पहले चालान के क्या कहने (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Feb 17, 2024

पिछली सदी की बात करें तो कोई वाहन चालक अनजाने में या जानबूझकर ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन कर देता था तो पुलिस पूरा सहयोग करती थी। सदभावपूर्ण बातचीत के आधार पर कुछ लेकर उसे जाने की अनुमति देती थी। चालक ज़्यादा चालाक बनता था या कागज़ परेशान करते थे तब ही चालान काटा जाता था। वाहन चालकों ने पुलिस को पटाने या धोखियाने के अपने अपने स्किल विकसित किए हुए थे। सड़क पर सहयोग का वातावरण बना रहता था। एक बार की बात है, पुलिस विभाग में नए भर्ती हुए कर्मचारी ने, एक पुराने स्कूटर का चालान करने के लिए जो कानूनी धाराएं हो सकती थी लगा दी। चालान की कुल राशी स्कूटर की कीमत से कहीं ज़्यादा बैठी तो परेशानी का मौसम बन गया। चालक के पास इतने पैसे नहीं थे और कर्मचारी के पास अनुशासन और ईमानदारी दोनों नए नए थे। अनुभवी सलाह यह निकली, चालक अपना घिसा पिटा स्कूटर ट्रैफिक पुलिस कर्मचारी के पास छोड़ आए ताकि उनके अनुभव में बढ़ोतरी हो ।

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हैरानी ने सभी का चालान कर दिया। चालक बहुत ज्यादा हैरान हुआ, उसे ज्यादा गुस्सा आया। वह व्यवस्था से झगड़कर चला गया जिसने उसका लाइसेंस पहली बार छ महीने के लिए सस्पेंड कर दिया। एफआईआर हुई, कई धाराओं में केस दर्ज हो गया। बिना हेमलेट चालान के दो हज़ार दे देता तो संभवत बच जाता। अब उस पर जुर्माने के पौने दो लाख रूपए बाक़ी हैं। दिलचस्प यह है कि एक्टिवा की कीमत चालीस हज़ार के करीब है।

चालक ज़रूर सोच रहा होगा कि काश चालान ऑनलाइन न होकर मैनुअल होता तो सीन कुछ और ही होता। ऑनलाइन चालान प्रणाली द्वारा किए गए पहले चालान बारे उसे सूचना मिल जाती तो वह खबरदार हो जाता। बिना हेमलेट मैनुअल चालान को ज़िंदगी का पहला चालान न समझता।  

- संतोष उत्सुक

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