Gyan Ganga: वीर अंगद ने भरी सभा में रावण को लताड़ते हुए क्या कहा था?

By सुखी भारती | May 30, 2023

रावण वीर अंगद के हृदय में शंका रूपी बीज बोने का हर संभव प्रयास करता है। लेकिन उसका प्रत्येक प्रयास पानी पर खींची रेखा के समान निरर्थक हो जाता है। रावण ने जब वीर अंगद को कुल घातक की संज्ञा दी, तो उन्हें क्रोध की ज्वाला ने सुलगा दिया। वे अतिअंत कठोर वाणी का प्रयोग करते हुए, रावण को संबोधित करते हुए कहते हैं-

अंधउ बधिर न अस कहहिं नयन कान तव बीस।।’

वीर अंगद रावण को लताड़ते हुए कहते हैं, कि हे रावण! तू किस मुख से मुझे कुल घातक कह रहा है? चलो माना, कि मैं कुल घातक हूँ। लेकिन तू तो ऐसे व्यवहार कर रहा है, मानो तू बहुत बड़ा कुल रक्षक है। तू इतना ही महान व कुल का रक्षक होता, तो माता सीता जी के हरण से पूर्व, अपने दादा पुल्स्त्य ऋर्षि और अपने पिता श्री विश्रवा मुनि के प्रताप व तप के बारे में, एक बार तो अवश्य चिंतन करता। क्या तुम्हें इतनी महान कुल में पैदा होकर भी, एक बार भी मन में नहीं आया, कि यह कुकर्म मेरे संपूर्ण पुण्यों का नाश कर देंगे? अगर तुमने यह सब नहीं देखा, तो फिर तुम केवल दो आँख एवं दो कान वाले अँधे-बहरे नहीं हो, अपितु बीस आँख एवं बीस कान वाले अँधे-बहरे हो। वीर अंगद ने रावण को केवल अँधा ही नहीं कहा, अपितु साथ में बहरा भी कहा है। सुनने में हमें शायद यह वाक्य साधारण लगे। लेकिन वीर अंगद ने इन दो उपनामों के माध्यम से बता दिया, कि हे रावण, तुम में सीखने व अनुसरण की वृति ही नहीं है। कारण कि संसार में जो व्यक्ति नेत्रहीन हो, लेनिक उसे कानों से सुनता हो, तो उसे आप समझाने के लिए, बोल कर समझा सकते हैं। अथवा जो व्यक्ति केवल बहरा हो, लेकिन आँखों से वह देख सकता है, तो उसे आप बोल कर समझा सकते हो। लेकिन जिस व्यक्ति में दोनों ही त्रुटियां हों, अर्थात वह अँधा भी हो और साथ में बहरा भी हो, तो उसे संसार में भला कौन देव समझा सकता है? कारण कि, उसके तो समझने के समस्त आधार ही निराधार हो चुके हैं। तभी तो वीर अंगद ने कहा, कि रे मूर्ख! अगर तुम्हें सचमुच ही दिखाई देता, और सुनाई देता, तो तुम क्या यह न देख पाते, कि जिस महाप्रभु के चरणों की सेवा को ब्रह्मा, विष्णु और स्वयं साक्षात भगवान शंकर भी लिलायत हैं, भला उनका दूत कहलावर, मैंने कैसे अपनी कुल दाग लगा दिया। हे रावण, तुमने सुना न, कि मैं किसका नाम लिया अभी-अभी। जी हाँ, भगवान शंकर भी प्रभु श्रीराम जी की चरण सेवा के पिपासु हैं। वही भगवान शंकर, जो कि तुम्हारे गुरु हैं। सोच अगर तुम्हारे गुरु ही जिनके उपासक व दास हैं, तो उनका दास कहलाने में मुझे भला कैसी लज्जा? इतना सब होने के पश्चात भी अगर तू यह सब नहीं देख पा रहा है, तो मैंने ठीक ही कहा है, कि तू बीस नेत्रों वाला होकर भी नेत्रहीन है, और बीस कानों वाला होकर भी बहरा है। सोच तेरी बुद्धि कितनी सीमित है। और ऐसी बुद्धि होने के पश्चात भी क्या तेरा हृदय फट नहीं जाता-

‘सिव बिरंचि सुर मुनि समुदाई।

चाहत जासु चरन सेवकाई।।

तासु दूत होइ हम कुल बोरा।

अइसिहुँ मति उर बिहर न तोरा।।’

रावण ने देखा, कि मेरी ही सभा में, मेरे ही मंत्रियों के समक्ष मेरा ऐसा अपमान तो मैंने स्वप्न में भी नहीं सोचा था। लेकिन समस्या यह थी, कि इससे पूर्व भी एक वानर आया था, उसने तो केवल मुझे राम कथा सुनाई, लेकिन तब भी वह लंका जला जलाने से बाज नहीं आया। अर्थात वह भी हानि तो दे ही गया। लेकिन यह वाला वानर तो कोई राम कथा इत्यादि भी नहीं सुना रहा, सीधे मार काट व मेरे अपमान की ही बातें कर रहा है। तो ऐसे में यह मेरी प्यारी लंका की कहाँ तक धज्जियाँ उड़ाने वाला है, इसका अनुमान कहा नहीं जा सकता है। ऐसे में जितना हो सके, इसके प्रकोप से बचना ही चाहिए। लेकिन साथ में सभासदों के समक्ष, यह भी सिद्ध रहे, कि मैं इस वानर से कोई भयभीत नहीं हूँ।

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अपनी इसी कमी को छुपाने के लिए, रावण एक बात और कहता है, जो कि उसके चरित्र अनुसार, किसी भी प्रकार से मेल नहीं खाती थी। रावण डींग हाँकता हुआ कहता है-

‘सुनि कठोर बानी कपि केरी।

कहत दसानन नयन तरेरी।।

खल तव कठिन बचन सब सहऊँ।

नीति धर्म मैं जानत अहऊँ।।’

रावण कहता है, कि अरे दुष्ट वानर! मैं तेरी खरी-खोटी बातें इसलिए सहन कर रहा हूँ, क्योंकि मैं ऐसा महान व्यक्ति हूँ, जो धर्म और नीति का दृढ़ पक्षधर है।

वीर अंगद ने रावण के यह वाक्य सुने, तो वे भी आश्चर्य में पड़ गए। कारण कि जिस प्रकार से जल और अग्नि का कोई दूर-दूर तक कोई संबंध नही होता, ठीक वैसे ही क्या रावण और धर्म और नीति का संबंध हो सकता है?

वीर अंगद रावण को प्रतिक्रिया स्वरूप क्या कहते हैं, जानेंगे अगले अंक में---(क्रमशः)---जय श्रीराम।

- सुखी भारती

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