क्या था कर्पूरी ठाकुर का 'आरक्षण दांव', नीतीश-लालू के गुरू को भारत रत्न से कमंडल के साथ मंडल का डबल डोज

By अभिनय आकाश | Jan 24, 2024

समस्तीपुर का पितौढियां गांव, क्या था केपी का आरक्षण वाला दांव। दो बार के सीएम लेकिन अपना एक घर तक नहीं। ऐसा मुख्यमंत्री जो करता था रिक्शा की सवारी, लालू और नीतीश के गुरू, जेपी-लोहिया को मानते आदर्श। मंडल कमीशन से पहले बिहार में ओबीसी आरक्षण देने वाले नेता। आज का एमआरआई एक ऐसी शख्सियत पर करेंगे जिन्हें भारत रत्न से नवाजने का ऐलान मोदी सरकारी की तरफ से किया गया है। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर की 24 जनवरी को 100वीं जयंती है। कर्पूरी जयंती पर राष्ट्रीय जनता दल से लेकर जनता दल यूनाइटेड तक ने अपने-अपने स्तर पर कार्यक्रम आयोजित किए। लेकिन अचानक केंद्र सरकार की तरफ से लिए गए फैसले ने बिहार की सियासत में खलबली मचा दी। 

बिहार के समस्तीपुर जिले के एक छोटे से गाँव के रहने वाले ठाकुर एक स्वतंत्रता सेनानी थे और 1924 में अंग्रेजों के खिलाफ भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने के कारण उन्हें जेल में डाल दिया गया था। उन्होंने कहा था कि हमारे देश की आबादी इतनी अधिक है कि केवल थूक देने से अंग्रेजी राज बह जाएगा। वे अगस्त क्रांति में शामिल हुए। 9 अगस्त 1942 को दरभंगा में छात्रों की बैठक हुई। कर्पूरी ठाकुर ने क्रांतिकारी भाषण दिया। उसका असर ऐसा हुआ कि सरकारी भवनों पर तिरंगा फहराने लगा। रेल की पटरियां उखड़ने लगी। 1945 में कर्पूरी की जेल यात्रा समाप्त हुई। कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के सक्रिय सदस्य बने। नारा दिया- कमाने वाला खाएगा, लूटने वाला जाएगा। नया जमाना आएगा। गांव-गंवा में ये नारा चर्चित हो गया। 1952 में ठाकुर पहली बार विधायक बने और राज्य स्तर पर उनकी चुनाव जीतने की लय 1985 तक जारी रही। 'जन नायक' के नाम से जाने जाने वाले कर्पूरी ठाकुर दो बार 1970 में (संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के साथ) ) और 1977 (जनता पार्टी के साथ) बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया। कहा जाता है कि सीएम के रूप में ठाकुर ने हिंदी भाषा को बढ़ावा देने, स्कूल की फीस माफ करने और पंचायती राज व्यवस्था को मजबूत करने के उद्देश्य से कई नीतियां पेश कीं। 

फर्स्ट डिवीजन से पास किए हो? मेरा पैर दबाओ

साल 1938 में समस्तीपुर जिले के पितौजिया गांव में एक लड़का मैट्रिक की परीक्षा का परिणाम देखकर घर लौट रहा था।  पिता गोकुल ठाकुर गांव में हजाम थे। पढ़ने के बहुत मौके नहीं थे। बहुत कशमकश के साथ पढ़ाई चल रही थी। लेकिन मैट्रिक के नतीजों में मेहनत का रंग साफ नजर आया। लड़का भागता हुआ पिता के पास पहुंचा और प्रफुल्लता से बोला- बापूजी मैट्रिक में पहले दर्जे से पास हुआ हूं। ये वो दौड़ था जब ग्रामीण इलाकों में मैट्रिक पास खोजे से नहीं मिलते थे। फर्स्ट डिविजन तो बहुत दूर का सपना होता था। लड़के को लेकर पिता गांव के जमींदार के पास खुशखबरी देने के लिए पहुंचे। सोचा कुछ सहारा हो जाएगा। लड़के ने खुश होकर जमींदार को बताया कि मैट्रिक के इम्तिहान में अव्वल दर्जे से पास हुआ हूं। खाट पर लेटे जमींदार ने जवाब दिया पहले दर्जे से पास हुए हो, तू ही पास किया है मैट्रिक, अच्छा ठीक है। उसके बाद सामने एक टेबल रखी थी। जमींदार ने टेबल पर अपना पैर रखते हुए कहा चलो अब गोर (पांव) दबाओ। इस घटना के 32 साल बाद इस लड़के के गोर मुख्यमंत्री की कुर्सी के नीचे टिके थे। 

