजकता फैलाने के लिए छोड़ देता है। बांग्लादेशी घुसपैठियों का यह गोरखधंधा चल ही रहा था कि इन्होंने रोहिंग्याई घुसपैठियों को भी देश में घुसाना प्रारंभ कर दिया और एक नई समस्या को जन्म दिया। ममता बनर्जी तुष्टिकरण की राजनीति छोड़कर इस कदर आगे बढ़ीं कि अपने मंचों से चंडी पाठ करने लगीं। इस अभियान में उन्होंने अपने लगभग चार दशक के राजनैतिक जीवन में पहली बार स्वयं के शांडिल्य गोत्र में जन्मे और ब्राह्मण होने की बात की। ऐसा लगा जैसे भाजपा के चुनाव अभियान ने उन्हें अचानक अपने कुल-गोत्र-वर्ण का स्मरण करा दिया हो।

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प्रसन्नता इस बात की नहीं है कि ममता बनर्जी को अपना हिंदुत्व स्मरण हो आया। प्रसन्नता इस बात की है कि ममता बनर्जी की तुष्टिकरण की राजनीति व तुष्टिकरण की राजधानी पश्चिम बंगाल को अब भाजपा का सशक्त विपक्ष चुनौती देने हेतु उपस्थित हो गया है। प्रसन्नता इस बात की भी है कि पश्चिम बंगाल से अब वामपंथियों के शेष अवशेष भी समाप्त हो गए हैं। प्रसन्नता इस बात की भी है कि बंगाल कांग्रेसमुक्त हो गया है। तमाम प्रयासों, श्रम व लगन भरे अभियान के बाद भी भाजपा के लिए बंगाल में सत्ता प्राप्त न कर पाना एक झटके जैसा अवश्य दिखता है किंतु जिनमें तनिक-सी भी राजनैतिक बुद्धि है वे समझ सकते हैं कि बंगाल के भद्रलोक ने यदि भारतीय जनता पार्टी को इतने कम समय के परिचय में, इतने नए नवेले संगठन के बाद भी यदि 18 सांसद व 80 विधायक दे दिए हैं तो यह एक अच्छा संकेत है। अच्छी बात यह भी है कि पश्चिम बंगाल का शोनार बांग्ला स्वप्न भाजपा के लिए एक आजीवन मिशन बन गया है। भाजपा को भले ही बंगाल में सत्ता न मिली हो किंतु भारतवर्ष के नागरिक इस बात की जवाबदारी भाजपा को ही देते हैं कि एक सशक्त विपक्ष के रूप में वह बंगाल को अब घुसपैठियों का प्रवेशद्वार कतई नहीं बनने देगी।

-प्रवीण गुगनानी

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