By अभिनय आकाश | Sep 16, 2026
करोड़ो यूपीआई यूजर्स के मन में एक सवाल घूम रहा है। सवाल ये कि क्या 2000 रुपए से ऊपर की यूपीआई पेमेंट पर आपको पैसा देना होगा? मतलब आप ₹500 की यूपीआई करोगे तो मुफ्त और ₹5000 की करोगे तो क्या आपकी जेब से कुछ कटेगा? और अगर कटेगा तो फिर जिस डिजिटल इंडिया का नाम लेकर सरकार ने खुद कहा था कि यूपीआई फ्री रहेगा। उसी सरकार के अपने कागज में कल पहली बार 2000 को लेकर एक लकीर क्यों खींची? उसी कागज में एक तरफ लिखा था कि बैंक 2000 तक की पेमेंट पर ₹1 नहीं ले सकते। ना सीधे ना घुमाकर। लेकिन दूसरी तरफ 2000 के ऊपर कुछ कंडीशंस लगाई गई थी। वो कंडीशंस क्या पैसा लेने के लिए? सवाल यह भी उठता है कि जो लकीर आज तक कहीं थी नहीं उसे सरकार क्यों लगा रही है?
कैसे शुरू हुई चर्चा
15 सितंबर को अखबारों में खबर आ गई कि यूपीआई पर 2000 के यूपीआई ट्रांजैक्शन पर कोई पैसा नहीं लगेगा। सबको समझ में आ गया कि यार 2000 के ऊपर वाले पर तो लगेगा ही लगेगा। सरकार अगर यह कह रही है तो कोई बहुत दिन से ही चल रहा था कि यूपीआई ट्रांजैक्शन पर सरकार चार्ज लगाने वाली है। कई बार खंडन होता, कभी दबी आवाज में खंडन होता, कभी स्पष्टीकरण आता, कभी फ्रेमवर्क पे काम करने की बातें कही जाती। लेकिन 15 सितंबर की ही शाम को वित्त मंत्रालय ने निर्मला सीतारमण का जो मंत्रालय है उसने एक फ्रेमवर्क जारी किया है। फ्रेमवर्क शाम को करीब 7 बजे के आसपास सामने आया है। जिसमें यह साफ कहा गया है कि जी हां 2000 के ऊपर के यूपीआई ट्रांजैक्शन पे अब चार्ज लगेगा। लेकिन शर्तें हैं।
सरकार ने बताया किनको नहीं देना है पैसा
सोशल मीडिया बहस शुरू हो गई। यहीं से खबर आई कि भाई 2000 तक अगर आपने लिखा है तो क्या उसके आगे और यह अफवाह फैलनी तेज हो गई। रोज सुबह चाय वाले को, शाम को दूध वाले को, महीने के आखिर में घर के किराए वाले को आप यूपीआई से पैसा भेजते हैं। वहां पर एक्स्ट्रा पैसा नहीं जाता। क्या अब एक्स्ट्रा जाएगा? यह मैसेज वायरल हुआ कि 2000 के ऊपर की हर पेमेंट पर पैसा कटेगा और वो आपके खाते से कटेगा। कई लोगों ने अपने बैंक की ऐप चेक करनी शुरू कर दी कि पैसा कटा तो नहीं क्योंकि 2019 से यह फ्री था। पर अब क्या होगा? सरकार ने साफ किया है कि यूपीआई इस्तेमाल करने वाला आम ग्राहक के पैसे से रुपया नहीं कटेगा। चाहे पेमेंट कितनी बड़ी भी क्यों ना हो। जो चार्ज की बात है वह एमडीआर है। यानी दुकानदार अपनी बिक्री पर बैंक को जो थोड़ी सी फीस देता है। ठीक वैसे ही जैसे कार्ड से पेमेंट लेने पर देता है। और यह सिर्फ दुकान पर होने वाले पेमेंट की बात है। दोस्त या घर वाले को सीधे पैसे भेजने पर चाहे जितनी बड़ी रकम हो पैसा नहीं जाएगा। हां और अभी तक यह फीस लगाने का कोई अंतिम फैसला भी नहीं हुआ है कि दुकानदार पर कितनी लेगी यह एनपीसीआई की एक कमेटी तय करेगी। यानी वही सरकारी कंपनी जो यूपीआई को पीछे चलाती है और जिसका काम अभी शुरू हुआ है।
UPI से महीने में 100000 कमाने वाले व्यापारियों को नहीं देना होगा शुल्क
सामान्य ग्राहक
आम लोगों पर शुल्क लगेगा? नहीं, UPI भुगतान मुफ्त रहेगा। चाहे भुगतान Person-to-Person (P2P) हो या Person-to-Merchant (P2M), ग्राहक से शुल्क नहीं लिया जाएगा। UPI ऐप भी ग्राहक से कोई फीस नहीं लेंगे। QR स्कैन करने पर चार्ज लगेगा? नहीं। छोटे भुगतान पहले की तरह मुफ्त रहेंगे और व्यापारी यह शुल्क ग्राहक से नहीं वसूलेंगे। सरकार के मुताबिक, बैंक व्यापारियों के लेन-देन पर नजर रखेंगे। छोटे व्यापारी ₹2,000 से अधिक के भुगतान पर क्या होगा? ऐसे भुगतान पर 0.40% शुल्क लागू होगा। हालांकि, अगर व्यापारी की UPI से महीने की प्राप्ति ₹1 लाख तक है, तो MDR नहीं लगेगा।
क्या नया QR कोड लेना होगा?
