आखिर भारत-पाकिस्तान युद्ध विराम के बावजूद भारत की जीत के कुछ शानदार मायने क्या-क्या निकलते हैं?

By कमलेश पांडे | May 12, 2025

भारत-पाकिस्तान के बीच अकस्मात भड़के युद्ध और उसके बाद भारत द्वारा अप्रत्याशित ढंग से पाकिस्तान की, की गई ठुकाई के बीच अमेरिकी दबाव या सद्भावना वश किए गए युद्ध विराम यानी सीजफायर के अपने-अपने मायने निकाले जा रहे हैं। इस बात को लेकर भले ही भारतीयों में नाराजगी है, लेकिन भारत सरकार के इस सूझबूझ भरे फैसले से दोतरफा बर्बादी का मंजर टल गया है। हालांकि मोदी सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि युद्ध के बिल्कुल करीब पहुंच चुके भारत और पाकिस्तान के बीच भले ही सीजफायर समझौता हो गया हो, लेकिन आतंकवाद के खिलाफ जंग जारी रहेगी और निकट भविष्य में इसके किसी भी स्वरूप का मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा। यदि कोई भारतीयों पर गोली दागेगा तो उसका जवाब गोले से दिया जाएगा। यह आदेश भारत सरकार ने अपनी सेना और अर्द्धसैनिक बलों को दे दिया है। 

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यही वजह है कि भारत के आक्रामक रवैये को देखकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत सरकार को आगाह किया कि यह दौर समझदारी से काम करने का है। क्योंकि से चीन तो भारत को भी रूस बनाना चाहता है और पाकिस्तान को यूक्रेन की तरह पिटवाना चाहता है। क्योंकि वह स्वयं तो युद्ध नहीं लड़ेगा लेकिन दोनों पड़ोसी देशों को आपस में उलझाकर रखेगा, ताकि भविष्य में ये उसे चुनौती देने लायक नहीं बचें। चूंकि डोनाल्ड ट्रम्प भारत को अपना भविष्य का सहयोगी मानता है और चीन के मजबूत विकल्प के रूप में देखता आया है, इसलिए ट्रम्प प्रशासन ने पाकिस्तान पर दबाव बढ़ाकर इतना सक्रिय सहयोग किया। 

इस बात में कोई दो राय नहीं कि कोई भी देश युद्ध में नहीं फंसना चाहता है, खासकर भारत भी नहीं, लेकिन हमारा दुष्ट पड़ोसी राष्ट्र पाकिस्तान दुनिया का एक मात्र देश है जहाँ सेना देश के लिए नहीं बनी है बल्कि देश सेना के लिए बना है, ताकि आतंकवाद के फैक्ट्री के रूप में पाकिस्तान का इस्तेमाल होता रहे। ऐसे में चीन निश्चित ही पाकिस्तान को अपने प्रॉक्सी के तौर पर इस्तेमाल करके भारत को लंबे युद्ध में धकेलने के प्रयास में बना हुआ था, जिसे अमेरिका ने विफल कर दिया।

ऐसा इसलिए संभव हुआ, क्योंकि अमेरिका तो पाकिस्तान का पुराना सहयोगी है, जिसपर अब चीन अपना शिकंजा कसना चाहता है। मैंने पूर्व में भी कई बार लिखा है कि पहलगाम सांप्रदायिक आतंकी हमला सिर्फ पाकिस्तान की अकेले की साज़िश नहीं है, बल्कि यह चीन ने पाकिस्तान से करवाया है टैरिफ़ वार के अमेरिकी प्रकोप से बचने के लिए, ताकि भारत, पाकिस्तान से युद्ध करे और वे अमेरिकी कंपनियां जिन्हें ट्रम्प सरकार चीन से भारत शिफ्ट कराना चाहते हैं, वह डर जायें और चीन में ही बनी रहें। 

हालांकि, पाकिस्तान तब खुलकर नंगा हो गया जब पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ने अपने एक साक्षात्कार में स्वीकार कर लिया कि पाकिस्तान यूरोप और अमेरिका के कहने पर आतंकवाद को समर्थन देता आया है। दरअसल, इसके पीछे पाकिस्तान की चाल यह थी कि वह किसी भी तरह से चीन से ध्यान डाइवर्ट करना चाहता था और उसने बढ़ते आतंकवाद के लिए यूरोप और अमेरिका को आगे कर दिया। जो एक हद तक सही भी है, लेकिन हाल के संदर्भ में यह नीति भारत को लेकर बदल गई महसूस होती है।

