संसदीय समिति की रिपोर्ट से उठते सवाल- प्राइवेट अस्पतालों और स्कूलों की लूट पर कब लगेगी लगाम?

By संतोष कुमार पाठक | Aug 12, 2026

पिछले कुछ वर्षों के दौरान देश में प्राइवेट यानी निजी अस्पतालों, स्कूलों और कॉलेजों की बाढ़ सी आ गई है। देश के राज्य और जिले तो छोड़िए , अब तो छोटे-छोटे शहरों में भी खुलते जा रहे नर्सिंग होम और स्कूल लोगों की जेब काटने का कोई मौका नहीं चूक रहे हैं। देश का गरीब तबका तो छोड़िए, मध्यम आय और उच्च मध्यम आय की कैटेगरी में आने वाले लोग भी इनकी लूट से परेशान होते जा रहे हैं।

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देश के प्राइवेट अस्पताल, भर्ती होने वाले मरीजों/ उनके परिजनों से कमरे का जो किराया वसूलते है, यह उसी इलाके के महंगे होटलों से भी कई गुना ज्यादा होता है। ध्यान दीजिएगा, इलाज के नाम पर जो बाकी चार्ज लिए जाते हैं वो कमरे के चार्ज में अलग से जोड़ा जाता है। यह सारे खुलासे केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय से जुड़ी संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट से हुए हैं। समिति की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकारी अस्पतालों में इलाज का खर्च औसतन 6,631 रुपए है जबकि प्राइवेट अस्पतालों में यही खर्च साढ़े सात गुने से भी ज्यादा (50,508 रुपए ) है। इलाज के नाम पर भी अनाप-शनाप वसूली की जाती है। बिल में पारदर्शिता नहीं होती है, गंभीर इलाज या सर्जरी से पहले मरीज को फाइनल खर्च का एस्टिमेट नहीं बताया जाता है। नतीजा प्राइवेट अस्पतालों की मनमानी बेलगाम होती जा रही है और जिसकी जो मर्जी वो वसूल रहा है। मुंबई के नानावटी अस्पताल में कमरे का चार्ज 6 से 12 हजार रुपए प्रतिदिन है जबकि उसी इलाके के 3 स्टार होटल में कमरे कमरे का चार्ज 2500 से लेकर 4500 रुपए के बीच ही है। दिल्ली के साकेत में स्थित मैक्स अस्पताल में भर्ती मरीज से अस्पताल वाले 7-11 हजार रुपए प्रतिदिन कमरे का चार्ज वसूलते है जबकि अस्पताल के पास ही स्थित होटल में आपको 2100 से 3500 रुपए प्रतिदिन के आधार पर बढ़िया कमरा मिल सकता है। यही हाल देश के ज्यादातर शहरों में प्राइवेट अस्पतालों का है।

समिति ने सरकार को कुछ सुझाव देते हुए यह सिफारिश की है कि, प्राइवेट अस्पताल के कमरे का किराया 3 स्टार होटल के किराए से अधिक नहीं होनी चाहिए। भर्ती से पहले अस्पताल को इलाज का पूरा खर्च स्पष्ट रूप से बताना चाहिए। सर्जरी और गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए फिक्स रेट तय होना चाहिए और उसमें सभी खर्चे शामिल होने चाहिए। 

इसके अलावा भी संसदीय समिति ने कई महत्वपूर्ण सिफारिश करते हुए सरकार की भूमिका पर भी सवाल उठाए है। समिति ने स्पष्ट तौर पर सरकार को सरकारी अस्पतालों में बेड और विशेषज्ञ डॉक्टरों की संख्या बढ़ाने को कहा है। हालांकि यह सब जानते हैं कि सरकार ऐसा करेगी नहीं। लेकिन इस बात का भी ध्यान रखना जरूरी है कि स्वास्थ्य मंत्रालय समिति की रिपोर्ट की आड़ लेकर कहीं वैसा ही खेल न कर दें जैसा कि CGHS चार्ज के मामले में किया गया है। सरकार को यह याद दिलाना बेहद जरूरी है कि दिल्ली या मुंबई के महंगे अस्पतालों में इलाज का खर्च इन शहरों के हिसाब से है वहीं देश के दूर-दराज इलाकों में इलाज का खर्च उस इलाके के आधार पर है। डर इस बात का है कि कहीं CGHS में जो गलतियां की गई है,उसी तरह की गलती को इस मामले में दोहराते हुए दिल्ली या मुंबई के आधार पर इलाज़ और सर्जरी का फिक्स रेट पूरे देश के लिए न तय कर दिया जाए। ऐसे हालात में दूर-दराज के इलाकों में चलने वाले प्राइवेट अस्पताल सरकारी आदेश का हवाला देते हुए कई गुना पैसा वसूलना शुरू कर देंगे। सरकार , सरकार के मंत्री और अधिकारियों को इस बात का विशेष ध्यान रखना होगा। 

जब भी प्राइवेट अस्पतालों की खुली लूट का जिक्र आता है तो आप इससे स्कूलों और कॉलेजों को अलग नहीं कर सकते हैं। क्योंकि जिस तरह से एक छोटे नर्सिंग होम को बड़ा और भव्य अस्पताल बनने में देर नहीं लगती, उसी तरह से स्कूल और कॉलेजों की बिल्डिंग भी साल दर साल भव्य से भव्यतम होती चली जाती है। फीस, किताबें, ड्रेस और बाकी खर्चो की मनमानी के बारे में तो सबको मालूम है। इसलिए यहां पर हम सिर्फ कुछ उदाहरण आपके सामने रखना चाहेंगे। दिल्ली से सटे गाजियाबाद में स्थित एक मेडिकल कॉलेज से MBBS करने की कुल लागत सवा से डेढ़ करोड़ रुपए के बीच आती है। मिडिल क्लास तो छोड़िए , हाई इनकम ग्रुप में आने वाले लोगों के लिए भी अब अपने बच्चों को MBBS करवा पाना आसान नहीं रहा है। आजकल प्राइवेट स्कूलों में लूट का एक जरिया स्मार्ट बोर्ड यानी स्मार्ट क्लासेस भी बन चुका है। एक बार स्मार्ट बोर्ड लगा दिया और फिर उसके बाद सालों तक इसके नाम पर स्कूल वाले वसूली करते हैं। अलग-अलग इलाकों के आधार पर स्मार्ट क्लास के नाम पर प्राइवेट स्कूल वाले 200 रुपए से लेकर 800 रुपए महीने तक वसूलते हैं। पहली कक्षा से बारहवी तक, हर महीने.. हर साल..। हालत इतनी खराब है कि अगर इन स्कूलों में जाकर आप अध्यापकों से स्मार्ट बोर्ड पर पढ़ाने को कहेंगे तो ज्यादातर शिक्षकों को शायद यह चलाना भी नहीं आएगा लेकिन हर महीने वसूली जारी है। 

संसदीय समिति भले ही कितने भी गंभीर सवाल उठाए या कितने ही अच्छे सुझाव दें लेकिन कड़वी सच्चाई तो यही है कि प्राइवेट अस्पतालों, स्कूलों और कॉलेजों की मनमानी एवं खुली लूट पर लगाम कसने का कोई स्थायी फॉर्मूला सरकारों के पास नहीं है और इसके लिए सभी राजनीतिक दलों के नेता जिम्मेदार हैं क्योंकि पिछले तीन दशकों में देश के तमाम राजनीतिक दल कहीं न कहीं किसी न किसी सरकार में भागीदार/साझीदार रहे हैं इसलिए कोई भी अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकता है। 

संतोष कुमार पाठक

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं

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