लोकहित के नाम पर Parliament में हंगामा, हर घंटे ₹1.5 Crore के नुकसान का कौन है जिम्मेदार?

By योगेंद्र योगी | Aug 24, 2026

जिस देश में करोड़ों लोगों को साफ पीने का पानी, पर्याप्त बिजली, राशन, स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएं मयस्सर नहीं हैं, वहां सिर्फ आम लोगों की भलाई के नाम पर संसद में हंगामा करके अरबों रूपए स्वाह कर दिए जाते हैं। संसद में अब तक मानसून सत्र के दौरान हंगामे और व्यवधान के कारण लोकसभा में 7,023 मिनट का समय बर्बाद हो। अर्थात प्रति मिनट करीब ₹2.5 लाख खर्च का अनुमान हुआ। यह आंकड़ा करीब ₹175 करोड़ बैठता है। देश के लोकतंत्र का मंदिर है संसद, जहां पर जनता की, उनके अधिकारों, मुद्दों की आवाज़ गूंजनी चाहिए। लेकिन वहां अभी तक के मानसून सत्र में सिर्फ शोर सुनाई दिया। विपक्ष का हंगामा कान के पर्दों को फाड़ रहा है। सवाल ये है कि इस शोर का बिल कौन भर रहा है? तो जवाब है—देश की जनता। क्योंकि संसद में हर मिनट हंगामा होता है तो सिर्फ बहस नहीं रुकती, बल्कि करीब ढाई लाख रुपये भी पानी की तरह बहते रहते हैं।

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संसद की कार्यवाही एक दिन के लिए अगर स्थगित होती है तो इसके पीछे 9 करोड़ रुपये का घाटा होता है। इस रकम को प्रति घंटे और प्रति मिनट के आधार पर यह प्रति घंटे एक करोड़ पचास लाख यानी डेढ़ करोड़ होती है। यह आंकड़ा इस साल के बजट सत्र के दौरान लोकसभा में पीठासीन स्पीकर जगदंबिका पाल ने दिया था। साल 2014 से लेकर 2024 के आंकड़ों पर गौर करें तो बार-बार सदन के स्थगित होने की वजह से सरकारी तिजोरी का करीब 3300 करोड़ रुपया पूरी तरह बर्बाद हो चुका है। संसद के इस तरह से बार-बार ठप होने पर ना सिर्फ जरूरी काम रुकते हैं, बल्कि लोगों के पैसे पर भी असर पड़ता है।

इसी तरह संसद के साल 2025 के मॉनसून सत्र दौरान सांसदों ने देशहित की बजाय अपनी राजनीति में अधिक समय गंवा दिया। लोकसभा में सांसदों को 120 घंटे देश के मुद्दों पर चर्चा करनी थी, लेकिन वास्तव में सिर्फ 37 घंटे ही काम हुआ। अर्थात 83 घंटे बेकार गए। केवल 31% काम हुआ और बाकी 69% समय सांसदों की आपसी राजनीति और हंगामे में बर्बाद हो गया। राज्यसभा का भी यही हाल था। यहां भी 120 घंटे काम होना चाहिए था, लेकिन सिर्फ 47 घंटे ही काम किया गया। मतलब 73 घंटे बर्बाद हो गए। राज्यसभा में भी सांसदों ने सिर्फ 38% काम किया। लोकसभा में 83 घंटे काम नहीं हुआ, जिससे लगभग 124 करोड़ 50 लाख रुपये जनता के पैसे बर्बाद हो गए। वहीं राज्यसभा में 73 घंटे की बर्बादी से करीब 80 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। पिछले मानसून सत्र में दोनों सदनों में मिलाकर कुल 204 करोड़ 50 लाख रुपये बर्बाद हो गए। यह पैसा जनता के काम पर खर्च हो सकता था, लेकिन हंगामे और राजनीति की वजह से व्यर्थ चला गया।

संसद के चलने में करोड़ों के इस खर्च का सबसे बड़ा हिस्सा अर्थात करीब 35 से 40 प्रतिशत खर्च इन्हीं सांसदों के वेतन, भत्तों और सुविधाओं पर होता है जो संसद में खड़े होकर चीखते हैं, हंगामा बरपाते हैं, बिलों को पेश तक नहीं होने दे रहे। इन सांसदों को एक लाख रुपये मासिक वेतन, 70 हजार रुपये निर्वाचन क्षेत्र भत्ता, 60 हजार रुपये कार्यालय और सहायक खर्च दिया जाता है। इसके अलावा दिल्ली आने पर प्रतिदिन 2 हजार रुपये का विशेष भत्ता और यात्रा सुविधाएं भी मिलती हैं।