यही वजह है कि भारत में लोग सवाल उठा रहे हैं कि आख़िर हमें इस युद्ध से क्या मिला? जबकि इस्लामिक आतंकवादियों ने हिंदुओं का नाम पूछ-पूछ कर मारा, मोदी को संदेश पहुंचाने तक को कहा, लेकिन हमने क्या किया? 

इसलिए अब यक्ष प्रश्न यह है कि पहले आप क्या कर रहे थे? शायद पहले हमलोग उन आतंकियों को खोजते थे जो घटना में शामिल होते थे और उनको न्यूट्रलाइज करते थे, पर फिर से आतंकियों की नई खेप तैयार हो जाती थी।

ऐसा इसलिए कि गरीब और मूर्ख मुसलमान बच्चा पैदा करने की फैक्ट्री हैं और आतंकियों के आका उनके बच्चों को बुलाकर मदरसे में दस साल तक ब्रेन वाश करके जितना आप मारते थे, उससे अधिक आतंकी खेप फिर से तैयार कर देते थे। लेकिन संभवतया अपने लोकतांत्रिक इतिहास में पहली बार भारत ने उन ठिकानों, उन लोगों और उन स्थानों को भी समाप्त किया है जहाँ से ये रक्तबीज राक्षस निकलते रहते हैं। पहली बार पीओके के अलावा पाकिस्तान के अंदर घुसकर ठुकाई की गई, जिससे पाकिस्तान दहशतजदा हो गया।

शायद पहली बार पाकिस्तान के घर में घुसकर वैसे ही उन निर्दोष बच्चों और उनके आकाओं का वध किया गया, जैसे उन्होंने कि अपने ब्रेन वाश से जांबाजी पूर्वक हमारे निर्दोष बहनों की माँग का सिंदूर उजाड़ दिया और उनके बच्चों को अनाथ किया। सवाल है कि आखिर कब आपने सुना था कि कोई दुनिया का दुर्दांत आतंकी कह रहा है कि अच्छा होता कि मैं मर जाता। लेकिन ऑपरेशन सिंदूर की आक्रामकता के बाद पहली बार ये सुकूनदायक शब्द भारतीयों को सुनने को मिले, जो बहुत बड़ी बात है।

देखा जाए तो इस बार भारत ने पाकिस्तान सहित आतंकी दुनिया को स्पष्ट संदेश दिया है कि मैं अब आतंकवाद की नाभी पर हमला करूँगा और आतंकियों के बजाय आतंक की फैक्ट्री, उसके ख़ानदान समेत उजाड़ी जाएगी। जबकि यह ठिकाने केवल पीओके के ठिकाने नहीं थे, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय सीमा से दूर पाकिस्तान के सबसे सुरक्षित क्षेत्रों में बने हुए आतंकी ठिकाने थे। इसलिए पाकिस्तान, उसकी सरकार और सेना सब दहशत में आ गए।

यहां पर आपको यह समझना होगा कि चीन,भारत और पाकिस्तान के बीच लंबा युद्ध चाहता था, जबकि भारत  कभी भी युद्ध नहीं चाहता था। लेकिन चीन की शह पर पाकिस्तान ने एक और युद्ध में जाने को भारत को मजबूर किया तो, भारत ने भी दस गुना ज्यादा और तगड़ा जवाब दिया। जो चीन और पाकिस्तान की कल्पना से परे था। यदि अमेरिका भारत और पाकिस्तान के बीच अचानक नहीं आया होता तो भारत का रौद्र रूप कुछ भी करवा सकता था।

यहां पर एक और बात गौर करनी होगी। भारत-पाक सीमित युद्ध 2025 से यह स्पष्ट हो चुका है कि अब तक जहाँ भारत को लग रहा था कि पूरा पाकिस्तान ही चीन की गोद में जा बैठा है, वहीं अब यह भी साफ हो चुका है कि  पाकिस्तान को अमेरिका के उस प्रशासन के साथ भी बैठना होगा, जो प्रो इंडियन है और जिनके आने से भारत में फिर आंतरिक स्थिरता की बहाली सुनिश्चित हुई है।

