कौन ‘लिख’ रहा है केशव के लिये ’स्क्रिप्ट’

By संजय सक्सेना | Aug 02, 2024

उत्तर प्रदेश की राजनीति भारतीय जनता पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और अब डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य आजकल सबके आकर्षण का केन्द्र बने हुए हैं। पिछड़े समाज से आने वाले केशव प्रसाद मौर्य राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के एक पुराने और समर्पित कार्यकर्ता हैं। 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव के समय केशव पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष थे और बीजेपी की जीत के बाद उनके सीएम बनने की चर्चा काफी जोरों से चली थीं, लेकिन ऐन मौके पर वह सीएम की रेस से बाहर कर दिये गये, जो कारण सामने आये उसमें उनके ऊपर चल रहे आपराधिक मुकदमें अहम थे। मोदी और शाह की जोड़ी नहीं चाहती थी कि केशव प्रसाद को सीएम बनाकर वह विपक्ष को हमलावर होने का मौका दें, इसके बाद बीजेपी आलाकमान की पोटली से अप्रत्याशित रूप से योगी आदित्यनाथ का नाम सामने आया और उन्हें सीएम की कुर्सी पर बैठा दिया गया। उस समय तक योगी की पहचान एक कट्टर हिन्दूवादी नेता की होती थी और हिन्दू वाहिनी नाम से वह एक संगठन भी चलाते थे, जो काफी एग्रेसिव होकर हिन्दुत्व को प्रखरता प्रदान करता था। 

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एक बात और केशव प्रसाद मौर्य पार्टी के भीतर तो विरोध की चिंगारी भड़काये हुए हैं, लेकिन विपक्ष के हाथ का खिलौना वह नहीं बनना चाहते हैं, इसीलिऐ जैसे ही सपा प्रमुख अखिलेश यादव नाराज केशव प्रसाद मौर्य को कोई ऑफर देते हैं तो केशव उनको करारा जवाब देकर चुप करा देते हैं। केशव की बातें योगी खेमें को काफी चुभती हैं जब केशव संगठन को सरकार से बड़ा बताते हैं तो इसमें राजनीति के जानकार सियासी रंग तलाशने लगते हैं, अब तक केशव कम से कम दो बार कह चुके हैं कि संगठन सरकार से भी बड़ा है। केशव इस समय किस-किस से मिल रहे हैं, इसको लेकर सभी में जिज्ञासा बनी रहती है। दिल्ली में पार्टी के बड़े नेताओं से उनकी मुलाकात और बातचीत को लेकर भी सुर्खियां बनी रहती है। वहीं केशव से मिलने वालों में भाजपा की सहयोगी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के प्रमुख ओम प्रकाश राजभर भी शामिल हैं। मौर्य के एक अन्य ओबीसी नेता, निषाद पार्टी के संजय निषाद से भी मुलाकात की चर्चा गरम है। केशव के राजभर और निषाद से मुलाकात के कई मायने हैं। लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद संजय निषाद ने ही पहला बयान दिया था कि बुलडोजर के दुरुपयोग ने हमें हरा दिया। इन्हीं लाइनों पर ओमप्रकाश राजभर ने भी बुलडोजर राजनीति की आलोचना की थी। दोनों ओबीसी नेताओं के बयान साफ तौर पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ है, जो खुद को बुलडोजर बाबा कहलवाना पसंद करते हैं। विपक्ष का आरोप है कि योगी ने ही सबसे पहले बुलडोजर से मुस्लिमों के घर-दुकान आदि गिराने की शुरुआत की थी। ओमप्रकाश राजभर तो अब योगी कैबिनेट में मंत्री भी हैं। लेकिन वो मुखर योगी विरोधी हैं। ऐसे में केशव प्रसाद मौर्य का योगी के दो कट्टर विरोधियों से मिलने का मतलब आसानी से निकाला जा सकता है।यह मुद्दा इसलिए गंभीर है, क्योंकि एक अन्य ओबीसी नेता और अपना दल (एस) की अनुप्रिया पटेल भी योगी के खिलाफ मुखर नजर आ रही हैं। केशव और अनुप्रिया के सुर भी मिल रहे हैं। 