क्या था कर्पूरी ठाकुर का 'आरक्षण दांव'

जातियों का विभाजन केवल बिहार में नहीं है। हां यहां लकीरें थोड़ी गहरी हैं। लेकिन गांव में अलग-अलग जातियों के हिसाब से वहां पर टोले-मोहल्ले होना एक आम बात है। लेकिन कहते हैं न कि इतिहास ने लकीरें भले ही गहरी कर दी लेकिन वर्तमान में कुछ चीजें बदलती भी हैं। कुछ ऐसी भी जगह होती हैं जहां पर जातियों को छोड़कर सारे लोग एक साथ बैठकर खाते हैं, पीते हैं, बाते करते हैं। बिहार की राजनीति के ज्यादा पन्ने नहीं पलटने होंगे लेकिन ये दिख जाएगा कि दलितों और पिछड़ों के लिए सबसे पहले संवैधानिक जिम्मेदारियां निभाने वाले बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर ने क्या-क्या देखा था? कर्पूरी ठाकुर जनता पार्टी के नेता के तौर पर जून 1977 को बिहार के मुख्यमंत्री बने। उन्होंने मुख्यमंत्री बनते ही पिछड़ों को आरक्षण के वादे को पूरा करने का काम शुरू किया। जिसकी वजह से वो अपनी ही पार्टी के अंदर आलोचना का शिकार होने लगे। यहां तक की जेपी पर भी कर्पूरी ठाकुर से नाराजगी की बात कही गई थी। मुख्यमंत्री बनते ही उनहोंने 27 फीसदी आरक्षण पिछड़ों को दे दिया था। ये उनकी सोच थी। उन्होंने उस गरीबी, परेशानियों और भेदभाव को बहुत करीब से देखा था। मंडल कमीशन तो बहुत बाद में आया लेकिन उससे पहले ही उन्होंने ये करके दिखाया था। उन्होंने ये सोचा था कि कैसे सबको आगे लेकर बढ़ना है। लेकिन ये तमाम कदम नाकाफी ही साबित हुए। ऊंची जातियों के दबाव में उन्हें 27 प्रतिशत से घटाकर आरक्षण 20 प्रतिशत करना पड़ा, फिर भी उनकी सरकार गिरा दी गई। कतार में खड़े अंतिम व्यक्ति का संघर्ष तो समूचे देश में एक समान है। लेकिन सवाल सोच की उस जाति वाले विभाजन पर भी है जहां हर व्यक्ति कि जिज्ञासा ये होती है कि सामने वाली की जाति कौन सी है? बिहार में राजनीतिक पार्टियों का गठन भी जाति देखकर होता है। अपनी जाति के नेता पर विश्वास भी सर्वमान्य है। 

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यूगोस्लाविया के शासक ने फटा कोट देखकर दिया ये गिफ्ट

आज के जमाने में सिर्फ किस्सा ही लगेगा। यकीन करना मुश्किल होगा कि दो बार मुख्यमंत्री रहने और उप मुख्यमंत्री रहने वाला शख्स रिक्शा पर चलते थे। जब उनका निधन हुआ तो पटना तो छोड़िए अपने पैतृक गांव में उनके पास एक मकान नहीं था जो विरासत में वो किसी को देते। ऐसी सादगी ऐसी ईमानदारी का नाम कर्पूरी ठाकुर था। उनकी ईमानदारी की ऐसी-ऐसी मिसालें हैं जो वर्तमान दौर के लिए किस्सा कहानी ही है। एक बार उनका ऐसे प्रतिनिधिमंडल में चयन हुआ जिसे ऑस्ट्रिया जाना था। उनके पास कोट नहीं था। दोस्त से कोट मांगा। दोस्त ने जो कोट दिया वो थोड़ा फटा हुआ था। ऑस्ट्रिया में वो वही फटा कोट पहनकर कार्यक्रम में शामिल हुए। कहा जाता है कि यूगोस्लाविया के शासक मार्शल टीटो ने फटा हुआ कोट देखने के बाद कर्पूरी ठाकुर को एक नया कोट गिफ्ट किया। 