वैसे तो चीन ने बीते दिनों तक यह खलनायकी प्रयास किया है कि पाकिस्तान किसी तरह से अमेरिका के दबाव से निकले और इस युद्ध को जारी रखे। लेकिन यह ट्रम्प प्रशासन की अपनी कुशल रणनीति थी कि उन्होंने पाकिस्तान को भारत की शर्त पर सीज़फायर के लिए मज़बूर किया। ऐसा इसलिए कि इस सीज़फायर में सिंधु नदी जल समझौता को बीच में नहीं लाया गया, टेररिज्म को एक्ट ऑफ़ वार से बाहर निकालने का दबाव नहीं बनाया गया और दोनों देशों के बीच किसी तीसरे देश की प्रत्यक्ष एंट्री नहीं कराई गई।

इसलिए युद्ध विवाद के निष्पादन में भारत अमेरिका सहयोग के अलावा कुछ अन्य बातें काफी मायने रखती हैं, जिन्हें हमें जानना-समझना चाहिए। वह यह कि भारत ने बदला तो उरी आतंकी हमला और पुलवामा आतंकी हमला  का बदला भी सर्जिकल स्ट्राइक करके लिया था। लेकिन इस बार की सर्जिकल स्ट्राइक ज्यादा तीव्र और घातक रही। इस दफे भारतीय सेना ने पाक अधिकृत कश्मीर ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान के पंजाब तक में आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया, जिसमें 100 आतंकवादी मारे गए और पाकिस्तान के लगभग 4 दर्जन से ज्यादा सैनिक भी हलाक हुए।

वहीं, अब यह भी स्पष्ट हो गया कि भले ही भारत-पाकिस्तान के मामले में यह डर हमेशा से रहता आया है कि दोनों परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र हैं और इनके बीच का टकराव परमाणु युद्ध तक पहुंच सकता है। हाल के दिनों तक तो पाकिस्तान ने इस नैरेटिव को दुनिया में खूब बेचा और फायदा भी उठाया। लेकिन, पिछले एक दशक में इसमें और अंतरराष्ट्रीय सीमा पार करने की भारत की सैन्य रणनीति में काफी बदलाव आया है। क्योंकि अब नया भारत एलओसी से भी नहीं हिचकता। इस बार तो सौ किमी अंदर तक घुसकर उसने एक नया ट्रेंड भी सेट किया, जो भारत की मजबूती को दर्शाता है।

भारत का ऑपरेशन सिंदूर इस मायने में भी सफल प्रतीत हुआ कि भारत ने सिंधु जल संधि को निलबित कर रखा है। यह बात इसलिए भी अहम है, क्योंकि 1971 और कारगिल वॉर 1999 के दौरान भी संधि जारी रही थी। वैसे पिछले कुछ साल से भारत इस संधि की पुनर्समीक्षा करने की बात कह रहा है। लेकिन पानी के जरिये भारत ने पड़ोसी देश पर बड़ी कूटनीतिक बढ़त हासिल की है और उसे बेपानी कर दिया।

चर्चा है कि अभी तक तो भारत की कोशिश यही होती थी कि पाकिस्तान को सबूत सौंपकर रास्ते पर लाने की कोशिश की जाए, उस पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय का दबाव बनाया जाए। लेकिन इस बार पहलगाम आतंकी हमले के बाद नई दिल्ली ने दबाव तो बनाया, लेकिन उसके साथ ही खुद एक्शन लेकर दो टूक बता दिया कि उसके पास और भी विकल्प हैं, जिसे वो आजमाने में कभी नहीं हिचकिचाएगा।

