क्यों नहीं पहुंच पातीं सरकारें घरों की दहलीज तक?

By संजीव कुमार मिश्र | Jul 01, 2025

भारतीय राजनीति में महिलाओं के सशक्तीकरण की बातें खूब होती हैं। चुनावी घोषणापत्रों में उनके लिए वादे भी किए जाते हैं, परंतु चुनाव बीतते ही वायदों पर धूल की परत जम जाती है। शायद ही कोई जनप्रतिनिधि उनके दुख-दर्द को सुनने, उनकी अपेक्षाओं को समझने के लिए घर की दहलीज तक जाता हो? 

इस परिवर्तनकारी यात्रा में एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव 'महिला संवाद' कार्यक्रम है, जिसे विगत 18 अप्रैल से प्रदेश में ग्राम स्तर पर शुरू किया गया। यह पहल केवल एक सरकारी कवायद नहीं, बल्कि महिलाओं को केंद्र में रखकर सामाजिक बदलाव को गति देने का एक सशक्त माध्यम है। यह कार्यक्रम प्रदेश की बेटियों, माताओं और बहनों की आवाज़ को गंभीरता से सुनने, समझने और भविष्य की नीतिगत व प्रशासनिक पहलों को आकार देने का एक महत्त्वपूर्ण मंच बन गया है।

यह संतोष का विषय है कि अब तक 38 जिलों में 52,468 महिला संवाद कार्यक्रमों का सफल आयोजन हो चुका है, जिसमें कुल 1 करोड़ 13 लाख से अधिक महिलाओं ने उत्साह के साथ भाग लिया। यह संख्या इस बात का भी जीवंत प्रमाण है कि प्रदेश की महिलाएं अब अपनी आवाज उठाने और सरकार से सीधे जुड़ने को लेकर कितनी उत्सुक और जागरूक हैं। दरभंगा से लेकर पूर्वी चंपारण, मुजफ्फरपुर, पश्चिमी चंपारण, गया, पूर्णिया, समस्तीपुर, नालंदा और वैशाली तक, हर जगह महिलाओं ने बेबाकी से अपनी बात रखी है। उन्होंने नीति-निर्माताओं को यह समझने का अवसर दिया है कि महिला सशक्तीकरण की दिशा में आगे किन प्राथमिकताओं के साथ कदम बढ़ाए जाएं।

महिला संवाद की यह पृष्ठभूमि आकस्मिक नहीं है। नीतीश कुमार के कार्यकाल को ध्यान से देखें तो पता चलता है कि सबसे पहले, लड़कियों में शिक्षा की अलख जगाने पर ज़ोर दिया गया। जहां वर्ष 2000 के आसपास बिहार में लड़कियाँ सरकारी स्कूलों में कम जाती थीं, वहीं वर्ष 2006 में मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना की शुरुआत ने क्रांतिकारी परिवर्तन लाया। इस योजना ने लड़कियों को शिक्षा के लिए प्रेरित किया, जिससे वे दूर-दराज के गांवों से भी साइकिल चलाकर स्कूल पहुंचने लगीं। इसकी सफलता ने देश के अन्य राज्यों को भी इसे अपनाने के लिए प्रेरित किया।

शिक्षा के साथ-साथ महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए सरकारी नौकरियों में भी ऐतिहासिक कदम उठाए गए। वर्ष 2013 से पुलिस भर्ती में महिलाओं को 35 प्रतिशत आरक्षण दिया जा रहा है। 2016 से सभी प्रकार की सरकारी नियुक्तियों में महिलाओं को 35 प्रतिशत का आरक्षण दिया जा रहा है, और प्राथमिक शिक्षक नियोजन में तो 50 प्रतिशत आरक्षण देकर उन्हें सशक्त किया गया है। 

महिलाओं के सशक्तीकरण और गरीबी उन्मूलन में 'जीविका' स्वयं सहायता समूह का गठन भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। वर्ष 2006 में विश्व बैंक से ऋण लेकर शुरू की गई 'जीविका' ने ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक उन्नति के लिए वरदान साबित हुई है। मुख्यमंत्री द्वारा इन महिलाओं को दिया गया 'जीविका दीदी' नाम आज एक पहचान बन चुका है।

वर्तमान में, बिहार में 10 लाख 64 हजार स्वयं सहायता समूह काम कर रहे हैं, जिनसे 1 करोड़ 35 लाख से अधिक जीविका दीदियाँ जुड़ी हैं। जीविका से जुड़कर ये महिलाएं लघु उद्योगों और कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहित कर अपने और अपने समुदाय के जीवन स्तर में सुधार ला रही हैं। 

महिला संवाद: भविष्य के विकास का रोडमैप

'महिला संवाद' कार्यक्रम में प्रदेश की महिलाओं ने कई महत्त्वपूर्ण और व्यवहारिक मांगें रखी हैं, जो उनकी दूरदृष्टि और आकांक्षाओं को दर्शाती हैं। उनकी सबसे प्रमुख मांग स्वरोजगार से जुड़ी है, जिसमें स्वयं सहायता समूहों के लिए सस्ते ब्याज दरों पर ऋण और 'जीविका दीदी की रसोई' व 'जीविका दीदी हाट' जैसी पहल शामिल हैं। कृषि क्षेत्र में प्रखंड स्तर पर राइस मिलों की स्थापना, वेजिटेबल मार्ट, किसान सम्मान निधि में वृद्धि और कृषि आधारित उद्योगों की स्थापना की मांगें भी मुखरता से उठी हैं।

बुनियादी सुविधाओं के लिए 'जीविका भवन', लाइब्रेरी और पंचायत स्तर पर बैंकिंग सुविधाओं की मांग की गई है। सामाजिक सुधारों में शराबबंदी की तर्ज पर गुटखा, सिगरेट और तंबाकू पर पूर्ण प्रतिबंध, और सुरक्षा के लिए महिला पुलिस चौकी, हेल्प डेस्क तथा प्रखंड स्तर पर महिला थाना बनाने की मांगें भी प्रमुखता से रखी गई हैं। यह आशा की जाती है कि सरकार इन मांगों पर शीघ्रता से विचार कर अपेक्षित निर्णय लेगी।

यह संतोषजनक है कि बिहार सरकार की नीतियों और योजनाओं के कारण प्रदेश में महिला सशक्तीकरण का एक स्वर्णिम दौर शुरू हुआ है। 2005 से पूर्व और उसके बाद बिहार में आए इस सकारात्मक बदलाव को आज हर स्तर पर देखा और महसूस किया जा रहा है। आंकड़े स्वयं इसकी पुष्टि करते हैं: 93.11% महिलाएं आज खुद को ज्यादा सुरक्षित महसूस करती हैं, 91.73% घरों में घरेलू हिंसा कम हुई है, और 87.75% महिलाएं खुद को आर्थिक रूप से ज्यादा मजबूत मानती हैं।

आज बिहार में महिलाएं विभिन्न क्षेत्रों में अपनी लगन और मेहनत से अपना मुकाम बना रही हैं। यह बदलता बिहार है, जहाँ की बेटियां अब सिर्फ घर की चौखट के भीतर नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन और नीति-निर्माण में भी अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। विकसित बिहार के निर्माण में महिलाओं की यह बढ़ती भागीदारी न केवल प्रदेश के लिए बल्कि पूरे देश के लिए एक प्रेरणा है। यह एक स्पष्ट संकेत है कि जब महिलाओं को अवसर और मंच मिलता है, तो वे न केवल अपनी बल्कि पूरे समाज की तकदीर बदलने की क्षमता रखती हैं।

- संजीव कुमार मिश्र

वरिष्ठ पत्रकार

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