संसद सचिवालय के हजारों कर्मचारियों पर करीब 25 से 30 प्रतिशत खर्च होता है। इसमें प्रशासनिक अधिकारी, रिपोर्टर, ट्रांसलेटर्स, रिसर्च स्टाफ, स्टेनोग्राफर, मार्शल, डेटा एंट्री ऑपरेटर और सफाई कर्मचारियों का वेतन शामिल है। करीब 20 प्रतिशत खर्च संसद की हाई-टेक व्यवस्थाओं पर होता है। बिजली-पानी, संसद टीवी की लाइव ब्रॉडकास्टिंग, हाई-एंड रिकॉर्डिंग सिस्टम, डिजिटल वोटिंग पैनल, साथ में इनका खाना-पीना और रोज छपने वाले सैकड़ों विधायी दस्तावेजों की लागत इसी में आता है। 10 से 15 प्रतिशत खर्च संसद की सुरक्षा व्यवस्था पर होता है। दिल्ली पुलिस, सीआरपीएफ, संसद सुरक्षा सेवा, 24 घंटे चलने वाला सीसीटीवी नेटवर्क, आधुनिक स्कैनर और बायोमेट्रिक सिस्टम, ये सब तब भी चलते रहते हैं जब सदन में काम ठप हो जाता है। मतलब देश के खजाने के खर्च का मीटर लगातार घूमता रहता है।

लोकसभा में कार्यवाही स्थगित करने का अधिकार स्पीकर यानी अध्यक्ष के पास होता है। राज्यसभा में यह अधिकार सभापति की कुर्सी पर बैठे उपराष्ट्रपति या उनकी गैरमौजूदगी में बैठक को संचालित कर रहे उपसभापति या पीठासीन अधिकारी के पास होता है। संसद की कार्यवाही स्थगित होने का मतलब है कि सदन की बैठक को कुछ समय के लिए या फिर पूरे दिन के लिए रोक दिया जाए। सदन में व्यवस्था बनाए रखना चुनौतीपूर्ण होने पर वह अधिकार का प्रयोग कर सकते हैं।

सवाल यह भी है कि क्या विपक्ष जानबूझकर हंगामा करता है? लोकतंत्र में विपक्ष का काम सरकार से जवाब मांगना भी होता है। कई बार विपक्ष की तरफ से चर्चा की मांग, जांच की मांग, मंत्री का बयान, प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति को लेकर विरोध किया जाता है। अगर उसकी मांग स्वीकार नहीं होती तो विरोध तेज हो सकता है। वहीं दूसरी तरफ सरकार का कहना होता है कि चर्चा नियमों के अनुसार होनी चाहिए और बाधा होने से जनता का काम रुकता है। इसलिए हर मामले को राजनीतिक परिस्थितियों के संदर्भ में देखना चाहिए। कई बार विपक्ष आरोप लगाता है कि चर्चा की अनुमति नहीं दी गई, जरूरी मुद्दों पर समय नहीं दिया गया, जवाब नहीं दिया गया। जबकि सरकार का पक्ष होता है कि विपक्ष जानबूझकर कार्यवाही नहीं चलने देता।

ऐसा नहीं है कि कांग्रेस और विपक्षी दल ही संसद में हंगामा करते हैं। जब भाजपा विपक्ष में थी, तब भी यही हाल था। भाजपा के सांसद संसद में जमकर हंगामा करके संसद को ठप्प कर देते थे। सारे दल इस लिहाज से एक जैसे नजर आते हैं। सर्वाधिक आश्चर्य की बात यह है कि संसद में अरबों रुपए बर्बाद करके जो हंगामा किया जाता है, वह देश के लोगों की भलाई के नाम पर होता है। इससे बेहतर तो यही है कि इस धन राशि को सीधे विकास कार्यों में खर्च किया जाता। लगता यही है कि किसी को इस तरह की बर्बादी का अफसोस नहीं है। देश के लोग इस मामले में लाचार बने हुए हैं। किसे दोषी ठहाराएं और किसी सही, लेकिन इतना जरूर है कि यह नौबत देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और आम लोगों के हित में नहीं है।

- योगेन्द्र योगी

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