इस युद्ध विराम की सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि अब से हर आतंकी हमला एक्ट ऑफ वॉर माना जाएगा और यह पाकिस्तान के लिए बहुत बड़ी चेतावनी है। पाकिस्तान को इसके बाद अपने यहां के आतंकवादियों को कंट्रोल करना पड़ेगा। यदि पाकिस्तान ऐसा नहीं करता है तो भारत ने संकेत दिया है कि वह आगे भी पाकिस्तान के आतंकी नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई से पीछे नहीं हटेगा और युद्ध विराम के बाद अंतरराष्ट्रीय सीमा या नियंत्रण रेखा पर चलने वाली किसी भी गोली का जवाब गोले से देगा। क्योंकि इस सीमित युद्ध ने भारत की मॉडर्न वॉरफेयर क्षमता साबित हो चुकी है। भारत ने दुनिया को यह भी दिखाया कि उसका डिफेस सिस्टम कितना मजबूत है। क्योंकि देश की उत्तरी और पश्चिमी सीमा पर उसने पाकिस्तान के ड्रोन और मिसाइल हमलों को बुरी तरह से नाकाम किया और जबरदस्त पलटवार किया, जिससे पाकिस्तान की सेना को भारी क्षति पहुंची।

एक और महत्वपूर्ण बात यह निकलकर सामने आई है कि, ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान में आर्मी और चुनी हुई सरकार का अंतर्विरोध भी स्पष्ट रूप से सामने आ गया। इसलिए जब राजनीतिक नेतृत्व से बात नहीं बनी तो अमेरिका ने समझौते का दबाव बनाने के लिए पाकिस्तान के आर्मी चीफ से बात की।

इन सबके बावजूद यदि आपको प्रतीत होता है कि पाकिस्तान को आप गाजा या यूक्रेन की तरह तबाह करेंगे तो शायद ऐसा होता नहीं है। क्योंकि ग़ाज़ा के बीस-तीस किलोमीटर की पट्टी ने ही जब इजरायल को परेशान कर रखा है, वहीं पाकिस्तान बहुत विस्तृत व अप्राकृतिक देश है। भारत की सेना उसके नागरिकों पर हमले करती भी नहीं है। जबकि पाकिस्तान भारत को अस्थिर रखने के तमाम प्रयासों में शामिल है।

मेरा स्पष्ट मानना है कि किसी बड़े युद्ध की तरफ़ जाना खासकर तब जब भारत की आबादी अभी युवा है और अगले पंद्रह बीस साल में बुज़ुर्गियत की तरफ़ जाएगी, उचित नहीं है। इसलिए जब परिस्थिति हमें युद्ध की तरफ़ खिचेगी तो हम अवश्य लड़ेंगे लेकिन हम जबरदस्ती इसमें नहीं पड़ेंगे। इसलिए ट्रम्प प्रशासन धन्यवाद का अधिकारी है, चाहे हमें यह बात सुनने में अच्छा लगे या बुरा। पर सच, सच होता है। उसे समझने और स्वीकार करने से हिचकना नहीं चाहिए।

वास्तव में पाकिस्तान एक ऐसा नंगा देश है, जिसकी एक अपनी अलग दुनिया है जिसका वह एकमात्र सबसे बड़ा विजेता है। वह है आतंकवाद। दरअसल, वह जॉम्बी हैं, उनके दुनिया में वह सन 1971, 1999 और 2025 सभी युद्ध जीत चुका है। आप जॉम्बीज़ की दुनिया को अपने धारणा से नहीं चला सकते। इसलिए बेहतर होगा कि किसी प्रकार के भावावेश से बचें और अपने सशक्त व सजग नेतृत्व पर भरोसा रखें। क्योंकि वह दूर दृष्टि से प्रत्येक वह कार्य करेंगे जो उनके शायद जाने के बाद भी भारत को विकसित देश बनाने का कार्य करती रहेगी। 

इस लिहाज से भी भारत-पाकिस्तान युद्ध और फिर सीजफायर का यह घटनाक्रम भारत के लिए ऐतिहासिक महत्व वाला साबित हुआ है। इस दौरान भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब हम रक्तबीजों को नहीं बल्कि उसके फैक्ट्री चलाने वालों को मारेंगे। जैसे वो हमारे परिवार के निर्दोषों तक को मारते हैं वैसे ही तुम्हारा भी घर खानदान जड़मूल से समाप्त करेंगे। यह कोई साधारण बात नहीं है। इसके लिए मोदी सरकार का आभारी देशवासियों को रहना चाहिए। नहीं भी रहें, तो  कम से कम चीन प्रेरित आलोचना से बचें।

- कमलेश पांडेय

वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

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