पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम, केरल, पुडुचेरी विधानसभा चुनावों में कौन मारेगा बाजी?

By नीरज कुमार दुबे | Dec 29, 2025

साल 2025 भारतीय राजनीति में सत्ताधारी एनडीए के लिये विजय का वर्ष रहा। दिल्ली और बिहार में मिली निर्णायक जीत ने भारतीय जनता पार्टी के आत्मविश्वास को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया। दूसरी ओर विपक्ष के लिये यह साल निराशा, विघटन और हताशा का प्रतीक बन गया। दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी पराजित हुई और बिहार में कांग्रेस, राजद और वाम दलों का महागठबंधन लगभग साफ हो गया। लेकिन राजनीति में स्थायी कुछ नहीं होता। 2026 एक नये युद्ध का वर्ष है जहां सत्ता की जड़ें हिलाने के लिए विपक्ष फिर से प्रयास करेगा।

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सबसे पहले पश्चिम बंगाल की बात करें तो आपको बता दें कि राज्य में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस एक मजबूत किले की तरह खड़ी है, लेकिन इस किले की दीवारों पर अब लगातार भगवा हमले हो रहे हैं। 2016 में मात्र तीन सीटों पर सिमटी भाजपा 2021 में 77 सीटों तक पहुंच गयी। यह उछाल संयोग था या स्थायी चुनौती, इसका फैसला 2026 करेगा। ममता बनर्जी 213 सीटों और लगभग आधे वोट प्रतिशत के साथ सत्ता में हैं, लेकिन सत्ता का बोझ भारी होता है। महंगाई, बेरोजगारी और स्थानीय असंतोष अब उनके सामने खड़े बड़े सवाल हैं। भाजपा पूरी ताकत से मैदान में उतर चुकी है और बिहार की जीत के बाद उसका हौसला दोगुना है। वहीं कांग्रेस और वाम दल अपनी खोई हुई जमीन तलाश रहे हैं, लेकिन उनका संकट यह है कि जनता अब उन्हें गंभीर विकल्प मानने को तैयार नहीं है। विशेष गहन पुनरीक्षण के तहत मतदाता सूचियों में हो रहे बदलाव ने बंगाल की राजनीति में आग और घी का काम किया है। अल्पसंख्यक और शहरी क्षेत्रों में होने वाले परिवर्तन चुनावी गणित को पूरी तरह पलट सकते हैं।

वहीं तमिलनाडु की बात करें तो राज्य हमेशा से द्रविड राजनीति का गढ़ रहा है। द्रमुक और अन्नाद्रमुक के बीच सत्ता की रस्साकशी अब एक बार फिर चरम पर है। मुख्यमंत्री स्टालिन के नेतृत्व में द्रमुक मजबूत स्थिति में है, लेकिन सत्ता विरोधी लहर की आहट साफ सुनाई दे रही है। रोजगार, नीट, बिजली दरें और प्रशासनिक अपेक्षाएं सरकार के लिये अग्निपरीक्षा हैं। अन्नाद्रमुक और भाजपा का गठबंधन इस बार ज्यादा संगठित दिख रहा है। अन्नाद्रमुक महासचिव पलानीसामी का दावा है कि यह मोर्चा 200 से अधिक सीटें जीत सकता है। लेकिन इस गणित को सबसे ज्यादा बिगाड़ने वाला नाम है विजय। उनकी पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम पहली बार मैदान में है और युवा वर्ग में उसका असर नकारा नहीं जा सकता। हालांकि करूर की भगदड़ की घटना ने विजय की छवि को गहरी चोट पहुंचाई है।

वहीं असम को देखें तो राज्य में मुख्यमंत्री हिमंता बिस्व सरमा भाजपा के सबसे आक्रामक चेहरों में गिने जाते हैं। 2021 में 75 सीटें जीतने के बावजूद सत्ता विरोधी भावना अब उभर रही है। सरमा का दावा है कि एनडीए 100 से अधिक सीटें जीतेगा, लेकिन राजनीति में दावे अक्सर जमीनी सच्चाई से टकराते हैं। कांग्रेस के लिये यह करो या मरो की लड़ाई है। नये प्रदेश अध्यक्ष गौरव गोगोई के सामने चुनौती है कि वह लोकसभा चुनावों की सफलता को विधानसभा में बदल सकें। हालांकि दस साल की सत्ता के खिलाफ माहौल बनाना आसान नहीं, खासकर तब जब विपक्षी वोट विभाजित हों। एआईयूडीएफ का रुख यहां निर्णायक साबित हो सकता है।

उधर, केरल की राजनीति हमेशा सत्ता परिवर्तन के लिये जानी जाती रही है, लेकिन वाम मोर्चा इस परंपरा को तोड़ चुका है। अब तीसरी बार सत्ता में लौटने का सपना देखा जा रहा है। मुख्यमंत्री पिनराई विजयन विकास और निरंतरता के नाम पर जनता से समर्थन मांग रहे हैं। वहीं कांग्रेस नीत मोर्चे के लिये यह अस्तित्व की लड़ाई है। यदि इस बार भी नाकामी हाथ लगी तो केरल में कांग्रेस और कमजोर हो जायेगी। भाजपा के लिये भी यह चुनाव अहम है। यदि एक भी सीट वह जीतती है तो केरल की राजनीति में नया अध्याय शुरू होगा।

इस बीच, पुडुचेरी में एनडीए की सरकार अंदरूनी कलह से जूझ रही है। मंत्री का इस्तीफा, दलित असंतोष और गठबंधन की कमजोरी सत्ता को अस्थिर बना रही है। द्रमुक यहां अपनी जड़ें फैलाने की कोशिश में है और कांग्रेस केवल इतना चाहती है कि उसका नाम प्रदेश की राजनीति से न मिटे।

बहरहाल, 2026 के चुनाव सत्ता और विपक्ष, दोनों का इम्तिहान है। यह चुनाव केवल सरकारें नहीं बदलेंगे, यह तय करेंगे कि लोकतंत्र में विकल्प जिंदा हैं या नहीं। देखा जाये तो 2026 का रण सिर्फ सत्ता का नहीं, भविष्य का है।

-नीरज कुमार दुबे

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