जनता को किया वोटिंग से किनारा, विपक्ष ने नकारा, इस मुल्क के चुनाव को क्यों बताया जा रहा मजाक?

By अभिनय आकाश | Oct 06, 2025

एक ऐसा चुनाव जिसमें शायद किसी बदलाव की उम्मीद नहीं। सीरिया में संसदीय चुनाव हुए। देश के लंबे समय से निरंकुश नेता बशर अल-असद के विद्रोही आंदोलन के बाद सत्ता से बेदखल किए जाने के बाद ये पहला चुनाव है। असद वंश के 50 साल के शासन के दौरान, सीरिया में नियमित चुनाव होते थे जिनमें सभी नागरिक मतदान कर सकते थे। हालाँकि, असद के नेतृत्व वाली बाथ पार्टी का संसद पर दबदबा था और मतदान को व्यापक रूप से दिखावटी चुनाव माना जाता था। सीरिया के लोग चुनाव के बाद भी पूर्ण लोकतंत्र से चूक जाएँगे। सीरिया में हुए इस पहले चुनाव पर विवाद भी हो रहा है। वह इसलिए, क्योंकि यह लोकतांत्रिक तरीके से नहीं हो रहे हैं। इसमें जनता ने वोट नहीं डाला है। आलोचकों का कहना है कि इससे सत्ता के सीरिया के नए शासकों के हाथों में ही केंद्रित रहने की संभावना है। पीपुल्स असेंबली की अधिकांश सीटें जिलों के निर्वाचक मंडलों द्वारा चुनी जाएँगी, जबकि एक-तिहाई सीटों पर अंतरिम राष्ट्रपति अहमद अल-शरा नियुक्त होंगे। नई संसद भविष्य के चुनावों की तैयारी करते हुए 30 महीने का कार्यकाल पूरा करेगी। 

लोगों ने क्यों नहीं डाला वोट?

उम्मीद थी कि जब चुनाव होंगे तो जनता भी वोट डालेगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अंतरिम सरकार का कहना है कि लगभग 14 साल के गृहयुद्ध और व्यक्तिगत दस्तावेज़ों के नुकसान के कारण लाखों सीरियाई लोगों के विस्थापन के कारण, इस समय एक सटीक मतदाता सूची बनाना और लोकप्रिय वोट का आयोजन करना असंभव है। इसलिए अभी आम लोगों को वोटिंग का अधिकार नहीं मिला है। सीधे जनमत कराने की बजाय यह सीमित प्रक्रिया अपनाई गई है। आलोचकों ने लोकप्रिय वोट के अभाव को अलोकतांत्रिक बताया है, हालाँकि कुछ विश्लेषक सरकार के तर्क को सही मानते हैं। अरब रिफॉर्म इनिशिएटिव और चैथम हाउस के वरिष्ठ शोध अध्येता ने इस बात पर ज़ोर दिया कि निर्वाचकों के चुनाव के तरीके में स्पष्टता का अभाव है। उन्होंने कहा खासकर जब उपसमितियों और निर्वाचक मंडलों के चुनाव की बात आती है, तो कोई निगरानी नहीं होती, और यह प्रक्रिया संभावित रूप से हेरफेर की चपेट में है। उन्होंने आगे कहा कि चुनाव अधिकारियों ने बिना किसी स्पष्टीकरण के प्रकाशित सूचियों से नाम हटा दिए, जिससे आलोचनाएँ बढ़ गईं। 

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समावेशिता और प्रतिनिधित्व संबंधी चिंताएँ

संसद में महिलाओं या धार्मिक एवं जातीय अल्पसंख्यकों के लिए कोई निश्चित कोटा नहीं है। निर्वाचक मंडल के सदस्यों में महिलाओं की संख्या 20% होनी चाहिए, लेकिन इससे उम्मीदवारों या निर्वाचित सदस्यों के बीच समान प्रतिशत की गारंटी नहीं मिलती। सरकारी समाचार एजेंसी SANA के अनुसार, राष्ट्रीय चुनाव समिति के प्रमुख मोहम्मद ताहा अल-अहमद के हवाले से, अंतिम सूची में शामिल 1,578 उम्मीदवारों में से 14% महिलाएँ हैं। कुछ ज़िलों में, 30-40% महिलाएँ उम्मीदवार हैं, जबकि अन्य में एक भी नहीं है। स्वीडा और कुर्द-नियंत्रित क्षेत्रों को बाहर रखे जाने से अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व को लेकर चिंताएँ बढ़ गई हैं। हाल ही में हुई सांप्रदायिक हिंसा में अलावी और ड्रूज़ समुदायों के सैकड़ों नागरिक मारे गए हैं, जिनमें से कई की मौत सरकार से जुड़े लड़ाकों के हाथों हुई है।

असद की पार्टी और विद्रोही दोनों ने चुनाव को नकारा

हयात तहरीर अल-शाम (एचटीएस): उत्तर-पश्चिमी सीरिया में सक्रिय यह संगठन चुनावों को 'दमिश्क की सत्ता का नाटक' बता रहा है। उसका कहना है कि अंतरिम राष्ट्रपति अहमद अल-शरा की सरकार देश के वास्तविक प्रतिनिधित्व से कोसों दूर है, क्योंकि उसने जनता को वोट का अधिकार ही नहीं दिया। वहीं असद समर्थक गुट बशर अल-असद की पार्टी ने इसे 'कठपुतली चुनाव' कहा है। उनका आरोप है कि शरा सिर्फ पश्चिमी देशों की मदद से सत्ता में आया और अब वैधता साबित करने के लिए दिखावटी प्रक्रिया चला रहा है।

रूस-चीन और ईरान ने दिया समर्थन

रूस और चीनः दोनों देशों ने इन चुनावों को सीरिया की स्थिरता की दिशा में आवश्यक कदम बताया है। उनका कहना है कि युद्धग्रस्त देश में तुरंत जनमत संग्रह असंभव है, इसलिए अंतरिम संरचना ही व्यावहारिक विकल्प है। ईरान ने शरा सरकार को सीरिया के पुनर्निर्माण का केंद्र मानते हुए कहा कि चुनाव देश में राजनीतिक निरंतरता की गारंटी हैं और विपक्ष को समय के साथ शामिल किया जाएगा।

अब आगे क्या होगा? 

अभी भी पीपुल्स असेंबली की 32 सीटें खाली ही रहेंगी। वह इसलिए क्योंकि सीरिया के सुवैदा और उत्तर-पूर्वी प्रांत में वोटिंग नहीं हुई। इन प्रांतों में कुर्दिश लड़ाकों का दबदबा है। इसलिए अभी यहां वोटिंग नहीं करवाई गई है। कुल मिलाकर, 210 सीटों में से 178 सदस्यों के साथ सीरिया की सरकार चलेगी। सोमवार या मंगलवार तक चुनाव नतीजे घोषित कर दिए जाएंगे। नई संसद के लिए जिन सदस्यों को चुना जाएगा, उनका कार्यकाल 30 महीने का होगा। ऐसा इसलिए ताकि चुनाव तैयारियों के लिए समय मिल सके। बताया जा रहा है कि इसके बाद आम चुनाव कराए जा सकते हैं।

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