By नीरज कुमार दुबे | Apr 06, 2026
केरल विधानसभा चुनाव के लिए गुरुवार को मतदाता अपना फैसला सुनाने जा रहे हैं। मुकाबला सीधा है, लेकिन तस्वीर धुंधली है। एक तरफ सत्तारुढ़ वाम मोर्चा है तो दूसरी तरफ कांग्रेस के नेतृत्व वाला संयुक्त मोर्चा। सवाल यह है कि आखिर दोनों में फर्क क्या है जिसे देखकर मतदाता अगले पांच साल के लिए नई सरकार का फैसला करेंगे?
वाम और कांग्रेस, दोनों के घोषणा पत्रों में समानताएं भरी पड़ी हैं। कल्याण योजनाएं, स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार, न्यूनतम समर्थन मूल्य में सुधार, पेंशन बढ़ोतरी, बुजुर्गों की देखभाल और बुनियादी ढांचा विकास, सब कुछ दोनों तरफ से किये गये वादों में शामिल है। 2021 में दोनों गठबंधनों का मत प्रतिशत लगभग बराबर रहा था। ऐसे में यह चुनाव किसी स्पष्ट मुद्दे पर नहीं, बल्कि बारीक रणनीतियों और वोट के बंटवारे पर टिका हुआ नजर आता है।
तीसरी ताकत के रूप में भारतीय जनता पार्टी की भूमिका भी कम दिलचस्प नहीं है। उसे कई विश्लेषक वोट काटने वाली ताकत मानते हैं, तो कुछ इसे खेल बिगाड़ने वाला खिलाड़ी कह रहे हैं। साफ है कि मुकाबला सीधा होते हुए भी उलझा हुआ है, जहां हर वोट का महत्व कई गुना बढ़ गया है।
देखा जाए तो केरल की राजनीति को समझना आसान नहीं है। यह राज्य जितना जागरूक है, उतना ही उग्र भी। राजनीतिक हिंसा यहां की एक कड़वी सच्चाई है। पार्टी कार्यकर्ताओं की हत्याएं, बदले की कार्रवाई, और वैचारिक टकराव, यह सब उस राज्य में होता है जहां साक्षरता दर सबसे ऊंची है और विदेशों से आने वाला धन जीवन स्तर को मजबूत करता है।
यह विरोधाभास यहीं खत्म नहीं होता। एक तरफ केरल ने जाति के खिलाफ शुरुआती विद्रोह देखे, महिलाओं की भागीदारी अपेक्षाकृत बेहतर रही, वहीं दूसरी तरफ समाज में गहरे बैठे पुरुष वर्चस्व की परतें भी सामने आती रहती हैं। हाल की रिपोर्टों ने फिल्म जगत में व्याप्त विषाक्त माहौल को उजागर किया है। इससे यह भी साफ होता है कि सामाजिक प्रगति के बावजूद मानसिकता में बदलाव नहीं हुआ है।
इस चुनाव में एक और अहम पहलू है, बुजुर्ग मतदाताओं की बढ़ती संख्या। हर पांच में से एक मतदाता बुजुर्ग है। वहीं खाड़ी देशों में काम करने वाले प्रवासियों का वोट इस बार कम असर डाल सकता है क्योंकि उनकी वापसी सीमित रही है।
सबसे बड़ा और निर्णायक कारक इस बार धर्म आधारित समीकरण बन सकता है। केरल में मुस्लिम और ईसाई समुदाय की बड़ी हिस्सेदारी है। लंबे समय से राज्य में धर्मनिरपेक्ष संतुलन बना रहा, लेकिन अब उसमें दरार की चर्चा तेज है। भारतीय जनता पार्टी का हिंदू एकजुटता अभियान तेजी से बढ़ रहा है, जिसके जवाब में अल्पसंख्यक समुदाय रणनीतिक मतदान की तैयारी में है।
लेकिन यहां भी एक पेंच है। अल्पसंख्यक समूह खुद एकजुट नहीं हैं, जिससे वोट बंटने की संभावना बनी हुई है। इसका फायदा किसे मिलेगा, यह कहना मुश्किल है, लेकिन इससे सत्तारुढ़ पक्ष को बढ़त मिल सकती है, चाहे उसके खिलाफ कितनी ही नकारात्मक भविष्यवाणियां क्यों न की जा रही हों। हम आपको बता दें कि केरल में इस तरह के प्रबल संकेत मिल रहे हैं कि राज्य की राजनीति अपनी दशकों पुरानी परंपरा को तोड़ सकती है इसलिए सवाल उठ रहा है कि क्या मतदाता इतिहास रचते हुए मौजूदा सरकार को लगातार तीसरी बार चुनेंगे?
