Gyan Ganga: जब क्रोध में Narad Muni ने दिया Lord Vishnu को श्राप, जानिए इस दिव्य लीला का रहस्य

By सुखी भारती | Mar 19, 2026

भगवान विष्णु का यह अटल स्वभाव है कि वे अपने भक्त को किसी भी कठिन और अप्रिय परिस्थिति में अधिक देर तक नहीं रहने देते। वे किसी न किसी प्रकार उसे उस संकट से अवश्य निकालते हैं—भले ही उसके बदले उन्हें स्वयं शाप ही क्यों न सहना पड़े।

देवर्षि नारद के प्रसंग में भी आज कुछ ऐसा ही होने जा रहा था। मुनि के हृदय में क्रोध की ज्वाला प्रचण्ड रूप से धधक रही थी। उसी उग्र भाव में उन्होंने कठोर वाणी में गर्जना की—

‘भले भवन अब बायन दीन्हा।पावहुगे फल आपन कीन्हा।।

बंचेहु मोहि जवनि धरि देहा।सोइ तनु धरहु श्राप मम एहा।।’

अर्थात—अब तुमने मुझे बड़ा अच्छा बैना दिया है। इसका फल तुम्हें अवश्य भोगना पड़ेगा। क्या तुमने यह समझ लिया था कि मेरे साथ छल करके यूँ ही बच निकलोगे? जिस शरीर को धारण करके तुमने मुझे ठगा है, वही शरीर तुम्हें भी धारण करना पड़ेगा—यह मेरा श्राप है।

इसे भी पढ़ें: Gyan Ganga: जब भक्त Narad Muni ने Lord Vishnu को कहा छलिया, अपमान की आग में देने वाले थे कौन-सा श्राप?

इतना ही नहीं, वे आगे और बोले—

‘कपि आकृति तुम्ह कीन्हि हमारी। करिहहिं कीस सहाय तुम्हारी।। मम अपकार कीन्ह तुम्ह भारी। नारि बिरहँ तुम्ह होब दुखारी।।’

तुमने मेरा रूप वानर जैसा बना दिया था न? इसलिए अब वानर ही तुम्हारी सहायता करेंगे। मेरा अपराध ही क्या था? मैंने तो केवल एक स्त्री को पाने की इच्छा की थी। किंतु उसके बदले आपने समस्त संसार में मेरा उपहास करा दिया। आपने मेरा अत्यंत अहित किया है। अतः आपको भी इसका फल भोगना पड़ेगा—आप भी स्त्री-वियोग के दुख से व्याकुल होंगे।

इस प्रकार भगवान विष्णु को मानो मधु के स्थान पर विष प्राप्त हुआ। वे तो मुनि का कल्याण करना चाहते थे, उन्हें एक प्रकार से वरदानस्वरूप जीवन दे रहे थे; परंतु मुनि ने क्रोधवश उन्हें श्राप दे दिया। संसार में यदि किसी के साथ ऐसा हो जाए, तो वह प्रायः निराश और खिन्न हो जाता है। वह तो दूसरों से यही कहता फिरता है कि किसी का भला मत करो; संसार के लोग कृतघ्न हैं—उन्हें पुष्प दो तो वे बदले में काँटे ही देते हैं।

परन्तु क्या भगवान विष्णु ने भी ऐसा ही किया? क्या वे भी हमारी भाँति खिन्न होकर पछताने लगे?

नहीं।

वे तो मंद-मंद मुस्करा उठे। उनके हृदय में उलटे प्रसन्नता का उदय हुआ। उन्होंने उस श्राप को सहज भाव से स्वीकार किया। इतना ही नहीं, उन्होंने देवर्षि नारद से विनम्र वचन कहे, उन्हें आशीर्वाद दिया और अंततः अपनी माया समेट ली।

तब—

‘जब हरि माया दूरि निवारी।नहिं तहँ रमा न राजकुमारी।।तब मुनि अति सभीत हरि चरना।गहे पाहि प्रनतारति हरना।।’

जब भगवान ने अपनी माया हटा ली, तब वहाँ न लक्ष्मी जी थीं और न ही विश्वमोहिनी राजकुमारी। यह देखकर नारद मुनि अत्यंत भयभीत हो गए। उनके शरीर का रोम-रोम काँपने लगा। वे दौड़कर श्रीहरि के चरणों में गिर पड़े और करुण स्वर में बोले—हे शरणागतों के दुःख हरने वाले प्रभु! मेरी रक्षा कीजिए। हे कृपालु! मेरा यह श्राप मिथ्या हो जाए।

तब करुणामय भगवान विष्णु ने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा—हे मुनि! भय मत करो। यह सब मेरी ही इच्छा से घटित हुआ है।

यह सुनकर नारद मुनि और भी व्याकुल हो उठे। उन्होंने विनम्रता से कहा—प्रभु! मैंने क्रोध में आपको अनेक कटु वचन कह दिए हैं। मेरे इन पापों का प्रायश्चित्त कैसे होगा?

तब भगवान ने कहा—

‘जपहु जाइ संकर सत नामा।होइहि हृदय तुरत बिश्रामा।।’

हे मुनि! जाकर भगवान शंकर के शतनाम का जप करो। इससे तुम्हारे हृदय को तुरंत शांति प्राप्त होगी। प्रभु के गुणों का स्मरण करो, ध्यान करो—तब मेरी माया तुम्हें स्पर्श भी नहीं कर सकेगी।

इतना कहकर भगवान अंतर्धान हो गए। और देवर्षि नारद, श्रीराम के गुणों का गान करते हुए, ब्रह्मलोक की ओर प्रस्थान कर गए।

।।श्रीराम।।

- सुखी भारती

प्रमुख खबरें

जनता से सीधे संवाद: Tamil Nadu चुनाव के लिए Congress का Peoples Manifesto वाला प्लान

West Asia और Middle-East में बिगड़ते हालात के बीच Rajnath Singh बोले, ड्रोन तकनीक में आत्मनिर्भरता जरूरी

MEA Briefing: ऊर्जा संरचनाओं पर ईरानी हमलों से भड़का भारत, विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा- यह अस्वीकार्य है

Ruturaj Gaikwad की बढ़ी टेंशन, CSK का Match Winner Nathan Ellis चोट के कारण IPL से बाहर