1994 में बसवराज बोम्मई को हराया, BJP ने 2012 में CM बनाया, अब कांग्रेस ने चुनाव लड़वाया, हुबली-धारवाड़ पर क्या है जगदीश शेट्टार का हाल?

By अभिनय आकाश | May 13, 2023

कांग्रेस के टिकट पर कर्नाटक चुनाव लड़ रहे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के जगदीश शेट्टार शनिवार सुबह के रुझानों के अनुसार हुबली-धारवाड़ मध्य निर्वाचन क्षेत्र से पीछे चल रहे हैं। 224 सदस्यीय कर्नाटक विधानसभा के लिए मतगणना शनिवार सुबह आठ बजे शुरू हुई। राज्य में 10 मई को मतदान हुआ था। शुरुआती रूझानों के अनुसार जगदीश शेट्टार 14 हजार वोटों से पीछे चल रहे हैं। 

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शेट्टार आरएसएस और जनसंघ के जमाने से ही बीजेपी में रहे हैं। उनके पिता शिवप्पा शेट्टार भी जनसंघ के साथ थे और जब 1990 के दशक में हुबली में ईदगाह मैदान में बवाल हुआ तो शेट्टार इसका हिस्सा थे। हुबली का ईदगाह मैदान 1991 की रथ यात्रा के बाद से ही ये सियासी जोरआजमाइश का मैदान बना रहा है। 1992 में जब मुरली मनोहर जोशी और नरेंद्र मोदी ने श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा फहराया था। उसी वक्त ईदगाह मैदान पर भी ऐसा ही कार्यक्रम रखा गया था। जिसका आयोजन संघ परिवार की तरफ से किया गया था। जगदीश शेट्टार ने भाजपा से टिकट से वंचित होने के बाद अप्रैल में भगवा पार्टी से नाता तोड़ लिया। भाजपा से अलग होने के समय, लिंगायत नेता ने कहा कि वह "अपमानित" महसूस कर रहे हैं।

शेट्टार ने बोम्मई को हराया था

ईदगाह मैदान का मुद्दा सूबे में बीजेपी के उदय की एक बड़ी वजहों में से एक माना जाता है। बीजेपी दक्षिण के दूसरे राज्यों में दूर-दूर तक नहीं नजर आ रही थी तो वहीं कर्नाटक में वो कई बार सत्ता पर काबिज हो चुकी है। साल 1994 में जगदीश शेट्टार हुबली ग्रामीण सीट से चुनाव लड़े और पहली बार विधानसभा पहुंचे। उन्होंने उस चुनाव में जिस उम्मीदवार को हराया था वो और कोई नहीं बल्कि कर्नाटक के सीएम बसवराज बोम्मई थे। बोम्मई तब जनता दल के उम्मीदवार थे। 

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2012 में रह चुके हैं सूबे के सीएम

जगदीश शेट्टार बीजेपी के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं। येदियुरप्पा की नाराजगी और अलग पार्टी बनाने के बाद बीजेपी ने उन्हें साल 2012 में मुख्यमंत्री बनाया था। लेकिन साल 2013 के विधानसभा चुनाव में वो सत्ता में वापसी नहीं करा पाए थे। कांग्रेस में जाने से पहले शेट्टार को मनाने की कोशिशें भी की गई राज्य के सीएम बोम्मई की माने तो पूर्व सीएम को मनाने के लिए अमित शाह ने फोन भी किया था और उन्हें दिल्ली में बड़ा पद देने का वादा भी किया था, लेकिन शेट्टार को मनाने की ये सारी कोशिशें नाकाम रहीं।


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