रिकॉर्ड के मोर्चे पर कौन भारी, कौन कमजोर

By उमेश चतुर्वेदी | Jun 16, 2026

इस बार 11 जून की तारीख भारतीय इतिहास के लिए विशेष बनकर आई। इसी दिन निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने सबसे ज्यादा दिन शासन चलाने का रिकॉर्ड कायम कर दिया। इसके पहले निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में सबसे ज्यादा 4398 दिन प्रधानमंत्री रहने का रिकॉर्ड देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के नाम है। मौजूदा दौर विशेषकर विजुअल मीडिया के वर्चस्व का दौर है। विजुअल मीडिया की चूंकि उत्सवधर्मिता केंद्रित है, लिहाजा इस रिकॉर्ड को लेकर सत्ता पक्ष में उत्साह का माहौल होना ही था और ऐसा है भी। लेकिन इसे लेकर आलोचनाओं की बाढ़ भी आ गई है। विशेषकर प्रगतिशील खेमे से मोदी के इस रिकॉर्ड को लेकर तंज में आलोचनाएं की जा रही हैं। इन आलोचनाओं का भाव कुछ वैसे ही है, जैसे कहां राजा भोज, कहां गंगू तेली। आलोचकों की नजर में कहावत के राजा भोज नेहरू हैं और गंगू मोदी। 

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इसलिए अव्वल तो ऐसी तुलनाएं होनी ही नहीं चाहिए थी। क्योंकि नेहरू के युग में भारत की जो स्थिति थी, वह अब नहीं है। इतिहास का कोई खंड कठिन होता है तो कोई आसान। इसलिए इतिहास के काल खंड की बुनियाद पर उस दौर के शासक की परख होनी चाहिए। इसका मतलब यह नहीं कि भविष्य का शासक अपनी उपलब्धियों का जश्न नहीं मना सकता। 

प्रधानमंत्री मोदी को लेकर जिस तरह का राजनीतिक माहौल स्थापित हो चुका है, उसमे अगर प्रगतिशील खेमा और कांग्रेस की आलोचना के केंद्र में मोदी ना रहें तो ही हैरत होगी। प्रगतिशील खेमा मोदी को कमतर दिखाने की कोशिश में नेहरू को सबसे ज्यादा दिनों तक प्रधानमंत्री दिखाने की कोशिश कर रहा है। इस आलोक में इतिहास के तथ्यों को जांचना जरूरी है। इसमें दो राय नहीं कि जब 15 अगस्त 1947 को देश को आजादी मिली, तब पंडित जवाहर लाल नेहरू ने ही देश के पहले प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली थी। लेकिन वह किसी एक दल विशेष यानी कांग्रेस की ही सरकार नहीं थी, बल्कि एक तरह से वह राष्ट्रीय सरकार थी, जिसमें अंबेडकर भी थे और श्यामाप्रसाद मुखर्जी भी।

द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद ऐसा लगने लगा था कि भारत को आजादी मिल जाएगी। इस बीच ब्रिटेन में लेबर पार्टी की सरकार बनी और लॉर्ड एटली प्रधानमंत्री बने। एटली ने चुनावी वादा किया था कि अगर उनकी पार्टी की सरकार बनी तो भारत को स्वाधीनता दी जाएगी। जब उन्होंने ब्रिटेन की कमान संभाल ली तो उन्होंने भारत को आजादी देने की प्रक्रिया तेज कर दी। इसी सिलसिले में 1946 में कैबिनेट मिशन भारत आया। मिशन के सामने सवाल यह था कि सत्ता का हस्तांतरण किसे किया जाएगा, क्योंकि उन दिनों भारत में दो बड़े और प्रमुख दल थे, कांग्रेस और मुस्लिम लीग। लेकिन सत्ता किसे सौंपी जाए, इस सवाल के साथ ही भारत की भावी सरकार और विधान को तैयार करने के लिए संविधान सभा का चुनाव 1946 में हुआ। इस चुनाव में कांग्रेस को 208 और मुस्लिम लीग को 73 सीटें मिलीं। दूसरे दलों और निर्दलीयों को 15 सीटें मिलीं थी। इसके पहले प्रांतीय विधानसभाओं के चुनाव हुए थे, जिसमें कांग्रेस को 923 और मुस्लिम लीग को 425 सीटें मिली थीं। कांग्रेस को सामान्य सीटों के नब्बे प्रतिशत हिस्से पर जीत मिली, मुस्लिम बहुल 87 प्रतिशत सीटों पर मुस्लिम लीग को जीत मिली। इसके बाद सबसे बड़ा दल होने के नाते कांग्रेस को ही सत्ता हस्तांतरण होना तय हुआ। इस दौरान कांग्रेस अध्यक्ष का महत्व बढ़ गया। उन दिनों कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए अधिकांश प्रांतीय समितियों ने सरदार पटेल का नाम आगे किया था, जबकि कुछ ही प्रांतीय कांग्रेस समितियों ने जवाहर लाल नेहरू का नाम आगे किया। चूंकि गांधी जी पहले ही कह चुके थे कि उनके बाद जवाहर उनकी भाषा बोलेगा यानी सत्ता उन्हें मिलेगी, इसलिए वे ही अध्यक्ष बनाए गए। इसके बाद सत्ता हस्तांतरण प्रक्रिया के तहत 2 सितंबर 1946 को 'अंतरिम सरकार' का गठन हुआ, जिसमें नेहरू जी को 'वायसराय की कार्यकारी परिषद का उपाध्यक्ष' बनाया गया, उस पद का नाम प्रधानमंत्री नहीं था। इसे अंतरिम सरकार कहा गया।  भले ही कुछ लोग सुविधा के लिए नेहरू के प्रधानमंत्रित्व काल को उसी दिन से मान लेते हैं। यहां याद करना जरूरी है कि वायसराय की कार्यकारी परिषद के पदेन अध्यक्ष खुद वायसराय लॉर्ड वेवेल थे। उनके बाद आए वायसराय माउंटबेटन इसके अध्यक्ष रहे।

