Iran के लिए दिन-रात आंसू बहाने वाले कश्मीरी नेताओं ने कभी पंडितों के साथ क्यों नहीं दिखाई हमदर्दी?

By नीरज कुमार दुबे | Mar 28, 2026

मीरवाइज उमर फारूक ने नयी दिल्ली में ईरान के राजदूत से मुलाकात कर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत पर शोक जताया और ईरान के साथ एकजुटता व्यक्त की। लेकिन सवाल यह है कि जब कश्मीरी पंडितों को घाटी से मार कर भगाया जा रहा था तब यह संवेदना कहां थी? तब अमन का पैगाम लेकर ये नेता सामने क्यों नहीं आए थे? क्या उस दौर में इंसानियत की जरूरत नहीं थी? क्या तब किसी प्रतिनिधिमंडल को कश्मीरी पंडितों के घरों तक जाने की फुर्सत नहीं मिली थी? सवाल उठता है कि क्यों आज अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर इतनी सक्रियता दिखती है, लेकिन अपने ही समाज के जख्मों पर सन्नाटा छा जाता है? क्या यह चयनात्मक संवेदनशीलता नहीं है? क्या एक धर्म विशेष के लिए ही एकजुटता दिखाना अब राजनीति का हिस्सा बन गया है?

इसे भी पढ़ें: यूएस शांति प्लान को ईरान द्वारा ठुकराए जाने के अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिक निहितार्थ क्या हैं?

जहां तक मीरवाइज के दिल्ली दौरे की बात है तो आपको बता दें कि श्रीनगर से कश्मीर के कई धार्मिक संगठनों का एक प्रतिनिधिमंडल नयी दिल्ली पहुंचा और ईरान के राजदूत से मुलाकात कर वहां के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत पर शोक जताया। इस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व मीरवाइज उमर फारूक कर रहे थे। उन्होंने न केवल संवेदना व्यक्त की, बल्कि ईरान के लोगों के साथ एकजुटता भी दिखाई। प्रतिनिधिमंडल ने अमेरिका और इजराइल पर आरोप लगाते हुए युद्ध की निंदा की और शांति बहाल होने की उम्मीद जताई।

असली सवाल यहीं से शुरू होता है। क्या यह वही कश्मीर नहीं है जहां कभी हजारों कश्मीरी पंडितों को अपने घर छोड़ कर भागना पड़ा था। क्या यह वही घाटी नहीं है जहां उनके कत्लेआम की खबरें आई थीं। तब यह धार्मिक संगठन, यह मौलाना, यह नेता कहां थे। तब अमन का संदेश क्यों नहीं दिया गया। तब किसी प्रतिनिधिमंडल ने पंडितों के आंसू पोंछने की कोशिश क्यों नहीं की?

मीरवाइज उमर फारूक और उनके साथियों ने ईरान के साथ गहरे सांस्कृतिक और धार्मिक रिश्तों की बात कही। उन्होंने कश्मीर को ईरान ए सगीर तक बताया। यह बयान बताता है कि उनकी सोच किस दिशा में झुकी हुई है। लेकिन क्या उन्हें यह याद नहीं कि कश्मीर की पहचान केवल किसी एक धर्म से नहीं, बल्कि उसकी विविधता से रही है। कश्मीरी पंडित उस पहचान का अभिन्न हिस्सा थे और हैं।

दिल्ली में ईरानी राजदूत से मिलना, संवेदना जताना, अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर बयान देना आसान है। लेकिन क्या कभी इन नेताओं ने दिल्ली या देश के अन्य हिस्सों में बसे कश्मीरी पंडितों की कॉलोनियों में जाकर उनसे मुलाकात की। क्या उन्होंने कभी उन्हें वापस घाटी आने का भरोसा दिलाया। अगर मीरवाइज सच में अमन का पैगाम देना चाहते, तो उन्हें सबसे पहले अपने घर के जख्म भरने चाहिए थे।

यह भी गौर करने वाली बात है कि कश्मीर में खामेनेई की मौत के बाद बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए, दान अभियान चलाए गए, लोगों ने पैसा, सोना, यहां तक कि मवेशी तक दान दिए। राजनीतिक नेताओं ने भी बढ़ चढ़ कर भाग लिया। महबूबा मुफ्ती, फारूक अब्दुल्ला जैसे बड़े नाम ईरानी दूतावास पहुंचे और अपनी संवेदना दर्ज कराई। यह सक्रियता बताती है कि एक खास मुद्दे पर कितनी तेजी से लामबंदी हो सकती है।

लेकिन यही सक्रियता कश्मीरी पंडितों के मामले में क्यों नहीं दिखी? क्यों उनके दर्द को नजरअंदाज किया गया? क्यों उनके लिए कोई बड़े स्तर का अभियान नहीं चला, यही वह सवाल है जो आज कश्मीर के नेतृत्व की नीयत और प्राथमिकताओं पर गहरे संदेह खड़े करता है।

सच यह है कि अमन का पैगाम चयनात्मक नहीं हो सकता। अगर आप सच में शांति चाहते हैं, तो आपको हर पीड़ित के साथ खड़ा होना होगा, चाहे वह किसी भी धर्म का हो। केवल एक धर्म विशेष के साथ एकजुटता दिखाना और दूसरे की पीड़ा को अनदेखा करना न तो नैतिक है और न ही स्वीकार्य।

आज जरूरत है कि कश्मीर के नेता आत्ममंथन करें। उन्हें यह समझना होगा कि असली परीक्षा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बयान देने में नहीं, बल्कि अपने ही समाज के घावों को भरने में है। जब तक कश्मीरी पंडितों की वापसी, उनकी सुरक्षा और उनके सम्मान की गारंटी नहीं होगी, तब तक अमन का हर दावा खोखला ही रहेगा।

-नीरज कुमार दुबे

प्रमुख खबरें

SEBI Order के खिलाफ SAT पहुंचे Zee Entertainment और Punit Goenka, बुधवार को होगी अहम सुनवाई

Lionel Messi को चैंपियन बनाने वाले पिता Jorge Messi का निधन, दिग्गज Rafael Nadal ने जताया गहरा शोक

Aston Villa छोड़ PSG लौटे Lucas Digne, 11 साल बाद फिर पहनेंगे पेरिस की जर्सी, 2029 तक हुआ Deal साइन

5 साल के फतेह ने Thailand में रचा इतिहास, Gatka on Skates में जीता World Martial Arts Games Gold Medal