नहीं। मौजूदा QR कोड से ही भुगतान जारी रहेगा। क्या जीएसटी रजिस्ट्रेशन जरूरी है? नहीं। शून्य MDR का लाभ लेने के लिए GST रजिस्ट्रेशन अनिवार्य नहीं है। सीमा कैसे तय होगी? बैंक व्यापारी के लेन-देन की निगरानी करेंगे। अगर लगातार 3 महीने तक UPI से प्राप्ति ₹1 लाख से अधिक रहती है, तभी व्यापारी को Person-to-Merchant श्रेणी में बदला जाएगा।
बड़े व्यापारी-ई कॉमर्स
₹2,000 से कम के भुगतान पर भी जीरो MDR लागू है। वहीं, ₹75,000 से अधिक के लेनदेन के लिए अधिकतम फीस ₹300 तय की गई है। क्रेडिट या डेबिट कार्ड के मुकाबले UPI कितना किफायती है? अभी क्रेडिट कार्ड पर 1.5% से 2.5% और डेबिट कार्ड पर 0.90% तक शुल्क लगता है। इसके मुकाबले UPI पर सिर्फ 0.40% या अधिकतम ₹300 का शुल्क रहेगा।
क्या जीरो MDR का फायदा लेने के लिए छोटे दुकानदार को GST पंजीकरण कराना जरूरी है?
नहीं। छोटे दुकानदारों को UPI भुगतान पर जीरो MDR का लाभ लेने के लिए सिर्फ इसी वजह से GST पंजीकरण कराने की जरूरत नहीं होगी। इसकी पात्रता तय करने में मासिक UPI कलेक्शन की सीमा और बैंक खाते की श्रेणी देखी जाएगी। जो छोटे कारोबारी कानून के तहत GST पंजीकरण की अनिवार्य सीमा से नीचे हैं, वे बिना GST दस्तावेज दिए भी डिजिटल भुगतान स्वीकार कर सकेंगे।
यूपीआई तो इतने सालों तक फ्री था, अचानक इसकी जरूरत क्यों पड़ी
सरकार ने यह कदम इसलिए उठाया ताकि UPI के सिस्टम को टिकाऊ बनाया जा सके। किसी भी व्यवस्था को चलाने की लागत होती है और UPI के मामले में यह हर साल औसतन 20 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा है। ट्रांजैक्शन की संख्या बढ़ने के साथ खर्च भी बढ़ रहा है और फिलहाल बैंक, सर्विस प्रोवाइडर कंपनियां और सरकार मिल-जुलकर इसका बोझ उठा रहे हैं। लेकिन, यह व्यवस्था शायद लंबे वक्त तक नहीं चल पाती।
UPI की ताकत
सरकार आम लोगों को सहूलियत देने और सिस्टम को टिकाऊ बनाने के बीच संतुलन रखना चाहती है। हालांकि, इन फैसलों से जुड़ी चिंताओं को समझते हुए यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि MDR का बोझ आम लोगों पर न पड़े। देश में डिजिटल ट्रांजैक्शन की सबसे बड़ी ताकत इसकी सरलता और मुफ्त होना रही है। इसी वजह से UPI ने उन दूर-दराज के इलाकों तक भी पहुंच बनाई है, जहां इंटरनेट उपलब्ध है। ऐसे में इसकी सहजता और मुफ्त व्यवस्था बनी रहना जरूरी है। अगर आम उपभोक्ताओं पर थोड़ा भी अतिरिक्त बोझ पड़ा, तो UPI की स्वीकार्यता प्रभावित हो सकती है। डिजिटल इंडिया की दिशा में UPI एक बड़ी छलांग है और आज कई अन्य देश भी इसे अपना रहे हैं। इसने भुगतान प्रणाली को बेहद सरल बनाने के साथ-साथ व्यापार को बढ़ाने में भी मदद की है। ऐसे में UPI को सहज, सुलभ और आम लोगों के लिए किफायती बनाए रखना जरूरी होगा।
जब-जब मर्चेंट फीस लगी, बोझ ग्राहकों पर ही पड़ा, 5 उदाहरण से समझें
पेट्रोल पंप: कार्ड से भुगतान पर पेट्रोल पंप संचालक खुद शुल्क चुकाने के बजाय इसे 'फ्यूल सरचार्ज' के रूप में ग्राहक से वसूल रहे हैं।
ज्वेलर्स: बैंक के 1.5% से 2% MDR की भरपाई के लिए ज्वेलर्स ग्राहक के बिल में 'कार्ड सरचार्ज' जोड़ रहे हैं।
IRCTC, सिनेमा हॉल और ट्रैवल ऐप्स: भुगतान गेटवे के शुल्क को 'कन्विनियंस फीस' के नाम पर ग्राहक से वसूल रहे हैं।
छोटे भुगतान: फिक्स्ड प्रोसेसिंग कॉस्ट से बचने के लिए कुछ व्यापारी ₹200 या ₹500 से कम के भुगतान पर कार्ड लेने से इनकार करते हैं और ग्राहक को अधिक खरीदारी के लिए मजबूर करते हैं।
रेस्तरां और स्टोर्स: MDR को सीधे बिल में जोड़ना गैर-कानूनी होने के बावजूद कुछ रेस्तरां और स्टोर्स 5% तक का 'सर्विस चार्ज' लगाकर ग्राहक से अतिरिक्त शुल्क वसूलते हैं।