घर में नहीं दाने, Muhammad Yunus चले Pakistan से JF 17 Thunder Fighter Jet खरीद कर लाने

By नीरज कुमार दुबे | Jan 08, 2026

दक्षिण एशिया के सामरिक परिदृश्य में एक नई हलचल तब देखने को मिली जब पाकिस्तान ने दावा किया कि बांग्लादेश उसके साथ जेएफ-17 थंडर लड़ाकू विमान की खरीद में रुचि दिखा रहा है। हम आपको बता दें कि यह जानकारी पाकिस्तान और बांग्लादेश के वायुसेना प्रमुखों के बीच इस्लामाबाद में हुई उच्च स्तरीय बैठक के बाद सामने आई। इस बैठक में दोनों देशों ने रक्षा सहयोग को आगे बढ़ाने, प्रशिक्षण, तकनीकी सहयोग और वायुसेना की क्षमताओं को मजबूत करने जैसे मुद्दों पर चर्चा की। पाकिस्तान की ओर से यह भी कहा गया कि बातचीत के दौरान जेएफ-17 जैसे बहु भूमिका वाले लड़ाकू विमानों की संभावित बिक्री पर गंभीर विचार हुआ।


हम आपको बता दें कि जेएफ-17 थंडर एक हल्का, अपेक्षाकृत सस्ता और बहु उद्देश्यीय लड़ाकू विमान माना जाता है, जिसे पाकिस्तान और चीन ने मिलकर विकसित किया है। पाकिस्तान इसे लंबे समय से अपनी वायुसेना की रीढ़ के रूप में पेश करता रहा है। हालांकि बांग्लादेश की ओर से अब तक इस प्रस्ताव पर कोई औपचारिक बयान नहीं आया है, लेकिन पाकिस्तान का यह दावा ही क्षेत्रीय राजनीति और सुरक्षा विश्लेषकों के लिए काफी है। इसी बातचीत के दौरान दोनों देशों के बीच वर्षों से बंद सीधी हवाई सेवाओं को फिर से शुरू करने पर भी सहमति बनी, जिसे आपसी संबंधों में नई गर्माहट के रूप में देखा जा रहा है। यह घटनाक्रम ऐसे समय पर सामने आया है जब बांग्लादेश की आंतरिक आर्थिक स्थिति दबाव में है और क्षेत्रीय स्तर पर शक्ति संतुलन लगातार बदल रहा है।

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देखा जाये तो बांग्लादेश का पाकिस्तान से जेएफ-17 लड़ाकू विमान खरीदने में रुचि दिखाना केवल एक रक्षा सौदे की खबर नहीं है, यह एक तेज और साफ संदेश है। यह संदेश है कि ढाका अब नए विकल्पों की ओर बढ़ने को तैयार है। सवाल यह नहीं है कि जेएफ-17 कितना सक्षम या सस्ता विमान है, असली सवाल यह है कि बांग्लादेश यह कदम क्यों उठा रहा है और इसके पीछे की मंशा क्या है।


सबसे पहले सामरिक दृष्टि से देखें तो जेएफ-17 चीन और पाकिस्तान की संयुक्त रणनीतिक सोच का उत्पाद है। यह विमान तकनीकी रूप से भले ही मध्यम श्रेणी का हो, लेकिन इसका राजनीतिक वजन कहीं ज्यादा है। पाकिस्तान इसे भारत के खिलाफ अपनी क्षमता के प्रतीक के रूप में पेश करता रहा है। ऐसे में बांग्लादेश द्वारा इस विमान में रुचि दिखाना सीधे तौर पर क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में नई रेखाएं खींचने जैसा है। भारत की पूर्वी सीमाओं के पास पाकिस्तान से जुड़ा कोई भी रक्षा सहयोग स्वाभाविक रूप से चिंता पैदा करता है।


अब इससे भी बड़ा और चौंकाने वाला पहलू है बांग्लादेश की आर्थिक हालत। देश इस समय गंभीर आर्थिक दबावों से जूझ रहा है। महंगाई, विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव, आयात खर्च और आम जनता की क्रय शक्ति में गिरावट जैसी समस्याएं साफ दिखाई दे रही हैं। ऐसे माहौल में लड़ाकू विमानों की खरीद कोई मामूली खर्च नहीं है। यह अरबों रुपये की दीर्घकालिक प्रतिबद्धता होती है, जिसमें रखरखाव, प्रशिक्षण और भविष्य के उन्नयन का बोझ भी जुड़ा रहता है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब देश की अर्थव्यवस्था सांसें गिन रही हो, तब आसमान में उड़ने वाले विमानों पर इतना भारी दांव क्यों लगाया जा रहा है?


देखा जाये तो इस सवाल का जवाब राजनीति और संदेश में छिपा है। पाकिस्तान से हथियार खरीदना केवल तकनीकी फैसला नहीं, बल्कि एक राजनीतिक कदम है। 1971 की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को देखते हुए पाकिस्तान और बांग्लादेश के संबंध कभी सहज नहीं रहे। अब अचानक रक्षा सहयोग, सीधी हवाई सेवाएं और सैन्य बातचीत यह संकेत देती है कि ढाका पुराने अध्यायों को पीछे छोड़कर नए समीकरण गढ़ना चाहता है। लेकिन यह समीकरण किसके खिलाफ और किसके लिए है, यह सवाल अनदेखा नहीं किया जा सकता।


भारत के संदर्भ में यह घटनाक्रम विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। भारत और बांग्लादेश के संबंध हाल के वर्षों में कभी सहयोग तो कभी तनाव के दौर से गुजरे हैं। सीमा, जल बंटवारा और राजनीतिक बयानबाजी ने रिश्तों को जटिल बनाया है। ऐसे में पाकिस्तान के साथ बांग्लादेश का बढ़ता रक्षा संवाद नई रणनीतिक चुनौती के रूप में उभर सकता है। यह केवल सैन्य संतुलन की बात नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय भरोसे की भी परीक्षा है।


यह भी गौर करने लायक है कि चीन इस पूरी तस्वीर में खामोश लेकिन मजबूत भूमिका निभा रहा है। जेएफ-17 के जरिए चीन अप्रत्यक्ष रूप से बांग्लादेश की रक्षा व्यवस्था में अपनी पैठ बढ़ा सकता है। यानी यह सौदा तीन देशों की रणनीति का संगम बन सकता है, जहां आर्थिक रूप से दबाव में खड़ा बांग्लादेश खुद को एक बड़े भू राजनीतिक खेल का हिस्सा बना रहा है।


बहरहाल, यह साफ है कि बांग्लादेश की यह पहल सिर्फ लड़ाकू विमान खरीदने की इच्छा नहीं, बल्कि अपनी विदेश और सुरक्षा नीति को नए सांचे में ढालने का प्रयास है। लेकिन जब अर्थव्यवस्था कमजोर हो, तब आक्रामक सैन्य फैसले अक्सर जोखिम भरे साबित होते हैं। यह कदम यह दर्शाता है कि ढाका आर्थिक तर्कों से ज्यादा सामरिक और राजनीतिक संकेतों को महत्व दे रहा है। दक्षिण एशिया के लिए यह एक चेतावनी है कि आने वाले समय में यहां की राजनीति व सुरक्षा और ज्यादा जटिल और टकरावपूर्ण हो सकती है।

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