दोस्त इजरायल को झटका! क्या भारत ने बदल लिया अपना रुख, ईरान के लिए नेतन्याहू को छोड़ा?

भारत की अध्यक्षता में जारी ब्रिक्स साझा घोषणापत्र में सभी सदस्य देशों के बीच सफल आम सहमति बनी। इसमें अमेरिका का नाम लिए बिना एकतरफा प्रतिबंधों की निंदा की गई, जबकि लेबनान और गाजा संकट पर इजराइल का नाम लेकर कड़ा रुख अपनाया गया। यह साझा बयान भारत के कूटनीतिक संतुलन और विदेश नीति के कौशल को दर्शाता है।
क्या ब्रिक्स डिक्लेरेशन भारत की विदेश नीति में किसी बड़े बदलाव की तरफ इशारा है? ब्रिक्स ब्रिक समिट का संयुक्त बयान जारी हो चुका है और इस बयान में पूरे फोरम ने कई मुद्दों पर काफी सख्त रुख अपनाया है। मसलन लेबनन के मुद्दे पर इजराइल का सीधा नाम लेते हुए आलोचना की गई है और लेबनान में सीजफायर का पालन करने पर जोर दिया गया है। लेकिन अमेरिका की एकतरफ़ा पाबंदियों की आलोचना करते समय ट्रंप या अमेरिका का कोई भी नाम का जिक्र नहीं किया गया है। इस संयुक्त बयान पर सभी देशों की सहमति बनवाना भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती थी क्योंकि इस साल ब्रिक्स की अध्यक्षता और सम्मेलन की मेजबानी दोनों भारत ही कर रहा है। अब देखना यह होगा कि इस बयान में इस्तेमाल किए गए शब्दों को बाकी देश किस तरह समझते हैं और भारत की तरफ से दिए गए संकेतों को किस तरह से लिया जाता है। पूरे बयान में बहुत सावधानी से शब्दों का चुनाव किया गया है। मिसाल के तौर पर देखें तो इसमें यूएन के दायरे से बाहर जाकर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों की आलोचना की गई है। लेकिन अमेरिका का नाम नहीं लिया गया है। इसी तरह परमाणु ठिकानों पर हमले की निंदा की गई है। लेकिन ईरान का जिक्र नहीं है। इजराइल यहां जरूर एक अपवाद के तौर पर सामने आया है। गाजा और लेबनान से जुड़े कई हिस्से इजराइल का नाम सीधे तौर पर साझा बयान में शामिल करते हैं। इस संयुक्त बयान को तैयार करना इसलिए भी मुश्किल था क्योंकि ईरान, यूएई और सऊदी अरब मिडिल ईस्ट में चल रही जंग को लेकर अलग-अलग तरह की भाषा चाहते थे। ऐसे में सभी की सहमति से बयान जारी हो जाना भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत मानी जा रही है। खासकर इसलिए क्योंकि पहले ऐसी अटकलें थी कि रूस और ईरान अमेरिका के खिलाफ काफी कड़ी भाषा इस्तेमाल करवाना चाहेंगे जिसका भारत और ब्रिक्स के दूसरे देश विरोध कर सकते हैं। लेकिन आखिर में सभी देशों में कंसेंसस बन गया और साझा बयान जारी हो गया। इजराइल को लेकर ब्रिक्स के बयान में गजा में मानवीय मदद पहुंचाने पर जोर दिया गया है। साथ ही फिलिस्तीनियों को जबरन उनके घरों और जमीन से हटाने का विरोध किया गया है।
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अमेरिका का नाम नहीं, लेकिन प्रतिबंधों की आलोचना
घोषणापत्र की सबसे अहम बातों में से एक है एकतरफा आर्थिक प्रतिबंधों का मुद्दा। घोषणापत्र में कहा गया हम अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ एकतरफा दबाव वाले कदमों को लागू करने की निंदा करते हैं। हम फिर से कहते हैं कि ऐसे कदमों खासकर एकतरफा आर्थिक प्रतिबंधों और सेकेंडरी प्रतिबंधों के दूरगामी नकारात्मक असर होते हैं। इसमें यह भी कहा गया कि ऐसे कदमों का गरीबों पर बहुत बुरा असर पड़ता है। इसमें अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के खिलाफ एकतरफा दबाव वाले कदमों जिनमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से मंज़ूरी न लेने वाले प्रतिबंध भी शामिल हैं। दोनों ही बयानों में अमेरिका का नाम नहीं लिया गया है। लेकिन यह भाषा रूस और ईरान के लिए अहम है, जो ब्रिक्स के सदस्य हैं और जिन पर अमेरिका ने कई तरह की पाबंदियां लगा रखी हैं। ये दोनों देश लंबे समय से वॉशिंगटन की पाबंदी वाली नीतियों की आलोचना करते रहे हैं। इसलिए, इस भाषा में मॉस्को और तेहरान की एक अहम चिंता का ध्यान रखा गया है, लेकिन साथ ही घोषणापत्र को वॉशिंगटन पर सीधे हमले जैसा भी नहीं बनाया गया है। ब्रिक्स ने विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों के खिलाफ़ एकतरफ़ा टैरिफ और नॉन-टैरिफ़ उपायों को लेकर भी गहरी चिंता जताई है, और इसमें भी किसी देश का नाम नहीं लिया गया है। डोनाल्ड ट्रंप के व्हाइट हाउस में लौटने के बाद से यह मुद्दा और भी अहम हो गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने बार-बार ब्रिक्स को अमेरिका-विरोधी कहा है। उन्होंने इस समूह के साथ जुड़ने वाले देशों पर अतिरिक्त 10 प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी दी है और डॉलर को कमज़ोर करने की कोशिशों पर 100 प्रतिशत ड्यूटी लगाने की चेतावनी भी दी है। ये तनाव सिर्फ़ ब्रिक्स समूह तक ही सीमित नहीं हैं। भारत को भी रूस से तेल खरीदने के कारण अमेरिकी टैरिफ़ का सामना करना पड़ा है। नई दिल्ली ने इस कदम को अनुचित, गैर-वाजिब और तर्कहीन बताया है और साथ ही अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए ज़रूरी कदम उठाने का संकल्प लिया है।
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बिना नाम लिए ईरान के पक्ष का समर्थन कैसे करता है यह घोषणापत्र
पश्चिम एशिया के मुद्दे पर आम सहमति बनाना खास तौर पर मुश्किल था, क्योंकि ईरान और UAE इस टकराव को लेकर अलग-अलग राय रख रहे थे। ईरान ने इस बात के लिए भी BRICS की आलोचना की थी कि उसने अमेरिका और इज़राइल के हवाई हमलों के खिलाफ कोई बयान जारी नहीं किया, और वह इस समूह से समर्थन की उम्मीद कर रहा था। आखिरी घोषणापत्र में तेहरान के लिए ऐसी बातें कही गई हैं जिनका वह हवाला दे सकता है, लेकिन इसमें उसका नाम नहीं लिया गया है। BRICS ने नागरिक बुनियादी ढांचे और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की पूरी सुरक्षा-निगरानी वाली शांतिपूर्ण परमाणु सुविधाओं पर जानबूझकर किए गए हमलों पर गहरी चिंता जताई। इस हिस्से में ईरान, अमेरिका या इज़राइल का नाम नहीं लिया गया है। हालांकि, टकराव के संदर्भ में, यह तेहरान के उस तर्क का समर्थन करता हुआ दिखता है कि उसकी सुरक्षित परमाणु सुविधाओं पर हमले अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन थे। BRICS ने देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने का भी आह्वान किया और पश्चिम एशिया में "अधिकतम संयम" बरतने की अपील की। सबसे अहम बात यह है कि यह हिस्सा सदस्यों के अपने-अपने राष्ट्रीय रुख को याद दिलाता है, जिससे युद्ध के बारे में अलग-अलग राय रखने वाले देश अपनी व्यक्तिगत स्थिति छोड़े बिना एक ही टेक्स्ट पर सहमत हो पाते हैं।
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इजरायल पर BRICS का सीधा निशाना, लेबनान से सेना वापस बुलाने की मांग
