छावा विवाद से किसका नफा, किसका नुकसान

By उमेश चतुर्वेदी | Mar 24, 2025

विक्की कौशल और रश्मिका मंदाना अभिनीत फिल्म ‘छावा’ फिल्म के चलते मुगल बादशाह औरंगजेब इन दिनों चर्चा में है। औरंगजेब भी चर्चा में तब आया, जब मुंबई के एक विधायक अबू आजमी ने उसकी प्रशंसा कर दी। इसके बाद विवाद इतना बढ़ा कि महाराष्ट्र से लेकर देश की राजनीति सुलगने लगी। वामपंथी और राष्ट्रवादीय ऐतिहासिक दृष्टि तो पहले से ही औरंगजेब को लेकर बंटी हुई है, ऐसे में राजनीति नहीं बंटती तो हैरत ही होती। राजनीति के इस बंटवारे पर निगाह जमाए बैठी भारत विरोधी ताकतों को मौका मिला और नागपुर में दंगा फैल गया। अब दंगे की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, पता चल रहा है कि औरंगजेब को लेकर जैसे-जैसे विवाद बढ़ा, धार्मिक आधार पर वैचारिक ध्रुवीकरण बढ़ा। इसने सामाजिक समरसता के पथ के नीचे जैसे बारूद बिछा दी। इस बारूद के इंतजार में बैठी भारत विरोधी ताकतों को मौका माकूल लगा और उन्होंने अफवाह की माचिस धीरे से जलाकर बारूद के ढेर पर फेंक दी। नागपुर के दंगों में बांग्लादेशी कनेक्शन के संकेत तो यही हैं।

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औरंगजेब महान था या क्रूर, इसे लेकर इतिहासकार कभी एकमत नहीं हो सकते। वैसे इतिहास लेखन की जो नई धाराएं हैं, उनमें किसी भी ऐतिहासिक शख्सियत का सम्यक मूल्यांकन नहीं होता। बल्कि इतिहासकार अपने–अपने वैचारिक खेमे के लिहाज से अपनी सरपरस्त राजनीतिक धारा को फायदा पहुंचाने को लेकर ऐतिहासिक चरित्रों को पेश करता है। औरंगजेब के चरित्र को लेकर लिखे गए इतिहास की भी यही कहानी है। यह बताने की जरूरत नहीं कि औरंगजेब को वामपंथी इतिहासकार महान शासक बताते रहे हैं। स्कूली पाठ्यक्रमों में औरंगजेब के बारे में पढ़ाया ही जाता रहा है कि बादशाह होने के बावजूद वह टोपी सिलकर और कुरान बेचकर अपना खर्च चलाता था। इस तथ्य को स्कूली स्तर से ही भारत की दो पीढ़ियों में इस कदर घोलकर पिला दिया गया है, उसके अन्य क्रूर कार्यों की छाप कहीं नेपथ्य में चली जाती है। बेशक औरंगजेब कुरान बेचकर और टोपी सिलकर अपना दैनंदिन खर्च चलाता था, लेकिन यह भी सच है कि उसने सल्तनत अपने नाम करने के लिए अपने ही भाई दाराशिकोह की हत्या करा दी थी, अपने ही पिता शाहजहां और माता को आगरा के किले में कैद कर रखा था। औरंगजेब के खाते में अपने शासन के दौरान हिंदुओं पर तरह-तरह के अत्याचार भी दर्ज हैं।

नागपुर के दंगों को लेकर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस ने जो कहा है, उसे लेकर भी विवाद हो रहा है। फड़णवीस ने कहा है कि छावा फिल्म को लेकर मुस्लिम समुदाय में गुस्सा था। वैसे नागपुर में अफवाह फैलाई गई कि कुरान को जलाया जा रहा है। इसके बाद नागपुर का मुस्लिम समुदाय आक्रामक हो उठा और देखते ही देखते संतरा उत्पादन इलाके की राजधानी के रूप में विख्यात नागपुर धधक उठा। जब से शिवसेना के रास्ते बीजेपी से अलग हुए हैं, तब से उद्धव ठाकरे वाली शिवसेना बीजेपी और उसके मराठी अगुआ देवेंद्र फड़णवीस पर हमले और तंज कसने का कोई मौका नहीं छोड़ती। मराठी मानुष की नजर में हिंदू हृदय सम्राट रहे बाला साहब देवरस की वैचारिक उत्तराधिकारी होने का दावा करने वाली शिवसेना के लिए देवेंद्र फड़णवीस का बयान बढ़िया अवसर लगा। उसने देवेंद्र फड़णवीस पर हमला बोल दिया। उद्धव की शिवसेना इस बहाने देवेंद्र को यह साबित करने में जुटी रही कि दरअसल वे सिर्फ हिंदुओं के वोट के लिए हिंदुतव की राजनीति करते हैं, अलबत्ता उनका नजरिया दूसरा है। यह बात और है कि बीजेपी की ओर से शिवसेना के बयानों पर वैसी प्रतिक्रियाएं नहीं आई हैं, जैसी उसकी प्रतिक्रिया अबू आजमी के बयान के बाद आई थी, जिसमें आजमी ने औरंगजेब की प्रशंसा की थी। 