देश को स15 अगस्त 1947 को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947' के तहत देश को आजाद घोषित किया गया। इस कानून के मूल पाठ में कहीं भी "प्राइम मिनिस्टर" या प्रधानमंत्री शब्द नहीं लिखा हुआ है। हालांकि पंद्रह अगस्त 1947 की आधी रात को नेहरू ने स्वाधीन सरकार के मंत्री के रूप में शपथ ली, भले ही वे उसके मुखिया थे। नेहरू ने अंग्रेजी में शपथ लेते हुए ‘ऑफिस ऑफ मिनिस्टर’ यानी मंत्री पद की शपथ ली थी, प्रधानमंत्री पद की नहीं। इसके बाद ही उन्होंने ‘नियति से साक्षात्कार’ वाला प्रसिद्ध भाषण दिया था। यहां याद करना चाहिए कि भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम के तहत तत्कालीन  गवर्नर-जनरल को ब्रिटिश सम्राट के प्रतिनिधि के रूप में दोनों उपनिवेशों भारत और पाकिस्तान का संवैधानिक प्रमुख नियुक्त किया गया था। जिन्हें सलाह देने और शासन चलाने के लिए एक मंत्रि परिषद  का प्रावधान था। इस प्रावधान में प्रधानमंत्री या प्रीमियर या प्राइम मिनिस्टर का कोई पद नहीं है। गवर्नर-जनरल को इसी मंत्रि परिषद की सलाह पर शासन चलाना था। 

मोदी को सबसे लंबे समय तक बतौर निर्वाचित प्रधानंत्री काम करने के रिकॉर्ड को गलत साबित करने वाला प्रगतिशील तबके का तर्क है कि 1946 के चुनावों में कांग्रेस सबसे बड़ा दल बन कर उभरी और उसके निर्वाचित नेता के तौर पर नेहरू ने सरकार चलाई। लेकिन हकीकत यह है कि 1946 का चुनाव वयस्क मतदान के अधिकार और एक व्यक्ति, एक वोट के सिद्धांत के तहत नहीं हुआ था। तब वोटर होने की शर्त संपत्ति, शिक्षा, कर भुगतान आदि था। मुसलमान सिर्फ मुस्लिम बहुल सीटों के ही मतदाता थे। एक तरह से यह सार्वभौम वयस्क मतदान के अधिकार से रहित चुनाव था। इसलिए सही मायने में 1946 का  चुनाव ना तो समानता और वयस्क मतदान के अधिकार से लैस था, न ही पूरे देश के मतदाताओं का प्रतिबिंब था। एक तरह से कहें तो यह सिर्फ दस प्रतिशत लोगों के मतदान की बुनियाद पर हुआ चुनाव था। जिसमें हर वयस्क की भागीदारी नहीं थी। उन दिनों धार्मिक आधार पर अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्र भी थे। इसलिए 1946 का चुनाव सही मायने में संतुलित मतदान नहीं था। स्वाधीन भारत में पहला आम चुनाव 1951 -52 के बीच हुआ। जिसमें कांग्रेस को 364 सीटें मिलीं। इसी नतीजे के आधार पर पंडित नेहरू ने 13 मई 1952 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली और 27 मई 1964 को मृत्यु पर्यंत अपने पद पर रहे। इसी लिहाज से नेहरू का निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में कार्यकाल 4398 दिन ही होता। आधुनिक सार्वभौम मतदान के अधिकार और सिद्धांत के लिहाज से देखें तो पंडित नेहरू का निर्वाचित प्रधानमंत्री के तौर पर असल कार्यकाल 13 मई 1952 से 27 मई 1964 तक का ही होता है। 

रही बात नेहरू और मोदी के कार्यकाल की उपलब्धियों की, तो इसकी तुलना की जा सकती है। भारत की आजादी के वक्त देश में बीस विश्वविद्यालय थे, जिसे नेहरू ने अपने कार्यकाल में 64 तक पहुंचा दिया था। इस लिहाज से देखें तो मोदी के कार्यकाल में देश में साढ़े पांच सौ से ज्यादा विश्वविद्यालय हो चुके हैं। नेहरू समर्थक कह रहे हैं कि आजादी के वक्त देश में 15 मेडिकल कॉलेज थे, जिनकी संख्या बढ़ाकर नेहरू ने 81 कर दी थी। लेकिन जब मोदी ने कार्यकाल संभाला तो देश में 393 मेडिकल कॉलेज थे, जिसे उन्होंने 818 तक कर दिया है। 431 मेडिकल कॉलेज तो 2014 के बाद ही बने हैं। बेशक नेहरू अपनी विदेश नीति के लिए जाने जाते हैं, लेकिन मोदी ने भारत के स्वत्व बोध को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खूब बढ़ाया है।

- उमेश चतुर्वेदी

लेखक राजनीतिक समीक्षक और वरिष्ठ पत्रकार हैं...

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