Jan Gan Man: Uniform Civil Code की धर्म विरोधी छवि गढ़ने में विफल रहे लोग अब आदिवासियों के बीच भ्रम फैला रहे हैं

By नीरज कुमार दुबे | Jul 05, 2023

देश में इस समय समान नागरिक संहिता को लेकर जमकर बहस हो रही है। इसके पक्ष और विपक्ष में तमाम तरह के तर्क दिये जा रहे हैं। कोई इसे अपने धर्म के खिलाफ बता रहा है तो कोई कह रहा है कि इससे हमारी संस्कृति और पहचान को खतरा हो जायेगा। आश्चर्यजनक बात यह है कि अभी केंद्र सरकार ने समान नागरिक संहिता संबंधी कानून का मसौदा प्रस्ताव देश के समक्ष नहीं रखा है। यानि किसी को पता नहीं है कि समान नागरिक संहिता में क्या-क्या प्रावधान होंगे लेकिन फिर भी बिना कुछ जाने समझे लोग इससे भयभीत हो रहे हैं और दूसरों के बीच भी भ्रम फैला रहे हैं। हैरत इस बात पर भी है कि पूर्वोत्तर के दो राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने भी प्रस्तावित समान नागरिक संहिता का विरोध करते हुए अजीबोगरीब तर्क रखे हैं। देखा जाये तो समान नागरिक संहिता के खिलाफ जो दुष्प्रचार अभियान चलाया जा रहा है वह खासतौर पर कम पढ़े लिखे या समाज के पिछड़े तबके के बीच तर्कहीन बातें पहुँचा कर चलाया जा रहा है ताकि जब भी समान नागरिक संहिता कानून बनाने संबंधी विधेयक आये तब इसका खुलकर विरोध करवाया जा सके। इसलिए जरूरत है कि जनता को जागरूक किया जाये ताकि दुष्प्रचार अभियानों की हवा निकाली जा सके। 

हम आपको बता दें कि समान नागरिक संहिता के विरोध में जब इसकी कथित धर्म विरोधी छवि नहीं गढ़ी जा सकी तो अब कुतर्क फैलाया जा रहा है कि यह जनजातीय समाज के लिए घातक होगा। हाल ही में छत्तीसगढ़ में आदिवासी समुदाय की संस्था 'छत्तीसगढ़ सर्व आदिवासी समाज (सीएसएएस)' ने कहा है कि केंद्र सरकार को समान नागरिक संहिता लाने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए क्योंकि इससे उन जनजातियों का अस्तित्व खतरे में आ जाएगा जिनके पास अपने समाज पर शासन करने के लिए अपने स्वयं के पारंपरिक नियम हैं। सीएसएएस के अध्यक्ष, कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम ने कहा है कि उनके संगठन को समान नागरिक संहिता पर पूरी तरह से आपत्ति नहीं है, लेकिन केंद्र को इसे लाने से पहले सभी को विश्वास में लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज में समान नागरिक संहिता लागू करना अव्यावहारिक लगता है। उन्होंने कहा कि समान नागरिक संहिता में जन्म, विवाह और संपत्ति के लिए समान कानून बनाने का प्रस्ताव है जबकि आदिवासी समाज के लगभग सभी रीति रिवाज, परंपराएं सामुदायिक और कुल की होती हैं। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज अपने जन्म, विवाह, तलाक, विभाजन, उत्तराधिकारी, विरासत और जमीन संपत्ति के मामलों में प्रथागत या रूढ़िविधि (कस्टमरी लॉ) से संचालित है और यही उसकी पहचान है जो उसे बाकी जाति, समुदाय और धर्म से अलग करती है। नेताम ने कहा कि आदिवासियों के प्रथागत कानून को संविधान के अनुच्छेद 13(3)(क) के तहत कानून का बल प्राप्त है। उन्होंने कहा कि आदिवासियों को संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूची तथा पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम के तहत कई अधिकार प्राप्त हैं।

