हमारा पार्षद कैसा हो (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | May 14, 2026

हमारे शहर में स्थानीय लोकसभा यानी नगर परिषद का चुनाव घोषित हो गया है। अखबारों को नई मगर घिसी पिटी ख़बरें मिल गई हैं और वोटरों को एक और चुनाव। कॉलम छप रहे हैं, कैसा हो पार्षद, यानी उन्होंने औसत पार्षद के बारे में लोगों की राय पूछी है। राय जैसी भी हो लेकिन राय देने वालों की फ़ोटोज़ बढ़िया चमकदार छप रही हैं, जैसे आधार कार्ड या वोटर कार्ड धारक असली जीवन में नहीं पहचाना जाता कुछ ऐसा ही राय देने वाले लग रहे।

उनकी राय पढने के बाद जो मुझे समझ में आया उसके अनुसार हमारा पार्षद कुछ ऐसा होना चाहिए। उसे पार्षद बनते ही ठेकेदार का चोगा पहन लेना चाहिए और स्वार्थ भाव से सड़क, गली, नाली, सुरक्षा दीवार सेवा का ठेका लेने के लिए पूजा शुरू कर देनी चाहिए। पार्षद बनने के लिए किसी भी वार्ड से चुनाव जैसे कैसे ऐसे वैसे कर जीत लेना चाहिए। वह राजनीति को समाजसेवा का ज़ज्बा बताए। धर्म और जाति के आधार पर भेदभाव ज़रूर करे। सबकी बातों को गंभीरता से न ले। खुद चुनाव लड़ने में कोई पेंच हो तो पत्नी को पार्षद बनवा देना चाहिए। हमारा पार्षद ऐसा होना चाहिए जो जन सुविधाओं, गलियों में गंदगी, बंद स्ट्रीट लाइटों और टूटी सड़कों पर ज़्यादा ध्यान न देकर कई तरह की राजनीति करे और अपने ख़ास बंदों के काम करवाए। मंच पर भाषण बढ़िया दे, अपना फायदा सोचे और अपनी राजनैतिक पार्टी को मज़बूत करे। उसकी छवि स्वच्छ होने की बिलकुल ज़रूरत नहीं।

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ऐसा कहना तो ख़्वाब में बात करना होगा कि पार्षद पद के उम्मीदवार में ईमानदारी होनी ज़रूरी है। पार्षद को बातें ज्यादा काम कम करना चाहिए। जीतने के बाद ख़ास ख़ास बंदों के फोन उठाने चाहिएं। दूसरी पार्टी के बंदों के फोन नम्बर डीलीट कर देना चाहिए। ऐसा भी कहा जाता है कि वार्ड की हर समस्या की ज़िम्मेदारी उसकी होती है। अगर ऐसा है तो वह अपने घर का काम कब करेगा। किसी ने कहा कि उसे बुद्धिजीवी होना चाहिए। बुद्धिजीवी राजनीति में आकर अबुद्धिजीवियों वाले उलटे, टेढ़े, मेढ़े भूरे और काले काम करेंगे तो पहले से जो अबुद्धिजीवी अराजनीति कर रहे हैं उनका भविष्य क्या होगा। किसी ने नहीं कहा कि संभावित पार्षद गंजा नहीं होना चाहिए। उसे सुन्दर और शाकाहारी होना चाहिए या उसे पहले से ही ठेकेदार होना चाहिए।   

ऐसा होना मुश्किल है लेकिन लोग चाहते हैं कि वह सर्वधर्म सम्मान वाला हो। क्षेत्रवाद और धर्म जैसी संकीर्ण मानसिकता से दूर हो। पार्षद महिला हो तो उनका पति लीडर बनकर न घूमे। हर गली में नियमित रूप से जाए। लोगों के बोलने से पहले ही समस्याओं का समाधान करे। सड़कों को बिना गड्ढों के रखे। पता नहीं आम जनता, पार्षद जैसे राजनीतिज्ञ से भी इतना कुछ असंभव सा चाहती है। वह अपने घर के बाहर अभी अपने नाम का बोर्ड भी नहीं लगा पाता जनता काम बताना शुरू कर देती है। पार्षद बनने से पहले वह भी आम आदमी ही होता है। पार्षद बनने के बाद भी उसे अपने बच्चों और पत्नी के काम करने पड़ते हैं। इसलिए जैसे हम दूसरे राजनेताओं, विधायक और मंत्री से आशा रखते हैं वैसी ही उम्मीद उससे भी रखने में क्या हर्ज़ है, तो कहिए हमारा पार्षद कैसा हो, दूसरे नेताओं जैसा ही हो।  

- संतोष उत्सुक

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