लोक के प्रति कब जवाबदेह बनेगी नौकरशाही

By उमेश चतुर्वेदी | Apr 29, 2026

सरदार पटेल ने भारतीय प्रशासनिक सेवा को ‘स्टील फ्रेम’ बताया था। संविधान सभा में प्रशासनिक सेवा पर बहस के दौरान उन्होंने राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए मजबूत और तटस्थ नौकरशाही पर जोर दिया था। हालांकि अंग्रेजों के नौकरशाह रह चुके एचवी कामथ को चिंता थी कि वैधानिक सुरक्षा नौकरशाही को गैरजवाबदेह और असल ‘शासक’ बना सकती है। एक अप्रैल को चुनावी राज्य पश्चिम बंगाल के मालदा की घटना में नौकरशाही ने जैसा रूख अख्तियार किया है, उसे देख लगता है कि पटेल के भरोसे की तुलना में एचवी कामथ की चिंता समय की शिला पर सटीक साबित हुई है। मालदा में पूरे नौ घंटे तक सात न्यायिक अधिकारियों को सियासी कार्यकर्ता के मुखौटे वाले अपराधियों ने बंधक बनाए रखा। उस दौरान कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश भी मुख्य सचिव से संपर्क करने में नाकाम रहे। दिलचस्प यह है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य सचिव से जवाब-तलब किया तो उन्होंने माफी मांग कर काम चला लिया। उम्मीद थी कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में शीर्ष अधिकारियों को सबक सिखाने से पीछे नहीं रहेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वह माफी से ही संतुष्ट हो गया।

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लोकतंत्र, लोक यानी आम लोगों का तंत्र है। लेकिन हकीकत में यह राजनीतिक दलों का तंत्र है और इस तंत्र में लोक की भूमिका महज वोट देने तक ही सीमित है। इस तंत्र में नौकरशाही की जवाबदेही राजनीति के हर अच्छे-बुरे कामों में साथ देने और कई बार उसका कहार बनने तक सीमित रह गई है। सरदार पटेल जब इस तंत्र को स्टील फ्रेम कह रहे थे, तो उनका आशय यह था कि भावी नौकरशाही आम लोगों की भलाई और लोकतंत्र को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाएगी। पटेल को उम्मीद रही होगी कि नौकरशाह लोक के प्रति जब जवाबदेह होंगे, तब ऐश्वर्य पर उनकी निगाह कम होगी। लेकिन इसके ठीक उलट हो रहा है। नौकरशाही के बड़े हिस्से को अपनी मूल भूमिका की चिंता नहीं सताती। उसकी पूरी कोशिश खुद और खुद के कैडर को मजूबत करने और ज्यादा सुविधाएं जुटाने पर केंद्रित रहती है। ज्यादातर नौकरशाहों के लिए आमजन ठीक वैसी ही प्रजा हैं, जिस तरह अंग्रेजों के थे। पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव का व्यवहार इसी सोच का उदाहरण है।

जब कोई आईएएस किसी फरियादी की बात सुनने के लिए जमीन पर बैठ जाता है, या ऐसा ही सामान्य कदम उठाता है तो वह घटना खबर बन जाती है। इसकी वजह यही है कि अफसरों से ऐसे व्यवहार की उम्मीद ही नहीं होती। जनमानस की सोच ऐसी है तो यह मान लेना चाहिए कि पटेल की सोच के मुताबिक नौकरशाही विकसित नहीं हुई, बल्कि एचवी कामथ जैसे लोगों की आशंका ही सही साबित हुई है। नौकरशाही में जब भी किसी का चयन होता है, उसके पड़ोसी और रिश्तेदार तक मान लेते हैं कि कुछ ही दिनों में उसकी कई पुश्तों का इंतजाम हो जाएगा। ज्यादातर ऐसा होता भी है। मध्य प्रदेश जैसे कुछ राज्यों ने लोकपाल की व्यवस्था कर रखी है। वहां आए दिन जिस तरह अधिकारियों के घरों से नोटों की गड्डियां निकलती हैं, उनकी संपत्ति के ब्यौरे सामने आते हैं, उससे पता चलता है कि अफसर बनना जमींदारी हासिल करने से भी ज्यादा फायदेमंद है। ऐसे अफसरों पर कड़ी कार्रवाइयां नजीर बननी चाहिए, लेकिन ऐसा होता नहीं दिखता। अफसरशाही का बड़ा हिस्सा अब भी तंत्र के दोहन की प्रक्रिया में शिद्दत से शामिल है। हाल ही में बिहार के एक सब डिविजनल पुलिस अफसर के बारे में समाचार आया कि उनकी नौकरानी भी थार से चलती है। ऐसा नहीं कि नौकरशाही में ईमानदार लोग नहीं हैं। अशोक खेमका और संजीव चतुर्वेदी इसके उदाहरण हैं। लेकिन उन्हें ना तो नौकरशाही चैन से बैठने देती है और ना ही राजनीतिक आका। 