बहरहाल, इस बात की संभावना नहीं है कि केशव पार्टी के खिलाफ बगावत भी कर सकते हैं। डिप्टी सीएम केशव लंबे समय से भाजपा के वफादार हैं। वो एक गैर-राजनीतिक पृष्ठभूमि से आते हैं, जिन्होंने विश्व हिन्दू परिषद में कार्य किया तो अपने दम पर आरएसएस में जगह बनाई। उन्होंने राम मंदिर आंदोलन में भाग लिया, जिसने यूपी में बीजेपी की किस्मत बदल दी। वह यूपी के सिराथू से एक बार के विधायक और एक बार के सांसद हैं। उन्होंने प्रदेश भाजपा में विभिन्न संगठनात्मक पदों पर काम किया है और 2017 में जब भाजपा को सत्ता मिली तो वो प्रदेश भाजपा अध्यक्ष थे। 

केशव प्रसाद मौर्य इतने गुस्से में क्यों हैं, यह तो समझ में आता है, लेकिन केशव के गुस्से को आलाकमान शांत क्यों नहीं करा रहा, यह समझ से परे बात है। कहा तो यह भी जाता है कि ओबीसी नेता होने की वजह से भाजपा आलाकमान (मोदी-शाह) केशव की तरफ से मुंह मोड़े हुए है। केशव प्रसाद मौर्य 2022 का विधानसभा चुनाव सिराथू से महज 7337 वोटों से हार गए। मौर्य ने इसके लिए योगी को जिम्मेदार ठहराया। मौर्य ने आलाकमान तक से शिकायत की कि उन्हें अपनी ही सरकार ने हरा दिया। भाजपा आलाकमान ने योगी को संदेश देने के लिए केशव प्रसाद मौर्य को डिप्टी सीएम बनवा दिया। योगी आलाकमान के फैसले से अभी तक नाराज हैं। केशव प्रसाद मौर्य लगातार चुनौतियों पेश कर रहे हैं और पार्टी आलाकमान उन्हें चेतावनी तक नहीं दे रहा है। इससे यूपी की जनता में योगी को लेकर गलत संदेश जा रहा है लेकिन आलाकमान ने मौर्य को कुछ नहीं कहा। पिछले दिनों जब लखनऊ में प्रदेश भाजपा कार्यकारिणी की बैठक हुई तो मौर्य के तेवर सख्त थे। जिसमें उन्होंने वो जुमला कहा था कि संगठन सरकार से बड़ा होता है। बाद में मौर्य ने इस जुमले को एक्स पर पोस्ट भी किया था। मौर्य की गतिविधियां बता रही हैं कि उन्हें भाजपा आलाकमान का संरक्षण मिला हुआ है और पार्टी अब योगी से छुटकारा पाना चाहती है। लेकिन योगी अपनी आखिरी कोशिश जारी रखे हुए हैं। कहा जा रहा है कि 10 सीटों पर विधानसभा उपचुनाव के बाद योगी को हटा दिया जाएगा।

उधर, यूपी बीजेपी का झगड़ा सुलझाने के लिए कोशिशें तो आरएसएस की तरफ से भी हो रही हैं, लेकिन अभी तक उसका कोई असर तो नहीं ही नजर आ रहा है, लेकिन लगता है ये झगड़ा उपचुनावों में ही भारी पड़ने वाला है। लोकसभा चुनाव में बुरी शिकस्त मिलने के बाद बीजेपी के लिए यूपी में ये नई और बड़ी चुनौती है। लब्बोलुआब यह है कि केशव को कहां से योगी के खिलाफ बैकअप मिल रहा है। कहीं आलाकमान ही तो नहीं योगी को हटाने के लिये ही तो केशव के माध्यम से स्क्रिप्ट नहीं लिख रहा है।

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