By अभिनय आकाश | Jan 26, 2026
भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने एक बार फिर से पूरी दुनिया को चौंका दिया है। ईरान जब दुनिया के मंच पर आलोचनाओं और प्रतिबंधों का शिकार हो रहा था तब भारत ने तेहरान को बड़ी मदद दी है। इस मदद से अमेरिका और इजराइल दोनों ही चौंक गए थे। संयुक्त राष्ट्र मानव अधिकार परिषद के 39वें सत्र में ईरान के खिलाफ एक प्रस्ताव लाया गया था और यह प्रस्ताव आइसलैंड की तरफ से आया था। लेकिन इस पहल में कई और देश भी शामिल थे। जिसमें आइसलैंड ने जर्मनी, उत्तरी मेसडोनिया, मोलदोवा, गणराज्य और ग्रेट ब्रिटेन के साथ-साथ उत्तरी आयरलैंड के साथ मिलकर 20 जनवरी 2026 को आधिकारिक तौर पर इस विशेष सत्र को बुलाने का अनुरोध किया था। जिसके लिए परिषद के कम से कम 1/3 यानी कि हम कहें तो 16 से ज्यादा या फिर 16 लोगों के समर्थन की जरूरत होती है।
हालांकि इस सत्र में अपनाए गए प्रस्ताव ने ईरान में मानव अधिकारों की बिगड़ती हुई स्थिति की निंदा की और स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय तथ्य खोज मिशन यानी कि इंडिपेंडेंट इंटरनेशनल फैक्ट फाइंडिंग मिशन के जनादेश को भी 2 साल के लिए और ईरान पर विशेष दूत के जनादेश को एक साल के लिए बढ़ा दिया। हालांकि ईरान ने इस प्रस्ताव को अन्यायपूर्ण राजनीति से प्रेरित और एकतरफा बताया था और इसी के चलते जब कई देश या तो दबाव में आकर उसका समर्थन कर रहे थे। जब कुछ देश डर के कारण अनुपस्थित रहे तब वो भारत ही था जिसने खुलकर इस प्रस्ताव के विरोध में वोट दिया था। आंकड़ों की तरफ अगर हम नजर डालेंगे तो आपको पता चलेगा कि उसके मुताबिक 25 देशों ने प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया था। सात देशों ने इसके विरोध में मतदान किया था और 14 देश तो वोटिंग से दूर ही रहे थे।
इसी बीच भारत ने ना तो चुप्पी चुनी और ना ही कूटनीतिक सुविधा। भारत ने सिद्धांत चुना। भारत में ईरान के राजदूत मोहम्मद फतली ने पब्लिकली भारत सरकार को धन्यवाद किया है और कहा है कि यह रुख न्याय, बहुपक्षवाद और राष्ट्रीय संप्रभुता के प्रति भारत की प्रतिबुद्धता को दर्शाता है। हालांकि भारत का हमेशा से यह मानना रहा है कि किसी भी देश के आंतरिक मामलों में बाहरी हस्तक्षेप बिल्कुल स्वीकारने नहीं होता और संप्रभुता कोई वैचारिक शब्द नहीं होती बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की बुनियाद भी होती है।