ढेंचू-ढेंचू जो करे, वही गधा कहलाए (व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ | Jul 31, 2021

एक दिन इंसानों ने मुर्गों से कहा- अब तुम्हारी बांग में पहली जैसी बात नहीं रही। तुम्हारी जगह हमने अलार्म रख लिया है। वह सही समय पर उठाता है। बिना कन्फ्यूजन के। तुम लोग कभी-कभी रात को ही बांग लगा देते हो। हमारी गहरी नींद तोड़ते तुम्हें शर्म नहीं आती? इस पर मुर्गों ने कहा– अब प्रदूषण इतना बढ़ गया है कि हम दिन और रात में फर्क करने में कन्फ्यूज हो रहे हैं। अपनी गलती का ठीकरा हमारे सर क्यों फोड़ते हैं? इस पर इंसानों ने कहा– तुम्हारे यह सब बहाने सुनने के लिए हम यहाँ नहीं बैठे हैं। इसलिए जी के न सही मर के हमारे पेट में चिकेन-65, टंगड़ी कबाब, चिकेन रोल, चिकेन पकौड़ा, चिकेन बिरयानी, चिकेन पफ बन जाओ और हमारी भूख मिटाओ। इसी में तुम्हारी भलाई होगी। मुर्गा तो ठहरा जीव। वह इंसानों की तरह धूर्त थोड़े न है कि ऐन वक्त पर पल्टी मारेगा। उन्हें जान देना पसंद है लेकिन अपने उसूलों से पलटना बिल्कुल नहीं। 

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उड़ते-उड़ते यह खबर गधों तक पहुँची। वे दौड़े-दौड़े इंसानों के पास पहुँचे। उन्होंने प्रस्ताव रखा कि अब जबकि मुर्गे पेट की भूख मिटा रहे हैं तो क्यों न हमें सुबह-सुबह जगाने की ड्यूटी ही दे दें। इंसानों को लगा यह प्रस्ताव तो ठीक है, लेकिन तुम सड़क पर खड़े ढेंचु-ढेंचु करोगे तो हमें सुनाई कैसे देगा? गधों ने कहा– आप हमें शहर के किसी सबसे ऊँची बिल्डिंग की छत पर चढ़ा दें। वहीं से हम ढेंचु-ढेंचु करके आप लोगों को जगा दिया करेंगे। इंसानों को यह प्रस्ताव अच्छा लगा। जैसे-तैसे उन्होंने गधों को शहर की सबसे ऊँची बिल्डिंग पर चढ़ा दिया। अब आए दिन ढेंचु-ढेंचु करने लगे। कुछ दिन तक सब कुछ ठीक-ठाक चला। 


अब इंसानों को कौन बताए कि गधे गिरगिट थोड़े न है, जो अपना रंग बदलेंगे। गधे तो गधे होते हैं। अब वे आए दिन समय-बेसमय ढेंचु-ढेंचु करने लगे। उन्हें बिल्डिंग की ऊँचाई से ढेंचु-ढेंचु करने में बड़ा मजा आने लगा। इंसानों की नींद हराम हो गयी। न उनसे सोए बनता था न जागते। करे तो क्या करें? आखिरकार फैसला किया कि शहर की बिल्डिंगों से इन्हें नीचे उतारा जाए। जब वे बिल्डिंगों की छत पर पहुँचे तो आँखें फटी की फटी रह गयी। उन्होंने जितने गधे छत पर छोड़ रखे थे, अब वह आबादी उनकी कल्पना से अधिक हो गयी थी। गधे इंसानों की तरह अपनों को धोखा नहीं देते। उनमें एकता बल अधिक होता है। यही कारण रहा कि उनकी संख्या में इतनी वृद्धि हो गयी कि उन्हें उतारना इंसानों के बस की बात नहीं रही। 

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इंसानों को अपने पास आया देख गधों ने कहा, कहीं हमें उतारने के बारे में सोच रहे हो तो यह ख्याल अपने दिमाग से निकाल दो। हमें उतारने से पहले हमें क्यों चढ़ाया इसके बारे में सोचो। अपनी करतूत के बारे में किसी से भी पूछ लो, सभी यही कहेंगे कि बिल्डिंग की छत पर चढ़ने वाले गधे नहीं, उन्हें चढ़ाने वाले गधे हैं। गधे जब तक जमीन पर हैं, तभी तक अच्छे लगते हैं। आसमान पर चढ़ जाएँ तो ये गधों के भी बाप बन जाते हैं। इतना सुनना था कि इंसान इतना सा मुँह लिए वापसी करने लगे। तभी गधों ने कहा– अब की बार हमें जो चढ़ा दिया, सो चढ़ा दिया। अगली बार यह गलती हरगिज न करना। आगे आने वाले चुनावों के बारे में सोचो। हाँ एक बात और चूँकि हम गधे हैं, ढेंचू-ढेंचू करने के सिवाय कुछ नहीं जानते, इसलिए बांग देने के लिए मुर्गा ही चुनना।   


डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त'

(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

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