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उन्होंने कहा कि समान नागरिक संहिता आदिवासी समाज के सदियों से चले आ रहे विशिष्ट रीति-रिवाज और परंपराओं को प्रभावित करेगा, जिसके परिणामस्वरूप आदिवासियों की पहचान और अस्तित्व पर खतरा मंडराएगा। उन्होंने कहा कि उनका संगठन मध्य भारत के अन्य राज्यों के आदिवासी समूहों के संपर्क में है जिससे वे ऐसे किसी भी कानून के खिलाफ सामूहिक रूप से आवाज उठा सकें जो उनके रीति-रिवाजों और परंपराओं के लिए खतरा है।

संसद की स्थायी समिति के विचार

लगभग ऐसे ही स्वर कुछ अन्य जनजातीय संगठनों के भी रहे। संभवतः इसीलिए हाल ही में संसद की एक स्थायी समिति की बैठक में समान नागरिक संहिता बनने की स्थिति में पूर्वोत्तर एवं अन्य क्षेत्रों के आदिवासियों को इसके दायरे से बाहर रखने की वकालत की गयी। रिपोर्टों के मुताबिक विधि से संबंधित संसदीय समिति के प्रमुख सुशील मोदी ने पूर्वोत्तर और अन्य क्षेत्रों के आदिवासियों को किसी भी प्रस्तावित समान नागरिक संहिता के दायरे से बाहर रखने की हिमायत की। सूत्रों ने बताया है कि समिति की बैठक में इस ओर ध्यान दिलाया गया था कि कुछ पूर्वोत्तर राज्यों में बिना उनकी सहमति के केंद्रीय कानून लागू नहीं होते हैं।

इसके अलावा, मिजोरम के मुख्यमंत्री जोरामथांगा ने भारत के विधि आयोग को पत्र लिखा, जिसमें कहा गया है कि समान नागरिक संहिता (यूसीसी) सामान्य रूप से जातीय अल्पसंख्यकों और विशेष रूप से मिजो समुदाय के हितों के खिलाफ है। सत्तारुढ़ मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) के अध्यक्ष जोरामथांगा ने यह भी कहा कि उनकी पार्टी का मानना है कि यूसीसी मिजो समुदाय के धार्मिक व सामाजिक रीति-रिवाजों और संविधान की धारा 371 (जी) द्वारा संरक्षित उनके पारंपरिक कानूनों के खिलाफ हैं। हम आपको बता दें कि एमएनएफ भाजपा के नेतृत्व वाले नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस (एनईडीए) का एक घटक दल है। एनईडीए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) का क्षेत्रीय संस्करण है। जोरामथांगा का बयान मेघालय के मुख्यमंत्री कोनराड के. संगमा के इस बयान के बाद आया है कि यूसीसी “अपने वर्तमान स्वरूप में” भारत के दृष्टिकोण के खिलाफ है। हम आपको बता दें कि संगमा की पार्टी एनपीपी भी एनईडीए की सदस्य है। जोरामथांगा ने अपने पत्र में लिखा, “चूंकि पूरे भारत में यूसीसी का प्रस्तावित कार्यान्वयन विशेष रूप से संवैधानिक प्रावधान द्वारा संरक्षित मिजो समुदाय की धार्मिक व सामाजिक प्रथाओं और उनके पारंपरिक/व्यक्तिगत कानून के विपरीत है, इसलिए केंद्र की राजग सरकार का उक्त प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया जा सकता।”

अश्विनी उपाध्याय का तर्क

बहरहाल, जहां तक समान नागरिक संहिता के संभावित कानूनी पहलुओं की बात है तो इस बारे में भारत के पीआईएल मैन के रूप में विख्यात अश्विनी उपाध्याय का कहना है कि समान नागरिक संहिता किसी का अहित नहीं करेगी बल्कि यह समाज में व्याप्त कुरीतियों को समाप्त करेगी। उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय का कहना है कि भारतीय नागरिक संहिता सबको समान रूप से देखने वाली होगी इसमें किसी के साथ किसी प्रकार का भेदभाव होने की संभावना नहीं है।

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