फटे कुर्ते का पैसा 

1977 में जब वह बिहार के सीएम बने थे। तब केंद्र और बिहार में जनता सरकार सत्ता में थी। उस समय जनता पार्टी के नेता लोकनायक जयप्रकाश नारायण यानी जेपी के जन्मदिन के लिए कई नेता पटना में इकट्ठा हुए। उसमें शामिल मुख्यमंत्री कर्पूरी बाबू का कुर्ता फटा हुआ था। ऐसे में चंद्रशेखर जी ने अपने अनूठे अंदाज में लोगों से कुछ पैसे दान करने की अपील की, ताकि कर्पूरी जी नया कुर्ता खरीद सकें। लेकिन कर्पूरी जी तो कर्पूरी जी थे। उन्होंने इसमें भी एक मिसाल कायम कर दी। उन्होंने पैसा तो स्वीकार कर लिया, लेकिन उसे मुख्यमंत्री राहत कोष में दान कर दिया।

2 बार सीएम रहने पर भी नहीं बना पाए अपना घर

एक बार उनके पिता का पिछड़ी जाति से आने की वजह से दबंग सामंती लोगों ने अपमान किया। पूरी खबर फैली की डीएम साहब आ रहे हैं। कर्पूरी ठाकुर के पिता का अपमान कर दिया है अब पुलिस कार्रवाई करेगी। कर्पूरी ठाकुर ने खुद जाकर रोका था। उन्होंने कहा कि ये जो पिछड़े लोग हैं उनका अपमान तो रोज होता है। ऐसे में सिर्फ मेरे पिता के खिलाफ अपमान होने पर कार्रवाई क्यों? अगर पुलिस वाकई किसी का अपमान न होने दे और सख्त कार्रवाई करे तो बात हो। ऐसी सोच, ऐसी ईमानदारी ऐसा व्यक्तित्व जिसकी वजह से कर्पूरी ठाकुर को पार्टी लाइन से परे हटकर पसंद किया गया। जेपी और राम मनोहर लोहिया उनके गुरु थे। ऐसे लोग जो ये मानते थे कि गैर कांग्रेसवाद की राजनीति में एक अहम व्यक्तित्व थे। कोई व्यक्ति दो-दो बार का मुख्यमंत्री हो और उसके पास खुद का अपना मकान न हो। इसी से आप उनकी ईमानदारी का अंदाजा लगा सकते हैं। बिहार की राजनीति में उन्होंने अपनी सादगी, ईमानदारी, साफगोई, विचारधारा से अमिट छाप छोड़ी। 

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पहले कमंडल, फिर मंडल

पिछले कुछ दिनों से बिहार में पिछड़े की राजनीति जोरों पर है। वीजेपी के हिंदुत्व और राम मंदिर फैक्टर से मुकावले के लिए नीतीश कुमार ने विहार में जाति जगनणना का कार्ड खेला। महागठबंधन सरकार ने न सिर्फ जाति जनगणना के आंकड़े जारी किए बल्कि इसके वाद पिछड़ों के लिए आरक्षण की सीमा भी बढ़ाई। वहीं, जेडीयू की रैली में कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न दिए जाने की मांग भी अजेंडे में था। बीजेपी को पता था कि आरजेडी के मुस्लिम और यादव वोट समीकरण और साथ में नीतीश कुमार के पिछड़े वोट के सियासी गणित को हराना इतना आसान नहीं है। ऐसे में कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देने के साथ ही बीजेपी ने पिछड़ों की राजनीति और नीतीश के वोट में सेंध लगाने की कोशिश है। सरकारी सूत्रों ने कहा कि कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देकर सामाजिक न्याय को बड़ी मान्यता दी गई है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों से बिहार के तमाम राजनीतिक दल यह मांग कर रहे थे। कर्पूरी ठाकुर के बहाने बीजेपी बिहार के अलावा उत्तर प्रदेश और सटे राज्यों में भी बड़ा अभियान शुरू कर सकती है। पहले भी नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में बीजेपी ने विपक्ष के प्रतीकों को अपने पाले में करने की सफल राजनीति की है। ऐसे में बीजेपी ने एक फैसले से दो शिकार किए हैं और मंडल-कमंडल दोनों कार्ड को अपने पाले में करने की कोशिश की है।

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