By अभिनय आकाश | Jul 16, 2026
सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल का आज 19वां दिन है। बीते दिनों दिल्ली हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई। जिसमें सोनम वांगचुक की जान बचाने के लिए सरकार से तुरंत दखल देने की मांग की गई। इस याचिका में अनुरोध किया गया था कि सोनम वांगचुक को तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया जाए और अगर जरूरी हो तो उनकी यह भूख हड़ताल जबरदस्ती तोड़कर उन्हें खाना खिलाया जाए। यह भी मांग की गई है कि सरकार को सोनम मांगचूद से बातचीत करनी चाहिए। हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि सोनम वांगचुक की जान बचाने के लिए जो भी मेडिकल मदद ज़रूरी हो, वह सरकार को करनी चाहिए। चीफ जस्टिस डी.के. उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की बेंच ने कहा कि ज़िंदगी कीमती है और सरकारी डॉक्टरों को वांगचुक की हालत की नियमित रूप से जांच करनी चाहिए। सोनम वांगचुक 28 जून से लगातार भूख हड़ताल पर हैं। अनशन पर हैं और उनके जो समर्थक हैं वो लगातार अब यह कह रहे हैं कि उनकी स्थिति बिगड़ रही है और उनके जो शरीर के सारे पैराटर्स हैं वह खराब हो रहे हैं और अब उनकी जान जा सकती है। इस घटनाक्रम ने एक बार फिर उस सवाल को चर्चा के केंद्र में ला दिया है जो भारत में कई हाई-प्रोफाइल विरोध प्रदर्शनों के दौरान सामने आता रहा है कि क्या भूख हड़ताल कानूनी रूप से वैध है? क्या कोई व्यक्ति अनिश्चित काल के लिए उपवास करने का विकल्प चुन सकता है? किस मोड़ पर राज्य (सरकार/प्रशासन) इसमें हस्तक्षेप कर सकता है?
कानूनी रूप से हाँ। हालांकि भूख हड़ताल शुरू करना कोई आपराधिक अपराध नहीं है, लेकिन अधिकारी तब हस्तक्षेप करते हैं जब यह विरोध प्रदर्शन प्रदर्शनकारी के जीवन के लिए एक गंभीर खतरा बनने लगता है। आर्टिकल 21 (अनुच्छेद 21) के तहत सरकार का एक संवैधानिक दायित्व (संवैधानिक कर्तव्य) है, जो जीवन के अधिकार की गारंटी देता है, ताकि जीवन की रक्षा की जा सके। अदालतों ने बार-बार यह व्यवस्था दी है कि यदि किसी का जीवन आसन्न खतरे (तुरंत मंडराते खतरे) में है, तो राज्य (सरकार) एक मूकदर्शक बनकर नहीं रह सकता। यही कारण है कि अधिकारी अक्सर भूख हड़ताल करने वालों के स्वास्थ्य की निगरानी करते हैं, स्थिति गंभीर होने पर उन्हें अस्पतालों में स्थानांतरित (शिफ्ट) करते हैं या उनका इलाज शुरू करते हैं।
ऐसा कोई खास कानून नहीं है जो हर भूख हड़ताल करने वाले को ज़बरदस्ती खाना खिलाने की साफ़ तौर पर इजाज़त देता हो। असल में अधिकारी आम तौर पर पहले मेडिकल सलाह, काउंसलिंग और समझाने-बुझाने के तरीकों पर भरोसा करते हैं। अगर कोई कोर्ट मेडिकल दखल का आदेश देती है, या डॉक्टरों को लगता है कि व्यक्ति की जान को तुरंत खतरा है, तो उसे अस्पताल में भर्ती करके इलाज किया जा सकता है। कोर्ट आम तौर पर व्यक्ति की आज़ादी और जान बचाने की सरकार की ज़िम्मेदारी के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करती हैं। वांगचुक के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने ज़बरदस्ती खाना खिलाने का आदेश नहीं दिया है। इसके बजाय, कोर्ट ने अधिकारियों को रोज़ाना हेल्थ चेकअप करने और ज़रूरत पड़ने पर मेडिकल मदद देने का निर्देश दिया। केंद्र सरकार ने कोर्ट को बताया कि सरकारी डॉक्टर पहले से ही उनकी हालत पर नज़र रखे हुए हैं।
कुछ परिस्थितियों में पुलिस ऐसा कर सकती है। यदि विरोध प्रदर्शन निषेधाज्ञा का उल्लंघन करता है, कानून-व्यवस्था बिगाड़ता है, सार्वजनिक स्थानों को अवरुद्ध करता है या आवश्यक अनुमतियाँ प्राप्त नहीं करता है, तो पुलिस प्रतिबंध लगा सकती है। अधिकारियों ने अतीत में सार्वजनिक व्यवस्था या स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं का हवाला देते हुए भूख हड़तालियों को हिरासत में लिया है या उन्हें विरोध स्थलों से हटा दिया है। हालांकि, इस तरह की कार्रवाई आमतौर पर उपवास से असंबंधित कारणों से उचित ठहराई जाती है।
