By निरंजन मार्जनी | Feb 28, 2026
पिछले कई दिनों से पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच लगातार सैन्य संघर्ष जारी है। पाकिस्तान में अलग-अलग जगहों पर हो रहे आतंकी हमलों के लिए अफ़ग़ानिस्तान की तालिबान सरकार को ज़िम्मेदार ठहराते हुए पाकिस्तान ने अफ़ग़ानिस्तान पर हवाई हमले शुरू किए। पाकिस्तान का अफ़ग़ानिस्तान पर यह आरोप है की अफ़ग़ान तालिबान तहरीक-ए-तालिबान को समर्थन देता है। पाकिस्तान के में हुए कई हमलों में तहरीक-ए-तालिबान के शामिल होने का आरोप इस्लामाबाद की ओर से लगाया जा रहा है। पाकिस्तान का अफ़ग़ानिस्तान में आतंकी संघटन आय एस आय एस की मजूदगी का भी दावा है। बीते 3-4 वर्षों से पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच रूक-रूक कर झड़पें होती रही हैं। अक्टूबर 2025 में क़तर की मध्यस्थता से दोनों पड़ोसियों में शांति समझौते का भी प्रयास किया गया। लेकिन इस्लामाबाद और काबुल किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंचे।
कुछ महीनों के विराम के बाद 11 फरवरी से फिर दोनों देशों में जंग छिड़ गई है। अभी भी दोनों तरफ़ से एक दुसरे की सीमा के अंदर हवाई हमले और सैन्य कार्रवाई जारी है।
दक्षिण एशिया के इन दो पड़ोसी देशों के रिश्ते हमेशा से जटिल रहे हैं। दोनों देशों के बीच के विवाद की जड़ अंग्रेज़ो के शासन काल में है। अंग्रेज़ों के समय में जब भारत और पाकिस्तान का विभाजन हुआ उस वक़्त पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच भी कुछ इलाकों का बंटवारा हुआ। अंग्रेज़ शासकों ने पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच एक सीमा रेखा खिंच दी जिसे डुरंड लाईन कहा जाता है। इस डुरंड लाईन से पख़्तून बहुल इलाका पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान में बंट गया। अफ़ग़ानिस्तान ने इस सीमा रेखा को कभी स्वीकार नहीं किया और पाकिस्तान के हिस्से में गए इलाके (खैबर-पख़्तूनख़्वा) पर भी हमेशा दावा किया है। सीमा विवाद पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच के संघर्ष की एक महत्त्वपूर्ण वजह रही है।
सीमा विवाद और आतंकवाद- इन दो मुद्दों से पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान का संघर्ष केवल द्विपक्षीय मामला लग सकता है। लेकिन इस जंग के मायने और परिणाम सिर्फ़ दो देशों तक सीमित नहीं हैं।
एक, इस वक़्त दुनिया में अनेक युद्ध चल रहे हैं, जैसे रूस-यूक्रेन युद्ध और इस्राएल-हमास युद्ध। अमेरिका भी ईरान पर हमले की तैयारी कर रहा है। ऐसे में एक और युद्ध से विश्व में अस्थिरता, असुरक्षितता और आर्थिक अनिश्चितता और बढ़ेगी।
दूसरा, हाल के समय में पाकिस्तान और अमेरिका के बीच बढ़ती नज़दीकियों को देखकर इससे इनकार नहीं किया जा सकता की अमेरिका इस जंग के ज़रिये अपना हित साधने की कोशिश करे। अगर अमेरिका मध्यस्थता करके दोनों देशों में शांति प्रस्थापित करता है तो अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड़ ट्रम्प इसे ख़ुद की कामयाबी बता सकते हैं और अपने आप को नोबेल शांति पुरस्कार मिलने योग्य बता सकते हैं।
तीसरा, अमेरिका यह भी चाहेगा की रूस किसी तरह अफ़ग़ानिस्तान की मदद करे। अगर ऐसा होता है तो संभव है रूस का ध्यान यूक्रेन से भटके। इससे यूरोप ऊपर लगातार मंडरा रहा जंग का ख़तरा कुछ हद तक कम होगा। अमेरिका की कोशिशों से अगर यह हो पाता है, तो अमेरिका के यूरोपीय देशों से रिश्ते सुधर सकते हैं। डोनाल्ड ट्रम्प के दुसरे कार्यकाल में अमेरिका और यूरोप के रिश्तों में क़ाफी कड़वाहट पैदा हुई है।
चौथा, अगर रूस अफ़ग़ानिस्तान की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मदद नहीं करता, और अमेरिका इस युद्ध को रोकने में कामयाब होता है, तो इससे अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान से भी अपनी नज़दीकियां बढ़ाने की कोशिश करेगा। अफ़ग़ानिस्तान में प्राकृतिक संसाधन और खनिजों का बहुत बड़ा भंडार है, जिसका फायदा अमेरिका लेना चाहेगा।
इस युद्ध के भारत के लिए भी कई मायने हैं।
एक, अगर यह युद्ध लंबे समय तक चलता रहा तो इससे दक्षिण एशिया में अस्थिरता बढ़ेगी और पूरे प्रांत की सुरक्षा को ख़तरा पैदा हो सकता है। दक्षिण, पश्चिम और मध्य एशिया से भारत के कई आर्थिक और रणनीतिक हित जुड़े हुए हैं जिनपर यह युद्ध असर डाल सकता है।
सबसे पहले तो अफ़ग़ानिस्तान भारत के लिए मध्य एशिया में पहुंचने का एक महत्त्वपूर्ण ज़रिया हैं। भारत इस वक़्त चाबहार बंदरगाह और अंतरराष्ट्रीय उत्तर दक्षिण परिवहन गलियारा इन दो प्रकल्पों पर काम कर रहा है जो भारत को ईरान और अफ़ग़ानिस्तान के ज़रिये मध्य एशिया से जोड़ते हैं। इन गलियारों का व्यापर और सामान की आवाजाही के लिए परिक्षण भी हो चूका है। पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान के बीच अगर लंबी जंग चलती है तो इसका असर भारत के मध्य एशियाई देशों के साथ व्यापार पर होगा।
दूसरा, कूटनीति के मामले में अफ़ग़ानिस्तान फिलहाल दुनिया के कई देशों के लिए एक जटिल समस्या है। इस वक़्त अफ़ग़ानिस्तान के साथ बहुत काम देशों के कूटनीतिक रिश्ते हैं। भारत ने भी अफ़ग़ानिस्तान के तालिबान शासन को मान्यता नहीं दी है। लेकिन भारत ने अफ़ग़ानिस्तान से अपने रिश्ते कायम रखे हैं। संतुलित कूटनीति द्वारा भारत ने इस क्षेत्र में अपने हित संभाले हैं। पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान का संघर्ष और इसमें दुसरे देशों का दख़ल देने से शायद भारत को अपने मध्य एशिया नीति पर पुनर्विचार करना पेड़ सकता है।
पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच का संघर्ष सिर्फ दक्षिण एशिया के लिए ही नहीं बल्कि पूरे एशिया और दुनिया के लिए भी चिंता का विषय है। इस संघर्ष का जारी रहना विश्व की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा को असंतुलित कर सकता है।