नौकरशाही को तटस्थ और ईमानदार बनाए रखने के लिए पचासों कमेटियां बन चुकी हैं, दो प्रशासनिक सुधार आयोग बन चुके हैं। पहले आयोग के अध्यक्ष तत्कालीन वित्त मंत्री मोरारजी देसाई थे तो दूसरे के कांग्रेसी नेता वीरप्पा मोइली। जान लेना चाहिए कि स्वाधीनता संग्राम में कूदने से पहले मोरार जी भी सिविल सेवा के अधिकारी थे। दोनों आयोगों ने कई सुझाव दिए, कुछ लागू भी हुए। लेकिन असल में नौकरशाही का चरित्र नहीं बदल पाया। वह लोकतांत्रिक नहीं हो पाई। 

आपातकाल के दिनों में जयप्रकाश नारायण ने नौकरशाही और पुलिस अफसरों से अपील की थी कि सरकार के असंवैधानिक आदेशों को वे न मानें। तब जेपी को अराजकतावादी कहा गया। हालांकि राजनीतिक व्यवस्था ऐसी है कि नौकरशाही के लिए राजनीति की बात टालना संभव नहीं हैं। एच वी अयंगार जैसे कुछ ही नौकरशाह होते हैं, जो सही बात कह सकते हैं और अपने राजनीतिक आका से अलग राय रख सकते हैं। राज्यों के गठन के पीछे भाषा को आधार बनाने के तत्कालीन गृह सचिव अयंगार विरोधी थे और उन्होंने अपने मंत्री सरदार पटेल के सामने उसे खुलकर रखा भी था। वैसे आज की राजनीति में पटेल जैसा हृदय रखने वाले लोग भी कम हैं। अव्वल तो आज की नौकरशाही नाफरमानी की हिम्मत ही नहीं करती और अगर ऐसी कोशिश करती भी है तो उसे ही किनारे लगा दिया जाता है। इसी वजह से माना जा रहा है कि दुष्यंत नरियाला फिलहाल भले ही अभी चुनाव आयोग को रिपोर्ट कर रहे हों, वे अपने राजनीतिक आका के ही प्रभाव में हैं।

नौकरशाही अगर लोकतांत्रिक और तटस्थ नहीं बन पाई है तो इसके पीछे उसके प्रशिक्षण और चयन में भी खामी मानी जाती है। वैसे समाज भी रोजाना अफसरों की बेरूखी से दो-चार होता रहता है, इसके बावजूद जब भी यूपीएससी या पीसीएस के नतीजे आते हैं, चयनित अफसरों पर वह लहालोट हो जाता है। समाज का लहालोट होना भी कई बार नौकरशाही को राजा की तरह व्यवहार करने को प्रेरित करता है। इसी लिए कोई दुष्यंत नरियाला कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के फोन को भी नजरंदाज कर देता है। लेकिन सवाल यह है कि आखिर इस रवायत को बदलेगा कौन? जिस राजनीति पर इसकी जवाबदेही है, उसे अपने कार्यकर्ताओं की बनिस्बत नौकरशाही पर भरोसा ज्यादा है। लोक तो उससे प्रताड़ित होने के बावजूद उसी पर लहालोट है। इसलिए जरूरी है कि नौकरशाही को भगवान न मानने वाली सोच विकसित करने की कोशिशें हों, अन्यथा नौकरशाह राजा की तरह व्यवहार करते रहेंगे। 

-उमेश चतुर्वेदी

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं

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