By अभिनय आकाश | Jun 29, 2026
अमेरिका और ईरान के बीच बारूद का धुआं अभी छंटा भी नहीं था कि दोनों देश एक नए 'चक्रव्यूह' में फंस गए हैं। दुश्मनी की आग ठंडी करने के लिए जो समझौता हुआ था, अब वही समझौता दोनों के बीच नई जंग की वजह बन गया है। पिछले वीकेंड पर दोनों देशों ने एक-दूसरे पर इतने ताबड़तोड़ पलटवार किए कि महज़ 11 दिन पुराना शांति समझौता वेंटिलेटर पर आ गया था। दुनिया तीसरे विश्व युद्ध की आशंका से कांप रही थी। लेकिन आखिरी कगार पर पहुंचकर दोनों ने अपनी 'सैन्य गतिविधियों' को रोका और अब मंगलवार को कतर की राजधानी दोहा में दोनों महाशक्तियां फिर से मेज पर आमने-सामने बैठने जा रही हैं। इस आपातकालीन युद्धविराम ने दुनिया के सिर से महायुद्ध का तात्कालिक खतरा तो टाल दिया है, लेकिन सुलगता हुआ असली सवाल आज भी वहीं खड़ा है। समुद्र के सबसे बड़े सुल्तान का ताज किसके सिर सजेगा?
भले ही अंतरिम समझौते में वाणिज्यिक यातायात को फिर से शुरू करने की बात कही गई है, लेकिन ईरान का कहना है कि इस जलडमरूमध्य से होने वाला नेविगेशन (आवाजाही) अभी भी उसके अधिकार क्षेत्र में है। रविवार को बगदाद की यात्रा के दौरान ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि समझौता स्पष्ट रूप से तेहरान की भूमिका को स्वीकार करता है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य अगले 30 दिनों तक ईरान की पूरी निगरानी और प्रबंधन में रहेगा, और सभी बाधाएं हटने के बाद, इस जलमार्ग की पूरी क्षमता बहाल कर दी जाएगी। हम इसी पर काम कर रहे हैं। उन्होंने आगे जोड़ा कि यह जिम्मेदारी पूरी तरह से इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान की है। इस मामले में कोई दूसरा पक्ष या देश शामिल नहीं है। समझौता ज्ञापन (MoU) के तहत यह पूरी तरह से स्पष्ट है, और किसी भी तरह का हस्तक्षेप या एकतरफा कार्रवाई स्थिति को और खराब करेगी और जलडमरूमध्य को फिर से खोलने में देरी का कारण बनेगी।
ताज़ा संकट तब शुरू हुआ जब होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुज़रने वाले कमर्शियल जहाज़ों पर हमले हुए। शुक्रवार को सिंगापुर के झंडे वाले 'एवर लवली' (Ever Lovely) जहाज़ पर एक ड्रोन से हमला हुआ, जबकि एक दिन बाद पनामा के झंडे वाले 'किकू' (Kiku) जहाज़ पर हमला किया गया। ईरान ने इनमें से किसी भी घटना की ज़िम्मेदारी नहीं ली। इसके जवाब में अमेरिका ने ईरान की मिसाइल और ड्रोन सुविधाओं, तटीय रडार ठिकानों और अन्य सैन्य बुनियादी ढांचों पर हमले किए। अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने कहा कि ये हमले कमर्शियल शिपिंग के ख़िलाफ़ ईरान की लगातार आक्रामकता के सीधे जवाब में किए गए थे। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी सैन्य कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि ईरान ने युद्धविराम समझौते का उल्लंघन किया है। ट्रंप ने 'ट्रुथ सोशल' पर लिखा, हो सकता है कि एक समय ऐसा आए जब हम और ज़्यादा समझदारी से काम न ले पाएँ, और हमें उस काम को सैन्य तरीक़े से पूरा करने के लिए मजबूर होना पड़े जिसे हमने बहुत सफलतापूर्वक शुरू किया था। अगर ऐसा हुआ, तो इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ ईरान का अस्तित्व ही नहीं रहेगा। ईरान ने इन आरोपों को खारिज कर दिया और कहा कि अमेरिकी हमले अंतरराष्ट्रीय क़ानून और खुद उस मेमोरेंडम (समझौते), दोनों का उल्लंघन थे। बाद में, इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने कुवैत और बहरीन में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाते हुए जवाबी मिसाइलें और ड्रोन दागे।
हालिया टकराव ने आर्टिकल 5 की अलग-अलग व्याख्याओं को साफ तौर पर उजागर किया है। वॉशिंगटन का कहना है कि समझौता बिना किसी रोक-टोक के कमर्शियल नेविगेशन की गारंटी देता है और उसने ओमान तथा अंतरराष्ट्रीय समुद्री अधिकारियों से जुड़े वैकल्पिक शिपिंग इंतज़ामों का समर्थन किया है। हालांकि, ईरान इस बात से सहमत है कि शिपिंग फिर से शुरू होनी चाहिए, लेकिन सभी जहाजों को तेहरान के साथ तालमेल बनाए रखना होगा क्योंकि समझौते को लागू करने की अवधि के दौरान यह जलडमरूमध्य (स्ट्रेट) ईरानी प्रशासन के नियंत्रण में है। पिछले हफ़्ते यह विवाद तब और गहरा गया जब आईआरजीसी ने जहाजों को ईरानी समुद्री सीमा के भीतर केवल उत्तरी शिपिंग कॉरिडोर का इस्तेमाल करने का निर्देश दिया। समुद्री निगरानी फर्म 'विंडवर्ड AI' के अनुसार, ओमान के समुद्री क्षेत्र से दक्षिणी रास्ते का इस्तेमाल कर रहे चार टैंकरों को वापस लौटने के लिए मजबूर होना पड़ा, जबकि कई अन्य जहाजों ने अपना रास्ता बदल लिया। इसके बाद इस जलडमरूमध्य से होने वाली शिपिंग में कमी आई। बुधवार को जहां रोज़ाना 70 जहाज गुज़रते थे, वहीं शनिवार तक यह संख्या घटकर सिर्फ़ 40 रह गई।
