By अभिनय आकाश | Jul 30, 2026
मिडिल ईस्ट में मौजूद अमेरिकी अड्डों चाहे वो जॉर्डन हो, कुवैत या फिर बहरीन। पिछले दिनों ईरान ने जो मार मारी है और अमेरिकी सेंटर्स को निशाना बनाकर तबाही अंजाम दी है। उसने डिफेंस मैकैनिज्म के बीच इस बात की बहस तो बढ़ा दी है कि आखिर ईरान इतना सटीक कैसे मार रहा है। चाहे वो बैलेस्टिक मिसाइल हो या फिर ड्रोन अमेरिकी ठिकानों पर सटीक लग रहे हैं और खुद अमेरिका ने स्वीकारा है कि उसके सैनिकों की जान गई है। संख्या को लेकर आंकड़े भले ही छिपाए जा सकते हैं लेकिन जान माल का नुकसान हुआ है। इसमें कोई दो राय नहीं है। इतना ही नहीं ईरान ने कई बार तो मिडिल ईस्ट में अमेरिकी ठिकानों की तस्वीरें भी अपने मीडिया के जरिए पूरी दुनिया को दिखाई। लेकिन ये कैसे मुमकिन हो पा रहा है? यह अमेरिका को सीधा चैलेंज है। एक्सपर्ट कहते हैं कि हो सकता है जुलजनाहा ने रास्ता दिखाया हो और फिर शाहिद हदीद ड्रोन और हज कासिम और खैबर शिकन मिसाइलों ने अमेरिकी बेस को नेस्तोनाबूद कर दिया हो।
जुलजनाह को बहुत वफादार माना जाता था और वह अपनी ताकत, धीरज और वफादारी के लिए मशहूर था। इस जंग के दूसरे दौर में ईरान सबसे ज्यादा खैबर शिकन और हज कासिम मिसाइल से हमले अंजाम दे रहा है। खैबर शिकन की खासियत तो हमने आपको अपनी एक रिपोर्ट में बताई थी। लेकिन हज कासिम मिसाइल को पहली बार साल 2020 में देखा गया था। ईरान का दावा है कि हज कासिम मिसाइल 1400 किमी की रेंज के साथ 120,000 किमी प्रति घंटे की गति तक पहुंच सकती है। यह मिसाइल 500 कि.ग्र. के वॉरहेड के साथ हमला कर सकती है और इसका नाम आईआरजीसी के कुत्स फोर्स के कमांडर कासिम सुलेमानी के नाम पर रखा गया है। जिन्हें एक ड्रोन हमले में अमेरिका ने कत्ल कर दिया था। इतना ही नहीं अमेरिका और इसराइल के साथ हो सकने वाली संभावित जंग के लिए ईरान की तैयारियां पुख्ता बताई जा रही हैं।
वो बार-बार कह रहा है कि हम तैयार हैं। ईरान ने इमाद मिसाइल भी निकाल ली है। अपनी इमाद मिसाइल को पहली बार ईरान ने दुनिया को 2024 में दिखाया था। यह मिसाइल अपनी पैतरेबाजी के लिए जानी जाती है जो इसे उड़ान के दौरान रास्ता बदलने की सलाहियत देती है। इससे इस मिसाइल को किसी एयर डिफेंस सिस्टम से इंटरसेप्ट करना बहुत मुश्किल हो जाता है। इसकी रेंज 1700 किमी है और इसके वार हेड का वजन 750 किलो है। इसके अलावा 40 दिनों की जंग में ईरानी मिसाइल सिज्जील के चर्चे तो पूरी दुनिया में हुए थे। मिसाइल का नाम सिजील रखने के पीछे ईरान की सोच सूर अलफील जो कि कुरान में है यानी हाथियों वाला सूर उससे ली गई है और सिज्जील उस झुंड को कहा जाता है जो ताकतवर दुश्मन का घमंड भी चकनाचूर कर दे। सोशल मीडिया में चर्चा है कि ईरान ने ऐसा कर दिखाया है। जब 29 जुलाई को प्रेसिडेंट ट्रंप और पीएम नितिन याहू वाशिंगटन में ईरान को निस्तनाबूद करने के मंसूबे बना रहे थे। उधर ईरान की बैलेस्टिक मिसाइल जॉर्डन पर गरज रही थी और अमेरिकी बेसों को नाबूद कर रही थी। जी हां, वाशिंगटन में ट्रंप और नितिन याहू ने तय किया कि किसी भी कीमत पर ईरान को न्यूक्लियर पावर हासिल नहीं करने दिया जाएगा।