BRICS घोषणापत्र में इजरायल को लेकर स्पष्ट और सख्त रुख अपनाया गया है। गाजा में जारी हिंसा पर चिंता जताते हुए BRICS ने फिलिस्तीनियों के जबरन विस्थापन का विरोध किया है। साथ ही 1967 की सीमाओं के आधार पर पूर्वी यरुशलम को राजधानी बनाकर संप्रभु फिलिस्तीनी राष्ट्र के गठन के समर्थन को दोहराया गया है। घोषणापत्र में दक्षिण अफ्रीका की ओर से इजरायल के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) में चल रही कार्यवाही का भी उल्लेख किया गया। BRICS ने कहा कि गाजा में मानवीय सहायता की आपूर्ति सुनिश्चित करना इजरायल का कानूनी दायित्व है। लेबनान के मुद्दे पर BRICS ने युद्धविराम का स्वागत करते हुए सभी पक्षों से इसकी शर्तों का पालन करने और UNSC प्रस्ताव 1701 को पूरी तरह लागू करने की अपील की। साथ ही युद्धविराम के लगातार उल्लंघन और लेबनान की संप्रभुता एवं क्षेत्रीय अखंडता के उल्लंघन की निंदा की गई। घोषणापत्र में सीधे इजरायल से लेबनान के इलाकों से अपनी सेना वापस बुलाने को कहा गया। BRICS ने इजरायल से लेबनान सरकार के साथ हुए समझौते की शर्तों का सम्मान करने और उन सभी लेबनानी क्षेत्रों से अपनी सेनाएं हटाने का आह्वान किया, जहां वे अभी भी मौजूद हैं। UNSC Resolution 1701 को 2006 में इजरायल-हिजबुल्लाह युद्ध के बाद अपनाया गया था। इसमें इजरायली सेना की वापसी और दक्षिणी लेबनान में लेबनानी सेना तथा संयुक्त राष्ट्र शांति सैनिकों की तैनाती की बात कही गई थी। BRICS के घोषणापत्र में अमेरिका का नाम लिए बिना एकतरफा प्रतिबंधों की आलोचना की गई है। वहीं परमाणु प्रतिष्ठानों से जुड़े हिस्से में ईरान का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया गया। लेकिन इजरायल का नाम स्पष्ट रूप से लिया गया और लेबनानी क्षेत्र से उसकी सेनाओं की वापसी की मांग की गई।
तो, क्या भारत का रुख बदला है?
सख्त भाषा के बावजूद, यह घोषणा अपने आप में भारत के रुख में कोई बुनियादी बदलाव नहीं दिखाती। ब्रिक्स (BRICS) घोषणा सभी 11 सदस्यों की सहमति वाला दस्तावेज़ है, न कि सिर्फ़ भारत का बयान। अध्यक्ष के तौर पर भारत का काम ऐसे तरीके खोजना था जिन्हें अलग-अलग हितों वाले देश स्वीकार कर सकें। भारत ने पश्चिम एशिया में बातचीत और कूटनीति की वकालत जारी रखी है, साथ ही फ़िलिस्तीन के लिए 'टू-स्टेट सॉल्यूशन' (दो-देश समाधान) का समर्थन किया है और इज़राइल के साथ करीबी रिश्ते भी बनाए रखे हैं। ब्रिक्स (BRICS) सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन की मुलाक़ात में, नई दिल्ली ने फिर से कहा कि विवादों को बातचीत और कूटनीति से सुलझाया जाना चाहिए। साथ ही, नेविगेशन, व्यापार और समुद्री यात्रियों की सुरक्षा के महत्व पर भी ज़ोर दिया गया। इसी तरह, भारत का व्यापक नज़रिया अलग-अलग गुटों के साथ संबंध बनाए रखने का रहा है। वह रूस और यूक्रेन, दोनों के साथ संपर्क बनाए हुए है, अमेरिका और इज़राइल के साथ भी उसके अहम संबंध हैं और ईरान के साथ भी बातचीत के रास्ते खुले रखे हैं। लेकिन जिस माहौल में भारत यह संतुलन बना रहा है, वह अब बदल गया है। ग्लोबल अनसर्टेनिटी का ही नतीजा है कि भारत चीन तमाम डिफरेंसेस को छोड़ के इस समय आगे बढ़ने के लिए तैयार है। तो मुझे नहीं लगता है भारत के लिए कोई डिप्लोमेटिक एक आप ये कहे कि कोई एम्बरेसमेंट होगा। भारत इससे और सशक्त होगा।
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