हम आपको बता दें कि दशकों से केरल की राजनीति दो ध्रुवों के बीच घूमती रही है। हर पांच साल में सत्ता बदलना यहां की पहचान रहा है। लेकिन 2021 में यह चक्र टूट गया था, जब पिनरायी विजयन के नेतृत्व में वाम मोर्चा लगातार दूसरी बार सत्ता में लौटा। इससे पहले कोई भी मुख्यमंत्री दस साल लगातार सत्ता में नहीं रहा था। अब सवाल यह है कि क्या यह सिलसिला और आगे बढ़ेगा।
कई विश्लेषक मानते हैं कि दस साल की सत्ता विरोधी लहर वाम मोर्चे के खिलाफ जा सकती है और संयुक्त मोर्चा बढ़त में दिख रहा है। साथ ही 2024 के लोकसभा चुनाव में संयुक्त मोर्चे ने बीस में से अठारह सीटें जीत ली थीं और मत प्रतिशत में भी बड़ी बढ़त बनाई थी। इसके अलावा 2025 के स्थानीय निकाय चुनावों में भी उसका प्रदर्शन मजबूत रहा था। यह सब संकेत देता है कि वाम मोर्चा मुश्किल में है।
लेकिन जमीन की सच्चाई इतनी आसान नहीं है। केरल में लोकसभा और विधानसभा चुनावों का रुझान अलग रहा है। पिछले तीन दशकों में लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के नेतृत्व वाला संयुक्त मोर्चा अक्सर बेहतर प्रदर्शन करता रहा है, जबकि विधानसभा चुनावों में मुकाबला बेहद करीबी होता है। यही वजह है कि लोकसभा चुनावों में मिली बड़ी जीत को सीधे विधानसभा चुनावों की जीत मान लेना भारी भूल साबित हो सकता है।
आंकड़े बताते हैं कि विधानसभा चुनावों में दोनों गठबंधनों के बीच मत प्रतिशत का अंतर हमेशा बहुत कम रहा है। लेकिन पिछले दो चुनावों में यह अंतर बढ़ा है। वाम मोर्चा जब जीतता है तो बड़ी जीत दर्ज करता है और जब हारता है तो बहुत कम अंतर से हारता है। 2021 में उसने 140 में से 99 सीटें जीती थीं, जबकि 2011 में वह केवल 68 सीटों के साथ मामूली अंतर से हार गया था।
इसके अलावा लगभग 89 सीटें ऐसी हैं जो पिछले तीन चुनावों में एक ही गठबंधन के पास बनी हुई हैं। वाम मोर्चा ने 50 सीटें संभाल रखी हैं, जबकि संयुक्त मोर्चा 39 सीटों पर मजबूत बना हुआ है। यह दिखाता है कि लड़ाई उतनी आसान नहीं है जितनी दिख रही है।
पिनरायी विजयन अब भी एक मजबूत चेहरा बने हुए हैं। बाढ़ और महामारी के दौरान उनके नेतृत्व और कल्याणकारी योजनाओं ने उन्हें विश्वसनीय बनाया। हालांकि दूसरी पारी में आर्थिक ठहराव और प्रशासनिक अक्षमता को लेकर सवाल उठे हैं, फिर भी उनकी लोकप्रियता विपक्ष के किसी भी चेहरे से ज्यादा बनी हुई है।
हम आपको बता दें कि केरल की राजनीति का एक और जटिल पहलू इसकी सामाजिक और भौगोलिक संरचना है। उत्तर केरल संयुक्त मोर्चे का गढ़ माना जाता है, खासकर मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में, जहां मुस्लिम लीग की मजबूत पकड़ है। दक्षिण केरल में हिंदू मतदाता अधिक हैं और वहां वाम मोर्चा मजबूत रहा है। जबकि मध्य केरल असली रणभूमि है, जहां हर चुनाव में समीकरण बदलते रहते हैं।
संयुक्त मोर्चा लंबे समय से मुस्लिम और ईसाई समुदाय के समर्थन पर टिका रहा है, जबकि वाम मोर्चा को ग्रामीण, निम्न आय वर्ग और हिंदू मतदाताओं से समर्थन मिलता रहा है। लेकिन अब यह समीकरण भी बदलता दिख रहा है। मुस्लिम वोटों का कांग्रेस की ओर झुकाव बढ़ रहा है, जिससे कुछ क्षेत्रों में हिंदू और ईसाई मतदाताओं में प्रतिक्रिया पैदा हो सकती है।
यहीं पर तीसरी ताकत के रूप में भारतीय जनता पार्टी का खेल शुरू होता है। अब तक वह तीसरे स्थान पर रही है, लेकिन पिछले एक दशक में उसका मत प्रतिशत लगातार बढ़ा है। 2024 में उसने त्रिशूर सीट जीती और तिरुवनंतपुरम में दूसरे स्थान पर रही। 2025 में उसने तिरुवनंतपुरम के महापौर चुनाव में भी जीत दर्ज की।
इस बार भाजपा केवल हिंदू एकजुटता पर निर्भर नहीं है, बल्कि ईसाई समुदाय तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रही है। चर्च नेतृत्व से संवाद और पहचान की राजनीति पर जोर, उसकी रणनीति का हिस्सा है। यह रणनीति भले बड़े बदलाव न लाए, लेकिन कई सीटों पर समीकरण बिगाड़ सकती है।
बहरहाल, यह चुनाव केवल यह तय नहीं करेगा कि सरकार कौन बनाएगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि केरल अपनी पुरानी राजनीतिक परंपरा को तोड़ेगा या फिर उसी राह पर लौटेगा। नतीजा चाहे जो भी हो, इतना तय है कि इस बार चुनाव का रास्ता ही केरल की राजनीति को नए सांचे में ढाल सकता है।