अगर हम मान लेते हैं कि छावा की वजह से मुस्लिम समुदाय में गुस्सा था, क्योंकि इस फिल्म में औरंगजेब के चरित्र को उनके जेहनी छवि से अलग रूप में पेश किया गया है, तो इसका मतलब यह है कि फिल्म किताब की तुलना में कहीं ज्यादा प्रभावी माध्यम है। यह फिल्म मराठी के मशहूर उपन्यासकार शिवाजी सावंत के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित है। दिलचस्प यह है कि यह उपन्यास करीब 46 साल पहले 1979 में प्रकाशित हुआ था, जिसका हिंदी समेत कई अन्य भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। छावा का मतलब बच्चा या बेटा होता है। यह उपन्यास शिवाजी के बेटे संभाजी के जीवन पर केंद्रित है। इस उपन्यास में छत्रपति संभाजी के साथ औरंगजेब के युद्ध और मराठा साम्राज्य पर औरंगजेब के अत्याचार की कहानियां हैं। फिल्म में इसे ही उभारा गया है। 

वैसे एक सवाल यह भी उठता है कि ऐतिहासिक चरित्रों को लेकर कोई समुदाय इस कदर क्यों खुद की भावनाओं को जोड़ लेता है ? औरंगजेब के चरित्र को लेकर इतना गुस्से में भरने की जरूरत ही क्यों पड़े कि अपने आज के पड़ोसियों के साथ विवाद खड़ा करना पड़े। अगर किसी चरित्र का ऐतिहासिक स्वरूप क्रूरता से भरा है तो क्रूरता का बचाव ही क्यों करना? सवाल राजनीति से भी पूछे जा सकते हैं कि राजनीतिक लाभ-हानि के हिसाब को कब परे रखकर ऐतिहासिक चरित्रों का समग्रता से मूल्यांकन करेगी? सवाल यह भी उठ सकता है कि क्या हम इतिहास को लेकर रोज-रोज के अपने रिश्तों को इतना बिगाड़ लेंगे कि हम वर्तमान में अपने साथियों और पड़ोसियों के साथ सुकून के साथ बैठ नहीं सकें, दो बोल बोल नहीं सकें। सवाल इतिहासकारों से भी पूछा जाना चाहिए कि वे कब अपनी वैचारिक खेमेबाजी से उठकर किसी ऐतिहासिक घटना और चरित्र का आकलन करेंगे और कब तक अपने वैचारिक आकाओं के राजनीतिक मोहरे बनते रहेंगे?

इन सबमें दिलचस्प यह है कि छावा फिल्म के जरिए फिल्मकार की मोटी कमाई हो रही है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक यह फिल्म साढ़े सात सौ करोड़ रूपए से ज्यादा की कमाई कर चुकी थी। यानी विवादों ने फिल्म को आर्थिक फायदा खूब पहुंचाया है। इस पूरे विवाद में अगर नुकसान हुआ है तो सिर्फ और सिर्फ भारत के लोक का, जो लोकतंत्र का आधार है। जो आपस में ही लड़ने को उतारू है। उसे ऐतिहासिक चरित्रों को लेकर अपनी खेमेबंदी अपने वैचारिक आधारों की बुनियाद पर खड़ी करने की बजाय समग्रता में करनी होगी। अन्यथा उसकी भावनाओं के जरिए कारोबार भी होगा और राजनीति भी होती रहेगी।

-उमेश चतुर्वेदी

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं

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