भारतीय अदालतों ने आम तौर पर शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन को लोकतांत्रिक अधिकार माना है, साथ ही इस बात पर भी ज़ोर दिया है कि लोगों की जान की सुरक्षा करना सरकार की ज़िम्मेदारी है। गुरुवार को वांगचुक के मामले की सुनवाई करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि "जीवन अनमोल है" और केंद्र व दिल्ली सरकार को निर्देश दिया कि वे उनकी सेहत पर लगातार नज़र रखें। बेंच ने यह भी कहा कि ज़रूरत पड़ने पर उचित मेडिकल मदद दी जानी चाहिए।
हाँ। भारत के राजनीतिक आंदोलनों में भूख हड़तालों का एक लंबा इतिहास रहा है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान महात्मा गांधी ने अहिंसक प्रतिरोध के एक रूप में उपवास का उपयोग किया था। स्वतंत्र भारत में, अन्ना हजारे, इरोम शर्मिला और विभिन्न राजनीतिक नेताओं व कार्यकर्ताओं सहित कई प्रमुख हस्तियों ने अपनी मांगों को मनवाने के लिए अनिश्चितकालीन उपवास का सहारा लिया है। हालांकि सरकारों ने अक्सर शुरुआत में ऐसे विरोध प्रदर्शनों की अनुमति दी है, लेकिन स्वास्थ्य स्थिति बिगड़ने पर अधिकारियों ने गिरफ्तारी, अस्पताल में भर्ती कराने या चिकित्सा निगरानी के माध्यम से हस्तक्षेप भी किया है। वांगचुक वर्तमान में दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर हैं और वे नीट (NEET) पेपर लीक मामले को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं व व्यापक शिक्षा सुधारों की मांग कर रहे हैं। उनके डॉक्टर ने कहा है कि उनका वजन 9 किलोग्राम से अधिक कम हो गया है, जिससे उपवास जारी रहने पर अंगों को नुकसान (ऑर्गन डैमेज) पहुंचने की चिंताएं बढ़ गई हैं। हालांकि, वांगचुक अपने फैसले पर अडिग हैं और उनका कहना है कि सरकार की ओर से बिना किसी प्रतिक्रिया के उपवास तोड़ना एक गलत संदेश देगा। अपनी भूख हड़ताल के 19वें दिन में प्रवेश करने पर एक्स (X) पर साझा किए गए एक वीडियो संदेश में वांगचुक ने कहा कि विरोध को अभी समाप्त करना यह संकेत देगा कि सरकारों को जवाबदेह ठहराने की आवश्यकता नहीं है।
आपको भी वर्ष 2011 में अरविंद केजरीवाल और अन्ना हजारे की जोड़ी याद आ रही होगी। कई बार ऐसा लगता है कि कहीं यह 2011 के अन्ना आंदोलन का ही एक रिपीट टेलीकास्ट तो नहीं और जिस तरह से अरविंद केजरीवाल ने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए अन्ना हजारे का इस्तेमाल किया था कहीं अभिजीत दिपके भी वैसे ही सोनम वांगचुक का राजनीतिक इस्तेमाल तो नहीं कर रहे। आपको याद होगा कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अन्ना हजारे ने इंडिया अगेंस्ट करप्शन मूवमेंट शुरू किया था और यह उस समय एक गैर राजनीतिक आंदोलन था। तब अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि वह कभी राजनीति में नहीं आएंगे। लेकिन बाद में केजरीवाल अन्ना हजारे को भूल गए और उनकी मर्जी के बिना राजनीति में भी आए। चुनाव भी लड़े और दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गए। अभी तक तो अभिजीत दीपके भी [संगीत] यही कहते हैं कि उनका राजनीति से कोई लेना देना नहीं। कल तक वो यह भी कहते थे कि वो यह बिल्कुल नहीं चाहते कि इस देश के नेता अलग-अलग पार्टियों के नेता जंतरमंतर पर इस प्रोटेस्ट में शामिल भी हो। वो इसे नेताओं से दूर रखने की बात कर रहे थे। लेकिन अब उन्होंने अपना बयान पलट दिया। अब वह खुद ही नेताओं से बात कर रहे हैं। उनसे मिलने के लिए जा रहे हैं। उनसे कह रहे हैं कि आप जंतरमंतर पर आइए।