अगर अमेरिका ने सौ प्रतिशत का टैरिफ थोपा तो !

By उमेश चतुर्वेदी | Sep 23, 2026

अमेरिकी संसद के दोनों सदनों से ‘सैंक्शनिंग रशा एंड ईरान एक्ट’ के पारित होने को लेकर देश में आशंकाओं के बादलों का उठना स्वाभाविक है। आज जिस आर्थिकी और विश्व व्यवस्था को तकरीबन पूरी दुनिया ने अपना रखा है, उसकी वजह से पूरी दुनिया को लगता है कि अमेरिका के सहयोग के बिना वह एक कदम आगे नहीं रख सकती। वैश्विक आर्थिकी में डालर के वर्चस्व के चलते ज्यादातर देशों को लगता है कि अगर अमेरिका की आंखें टेढ़ी हुईं तो उस पर महाविपत्ति आ जाएगी। इसी सोच का ही असर है कि इस अधिनियम के पारित होने के बाद भारत के प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस की नजर में  भारतीय विदेश नीति नाकाम नजर आने लगी है। सैद्धांतिक रूप से भारतीय वामपंथी इकोसिस्टम अमेरिका का हर पल खुला विरोध करता है, लेकिन उसे भी अमेरिकी टैरिफ कानून भारतीय हित के खिलाफ नजर आ रहा है। इन सबके बीच भारत सरकार की प्रतिक्रिया संतुलित और सधी हुई है। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि भारत अपनी 140 करोड़ की आबादी की ऊर्जा सुरक्षा के लिए दृढ़ है। जाहिर है, भारत को झुकाने की सोच रखने वाले ट्रंप प्रशासन को ऐसी प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं रही होगी। ऐसे में अमेरिका के अगले कदम पर निगाह रखना ज्यादा जरूरी हो जाता है।

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पश्चिमी एशिया का हालिया संकट अमेरिका की ही देन है। जब से यह संकट बढ़ा है, भारत ने रूस से तेल की खरीददारी बढ़ा दी है। यह भारत की मजबूरी भी है। बीती जुलाई में भारत ने अपने कुल तेल आयात का 51.4 प्रतिशत तेल अकेले रूस से खरीदा था। रूस से तेल खरीद का भारतीय मकसद मौजूदा हालात में अपने लिए किफायती दरों पर तेल हासिल करना है। भारत का यह अधिकार है और मौजूदा हालात में अगर भारत झुकता है तो इसे भारतीय नागरिक शायद ही पसंद करेगा।

भारत की तुलना में चीन ना सिर्फ रूस, बल्कि ईरान से भी भारी मात्रा में तेल खरीद रहा है। रूस से तेल खरीदना उसके लिए ज्यादा आसान और सस्ता है। चूंकि दोनों देशों की सीमाएं मिलती हैं और तेल की आपूर्ति पाइपलाइन के जरिए आसानी से होती है, इसलिए चीन भी टैरिफ युद्ध के निशाने पर होने के बावजूद तेल खरीद से पीछे नहीं हट रहा तो फिर हमें ही क्यों पीछे रहना चाहिए। इसमें दो राय नहीं कि अगर अमेरिकी राष्ट्रपति इस कानून के तहत भारत पर सौ प्रतिशत टैरिफ थोपते हैं तो भारत से अमेरिका को होने वाले निर्यात को बड़ा झटका लग सकता है। जानने की बात है कि  भारत से अमेरिका भेजे जाने वाले सामानों में टेक्सटाइल्स, रत्न और आभूषण, आटोमोबाइल और इंजीनियरिंग उत्पाद ज्यादा है। टैरिफ अगर बढ़ेगा तो अमेरिकी बाजार में इनकी कीमतें महंगी होंगी, जिससे उनकी मांग घट सकतकी है। इससे भारतीय निर्यातकों को नुकसान हो सकता है। कुछ जानकारों को लगता है कि इससे रूस से जारी तेल खरीद से मिल रही अरबों रूपए की राहत खटाई में पड़ सकती है। यहां ध्यान देने की बात यह भी है कि भारत, अमेरिका से व्यापार समझौते को लेकर बातचीत जारी रखे हुए है। अगर सौ प्रतिशत टैरिफ लागू किया जाता है तो इस प्रस्तावित व्यापार समझौते में अड़चन आ सकती है। हो सकता है कि यह बातचीत ही खटाई में पड़ जाए।

बेशक अमेरिका भारत का बड़ा कारोबारी साझीदार है। लेकिन मोदी के 2024 में सत्ता में आने के बाद से अब तक करीब चालीस देशों से मुक्त व्यापार समझौता किए जा चुके हैं। भारत ने हाल ही में यूरोपीय संघ से भी ऐसा समझौता किया है। भारत का मॉरीशस, संयुक्त अरब अमीरात, ऑस्ट्रेलिया, यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ, ब्रिटेन, ओमान, न्यूजीलैंड आदि से मुक्त व्यापार समझौते या व्यापक आर्थिक साझेदारी का समझौता कर चुका है। भारत सरकार के ही आंकड़ों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अपने कारोबारी नेटवर्क का विस्तार करते हुए नौ बड़े मुक्त व्यापार समझौते भी किए हैं। यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ यानी ईएफटीए में आइसलैंड, लिकटेंस्टीन, नॉर्वे और स्विट्जरलैंड शामिल हैं। इसी तरह भारत ने आसियान देशों, जापान, दक्षिण कोरिया और साफ्टा के सदस्य देशों के साथ पारंपरिक कारोबारी समझौता कर चुका है। अगर अमेरिका भारत पर टैरिफ थोपता है तो देश को चाहिए कि इन देशों के जरिए कारोबार को बढ़ावा दे। वैसे भी टैरिफ थोपने की दशा में भारतीय कारोबारी दूसरे देशों के जरिए अमेरिका में अपना माल भेज सकते हैं। उम्मीद कर सकते हैं कि सरकार भी ऐसी राह तलाशने की कोशिश में जुटी होगी। फिर भारतीय अर्थव्यवस्था भी पहले जैसी नहीं रही, इसलिए हताश और चिंतित होने की जरूरत नहीं है, भारत को अमेरिकी बाजार में घुसने के लिए वैकल्पिक राहों की तलाश तेज करनी होगी।

- उमेश चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं..

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