कैसे-कैसे लोग (व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ | Sep 24, 2025

आजकल समझदार लोगों की बड़ी मांग है। हर जगह इन्हीं की पूछ-परख हो रही है। पहले सिर्फ़ अख़बारों में इनकी गिनती होती थी, कि "फलां काम के लिए फलां समझदार व्यक्ति ने हामी भर दी।" अब तो सोशल मीडिया के हर कोने में ये अपनी समझदारी का झंडा उठाए घूमते हैं।


सुबह-सुबह आप फ़ेसबुक खोलिए, कोई न कोई ज्ञानी महात्मा मिल जाएगा जो बताएगा कि "जीवन को ऐसे जियो।" दोपहर में वॉट्सऐप पर एक संदेश आएगा जिसमें लिखा होगा, "सच्चा सुख सिर्फ़ इसमें है।" शाम को आप टीवी खोलेंगे तो कोई विशेषज्ञ आपको आर्थिक समझदारी का ज्ञान देगा, कि "कैसे अपनी गाढ़ी कमाई को बढ़ाएं।"


और हम लोग हैं, जिन्हें कोई समझदार नहीं मानता। हम जो सुबह उठकर, बिना किसी ज्ञान के, बस उठ जाते हैं। हम जो चाय पीते हुए, यह नहीं सोचते कि इससे हमारी आध्यात्मिक उन्नति हो रही है या नहीं। हम जो दफ्तर जाते हुए सिर्फ़ यह सोचते हैं कि आज काम कैसे पूरा होगा, न कि यह कि "काम ही पूजा है" इस सिद्धांत को कैसे जीवन में उतारें।

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समझदार लोग जब मिलते हैं तो उनकी बातचीत भी समझदारी से भरी होती है। एक कहेगा, "देखो भाई, आजकल यह जो सब हो रहा है, यह सब राजनीति है।" दूसरा कहेगा, "अरे, आप नहीं समझते, यह तो आर्थिक चक्र है।" तीसरा अपनी बात रखेगा, "ये सब मानव स्वभाव की देन है।" और हम सिर्फ़ सिर हिलाते रहते हैं। हमें यह भी नहीं पता होता कि 'मानव स्वभाव' में क्या-क्या आता है। शायद सुबह-सुबह उठकर नींद पूरी न होने पर चिड़चिड़ाना भी इसी में आता होगा।


सबसे बड़ी मुश्किल तब होती है जब कोई समझदार व्यक्ति हमसे सवाल पूछता है। "अरे! आप क्या सोचते हैं?" हम चुप रहते हैं। क्या बताएं? कि हम कुछ नहीं सोचते? कि हमारी सोच तो सिर्फ़ इस बात तक सीमित है कि आज शाम को घर के लिए कौन-सी सब्ज़ी खरीदनी है?


ये समझदार लोग ही हैं जो हर समस्या का समाधान जानते हैं। अगर देश में महंगाई बढ़ रही है, तो उनके पास उसका कारण भी है और इलाज भी। अगर बेरोजगारी है, तो वे बताते हैं कि "बस, यह सब मानसिकता की बात है।" उनके हिसाब से अगर हम अपनी मानसिकता बदल लें तो अगले दिन ही हमें नौकरी मिल जाएगी।


हम जैसे नासमझ लोग इसी उलझन में जीते हैं कि "काश, हम भी समझदार होते!" लेकिन फिर सोचते हैं, अगर हम भी समझदार हो गए तो हम भी हर बात पर ज्ञान देने लगेंगे। हमारी भी ज़िंदगी में जटिलता आ जाएगी। हमारी सोच भी ‘आर्थिक चक्र’ और ‘मानव स्वभाव’ के चक्र में फंसकर रह जाएगी।


तो चलिए, हम जैसे नासमझ लोग नासमझ ही ठीक हैं। न किसी को ज्ञान देना है, न किसी से ज्ञान लेना है। बस सुबह उठकर चाय पीनी है, काम पर जाना है, शाम को घर लौटकर परिवार के साथ बैठना है। हम सोचते हैं कि इससे ज़्यादा और क्या चाहिए? लेकिन शायद यही हमारी नासमझी का सबसे बड़ा सबूत है। क्योंकि समझदार लोग कहते हैं कि "जिंदगी का असली मकसद तो जीवन को समझना है।" और हम सिर्फ उसे जी रहे हैं।


- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’,

(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

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