जीवन में रंगों का क्या है महत्व ? जानिये कौन-सा रंग किस बात को दर्शाता है

By फ़िरदौस ख़ान | Oct 02, 2021

मानव सभ्यता में रंगों का काफ़ी महत्व रहा है। हर सभ्यता ने रंगों को अपने तरीक़े से अपनाया। दुनिया में रंगों के इस्तेमाल को जानना भी बेहद दिलचस्प है। कई सभ्यताओं को उनके द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले रंगों की वजह से ही पहचाना गया। विक्टोरियन काल में ज़्यादातर लोग काला या स्लेटी रंग इस्तेमाल करते थे। एक तरह से ये रंग इनकी पहचान थे। फ़िरऔन हमेशा काले कपड़े पहनता था। वैसे भी हर रंग के अपने सकारात्मक और नकारात्मक असर होते हैं। इसलिए यह नहीं कर सकते कि काला रंग हमेशा बुरा ही होता है। हालांकि कई सभ्यताओं में इसे शोक का रंग माना जाता है। शिया मोहर्रम के दिनों में ज़्यादातर काले कपड़े ही पहनते हैं। विरोध जताने के लिए भी काले रंग का इस्तेमाल किया जाता है, जैसे काले झंडे दिखाना, सर पर काला कपड़ा या काली पट्‌टी बांध लेना। ऐसा इस्लामी देशों में ज़्यादा होता है, लेकिन अब भारत में भी इस तरह विरोध जताया जाने लगा है।

15वीं शताब्दी में स्विट्‌जरलैंड के चिकित्सक वॉन होहेनहैम ने ह्यूमन स्टडी पर काफ़ी शोध किया, लेकिन उनके तरीक़े हमेशा विवादों में रहे। उन्होंने ज़ख्म भरने के लिए रंगों का इस्तेमाल किया। 17-18वीं शताब्दी में न्यूटन के सिद्धांत ने अरस्तु के विशेष रंगों को सामान्य रंगों में बदल दिया। 1672 में न्यूटन ने रंगों पर अपना पहला परचा पेश किया। यह काफ़ी विवादों में रहा, क्योंकि अरस्तु के सिद्धांत के बाद इसे स्वीकार करना इतना आसान नहीं था। रंगों के विज्ञान पर काम करने वाले लोगों में जॉन्स वॉल्फगैंग वॉन गौथे भी शामिल थे। उन्होंने न्यूटन के सिद्धांत को पूरी तरह नकारते हुए थ्योरी ऑफ कलर पेश की। उनके सिद्धांत अरस्तु की थ्योरी से मिलते जुलते थे। उन्होंने कहा कि अंधेरे में से सबसे पहले नीला रंग निकलता है, वहीं सुबह के उगते हुए सूरज की किरणों से पीला रंग सामने आता है। नीला रंग गहरे रंगों का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि पीला रंग हल्के रंगों का। 19वीं शताब्दी में कलर थैरेपी का असर कम हुआ, लेकिन इसके बाद 20वीं शताब्दी में यह नए रूप में सामने आया। आज भी कई चिकित्सक कलर थैरेपी को इलाज का अच्छा ज़रिया मानते हैं और इससे अनेक बीमारियों का उपचार भी करते हैं। आयुर्वेद चिकित्सा में भी रंगों का विशेष महत्व है। रंग चिकित्सा के मुताबिक़ शरीर में रंगों के असंतुलन के कारण ही बीमारियां पैदा होती हैं। रंगों का समायोजन ठीक करके बीमारियों से छुटकारा पाया जा सकता है। ऑस्टवाल्ड ने आठ आदर्श रंगों को विशेष क्रम में संयोजित किया। इस चक्र को ऑस्टवाल्ड वर्ण कहा जाता है। इसमें पीला, नारंगी, लाल, बैंगनी, नीला, आसमानी, समुद्री हरा और हरा रंग शामिल है. 60 के दशक में एंथ्रोपॉलिजिस्ट्‌स केन ने रंगों पर अध्ययन किया। उनके मुताबिक़ सभी सभ्यताओं ने रंगों को दो वर्गों में बांटा-पहला हल्के रंग और दूसरा गहरे रंग।

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कौन-सा रंग क्या कहता है?

मूल रूप से इंद्रधनुष के सात रंगों को ही रंगों का जनक माना जाता है। ये सात रंग हैं लाल, नारंगी, पीला, हरा, आसमानी, नीला और बैंगनी। लाल रंग को रक्त रंग भी कहते हैं, क्योंकि ख़ून का रंग लाल होता है। यह शक्ति का प्रतीक है, जो जीने की इच्छाशक्ति और अभिलाषा को बढ़ाता है। यह प्रकाश का संयोजी प्राथमिक रंग है, जो क्यान रंग का संपूरक है। यह रंग क्रोध और हिंसा को भी दर्शाता है। हरा रंग प्रकृति से जुड़ा है। यह ख़ुशहाली का प्रतीक है। हमारे जीवन में इसका बहुत महत्व है। यह प्राथमिक रंग है। हरे रंग में ऑक्सीजन, एल्यूमीनियम, क्रोमियम, सोडियम, कैल्शियम, निकिल आदि होते हैं। इस्लाम में इसे पवित्र रंग माना जाता है। नीला रंग आसमान का रंग है। यह विशालता का प्रतीक है। भारत का क्रीड़ा रंग भी नीला ही है। यह धर्मनिरपेक्षता का भी प्रतीक है। यह एक संयोजी प्राथमिक रंग है। इसका संपूरक रंग पीला है। गहरा नीला रंग अवसाद और निराशा को भी प्रकट करता है। पीला रंग ख़ुशी और रंगीन मिज़ाजी को दर्शाता है। यह आत्मविश्वास बढ़ाता है। यह वैराग्य से भी संबंधित है। हिंदू धर्म में इसका विशेष महत्व है। विष्णु और कृष्ण को यह रंग प्रिय है। बसंत पंचमी तो इसी रंग से जुड़ा पर्व है। डल पीला रंग ईर्ष्या को दर्शाता है। स़फेद रंग पवित्रता और निर्मलता का प्रतीक माना जाता है। यह शांति और सुरक्षा का भाव पैदा करता है। यह अकेलेपन को भी प्रकट करता है। काला रंग रहस्य का प्रतीक है। यह बदलाव से रोकता है। यह नकारात्मकता को भी दर्शाता है।

-फ़िरदौस ख़ान

(लेखिका स्टार न्यूज़ एजेंसी में संपादक हैं)

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