मिडिल ईस्ट में लगातार बढ़ते तनाव के बीच अब एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। जिनेवा में शुरुआती बातचीत के बाद अब अमेरिका और ईरान एक बार फिर आमने-सामने बैठने जा रहे हैं। इस बार बातचीत का मंच होगा क़तर की राजधानी दोहा जहां दोनों देशों के प्रतिनिधि होर्मज स्ट्रेट को लेकर चल रहे सबसे बड़े विवाद का समाधान तलाशने की कोशिश करेंगे। यह वही होर्मज स्ट्रेट है जहां से दुनिया के लगभग पांचवें हिस्से का कच्चा तेल समुद्री रास्ते से गुजरता है। इसलिए यहां पैदा होने वाला कोई भी संकट केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था, तेल की कीमतों और समुद्री व्यापार को प्रभावित करता है। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार मंगलवार को होने वाली इस बैठक का मुख्य उद्देश्यहाल के दिनों में पैदा हुए तनाव को कम करना और अंतरराष्ट्रीय जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करना है। दोनों देशों ने फिलहाल सैन्य कारवाही रोकने और बातचीत के जरिए समाधान निकालने पर सहमति जताई है। इसका मतलब यह है कि फिलहाल ना अमेरिका कोई नया हमला करना चाहता है और ना ही ईरान स्थिति को और ज्यादा बिगाड़ना चाहता है। हालांकि यह समझौता अभी बेहद नाजुक दौर में है। युद्ध विराम लागू हुए अभी केवल 11 दिन ही हुए हैं और दोनों देशों के बीच भरोसे का संकट पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने साफ चेतावनी दी है कि यदि ईरान ने समझौते की शर्तों का उल्लंघन किया तो अमेरिका दोबारा सैन्य कारवाई करने से पीछे नहीं हटेगा। ट्रंप ने यहां तक कहा कि जरूरत पड़ी तो अमेरिका काम पूरा करेगा। यहीं ईरान के खिलाफ और कठोर कदम उठाए जाएंगे। इसी बीच विवाद का सबसे बड़ा कारण बना है हॉर्मोस जलडमरू मध्य। वॉलस्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची का दावा है कि शुरुआती शांति समझौते के तहत हॉर्मोंस में यातायात प्रबंधन का विशेष अधिकार ईरान को मिला है। यानी कौन सा जहाज किस मार्ग से गुजरेगा इसमें ईरान की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। लेकिन अमेरिका इस दावे को पूरी तरह खारिज कर रहा है।
ईरान पहले भी संकेत दे चुका है कि भविष्य में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों से शुल्क लिया जा सकता है। हालांकि अमेरिका और खाड़ी देशों ने इस प्रस्ताव को पूरी तरह खारिज कर दिया है। ऐसे में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर दोनों देशों के बीच विवाद अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। समझौते में यह भी कहा गया था कि ईरान अपने पड़ोसी देशों के साथ मिलकर भविष्य की समुद्री प्रबंधन व्यवस्था तैयार करेगा। लेकिन अब यही समझौता दोनों देशों के बीच नई व्याख्या का विषय बन गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि दोहा की बैठक केवल होर्मुज तक सीमित नहीं होगी। इसमें भविष्य की समुद्री सुरक्षा, तेल आपूर्ति, क्षेत्रीय स्थिरता और अमेरिका ईरान संबंधों के अगले चरण पर भी चर्चा हो सकती है। यदि यह वार्ता सफल रहती है तो वैश्विक बाजारों को राहत मिल सकती है और तेल की कीमतों में स्थिरता आने की संभावना बनेगी। लेकिन यदि बातचीत विफल होती है तो मिडिल ईस्ट एक बार फिर बड़े सैन्य टकराव की ओर बढ़ सकता है। यानी फिलहाल दुनिया की निगाहें दोहा पर टिकी हैं। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि अमेरिका और ईरान क्या फैसला लेते हैं बल्कि यह भी है कि क्या यह बातचीत स्थाई शांति की शुरुआत बनेगी या फिर यह केवल अगले टकराव से पहले का एक छोटा विराम साबित होगी।