By अभिनय आकाश | Jan 17, 2022
कोविड संक्रमण से मारे गए पारसी लोगों को उनके धार्मिक तरीके से अंतिम संस्कार के लिए इजाजत देने से सुप्रीम कोर्ट ने इनकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने टॉवर ऑफ साइलेंस में कोविड संक्रमण से मारे गे पारसी लोगों के अंतिम संस्कार की इजाजत देने से इनकार किया है। कोर्ट की तरफ से ये निर्णय केंद्र सरकार के अंतिम संस्कार के लिए जारी एसओपी को बदलने से इनकार करने पर लिया गया है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि वह पारसी समुदाय के अंतिम संस्कार को समायोजित करने के लिए कोविड-19 से मरने वालों के शवों के श्मशान / दफन प्रोटोकॉल में बदलाव नहीं करेगी।
पारसी समुदाय ने दायर की थी याचिका
गौरतलब है कि पारसी समुदाय की शिकायत है कि कोविड-19 से मरने वाले समुदाय के सदस्यों का पांरपरिक रूप से अंतिम संस्कार नहीं हो पा रहा है। पारसी समुदाय की याचिका गुजरात उच्च न्यायालय ने गत वर्ष 23 जुलाई को खारिज कर दी थी, जिसके खिलाफ शीर्ष अदालत में अपील की गई। शीर्ष अदालत ने छह दिसंबर को मामले में केंद्र और गुजरात सरकार से जवाब तलब किया। याचिका में पारसी समुदाय ने अदालत से अनुरोध किया है कि कोविड-19 से मरने वाले समुदाय के सदस्यों को उनकी परंपरा के अनुसार अंतिम संस्कार करने की अनुमति दी जाए, बजाय कि उनको जलाने की।
क्या है दोखमेनाशिनी
पारसी भारत के समृद्ध समुदायों में से एक है। पारसी अहुरमज्दा भगवान में विश्वास रखते हैं। जिस तरह हिन्दू और सिख धर्म में शव का दाह-संस्कार किया जाता है, इस्लाम और ईसाई धर्म के लोग शव को दफनाते हैं, उसी तरह पारसी शव को ‘कुआं/टॉवर ऑफ साइलेंस’ नामक संरचना में ऊंचाई पर रखा जाता है जिन्हें गिद्ध खाते हैं और सूर्य के संपर्क में आने वाले अवशेषों को क्षत-विक्षत किया जाता है। अधिकांश पारसी इसका पालन करते हैं। इसे दोखमेनाशिनी कहा जाता है।