Prabhasakshi NewsRoom: Mohan Bhagwat ने क्यों कहा, ''BJP के अच्छे दिन RSS की वजह से आये''?

By नीरज कुमार दुबे | Feb 09, 2026

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने मुंबई में दिए अपने संबोधन में ऐसे कई मुद्दों पर विचार रखे जिनका असर राजनीति, समाज और जनचर्चा, तीनों पर देखा जा रहा है। मुंबई में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने भाजपा, समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी, संघ के नेतृत्व, जाति के सवाल और हिंदुत्व और सनातन संस्कृति तक पर खुलकर विचार रखे। उनके वक्तव्य को संघ और भाजपा के रिश्तों के संदर्भ में खास महत्व दिया जा रहा है।

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उनका यह बयान इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा था कि भाजपा चुनाव जीतने के लिए संघ पर निर्भर नहीं है। उस समय इस बयान को भाजपा की आत्मनिर्भर छवि गढ़ने की कोशिश के रूप में देखा गया था। लेकिन लोकसभा चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन उम्मीद के अनुसार नहीं रहा था। कई राजनीतिक जानकारों ने तब कहा था कि जमीनी स्तर पर संघ के कार्यकर्ता तंत्र की सक्रियता पहले जैसी नहीं दिखी। हालांकि बाद में संबंधों में सुधार देखा गया और गलतफहमी दूर कर संघ और भाजपा ने ऐसा समन्वय बनाया कि तब से अधिकांश विधानसभा चुनावों में भाजपा को शानदार जीत मिली है। ऐसे माहौल में भागवत का यह कहना कि भाजपा के अच्छे दिन संघ के सहयोग से आए, एक तरह से नड्डा के बयान का अप्रत्यक्ष जवाब माना जा रहा है। यह एक तरह से संदेश भी है कि संघ और भाजपा का रिश्ता केवल औपचारिक नहीं बल्कि गहरे सामाजिक आधार पर टिका है।

भागवत ने समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी पर भी संतुलित रुख दिखाया। उन्होंने कहा कि यूसीसी ऐसा विषय है जिसे समाज के हर वर्ग से बात करके, भरोसा बनाकर और सुझाव लेकर आगे बढ़ाना चाहिए। कोई भी कानून ऐसा न हो जिससे समाज में दूरी या मतभेद बढ़ें। उनका जोर इस बात पर रहा कि कानून थोपने से नहीं, समझाने और साथ लेकर चलने से टिकाऊ बनते हैं। इस बयान को उन आशंकाओं के बीच महत्वपूर्ण माना जा रहा है जिनमें कुछ लोग यूसीसी को लेकर डर या भ्रम जताते हैं। भागवत का संदेश यह था कि समाज की एकता सबसे ऊपर है।

साथ ही संघ के भीतर नेतृत्व और जाति के सवाल पर भी उन्होंने साफ शब्दों में बात की। उन्होंने कहा कि संघ में किसी पद के लिए जाति आधार नहीं होती। वहां व्यक्ति की सोच, समर्पण और काम को महत्व दिया जाता है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि वह संघ प्रमुख के पद पर तब तक रहेंगे जब तक संगठन चाहेगा। यह बात संघ की आंतरिक परंपरा को दिखाती है जहां पद से अधिक दायित्व और संगठन की इच्छा को महत्व दिया जाता है।

इस कार्यक्रम का एक दिलचस्प पहलू यह भी रहा कि इसमें फिल्म जगत के कई जाने पहचाने लोग मौजूद थे। संघ प्रमुख को सुनने के लिए फिल्म जगत से जुड़े लोगों की उपस्थिति ने कई लोगों का ध्यान खींचा। यह इस बात का संकेत भी माना गया कि संघ अब अपने संवाद का दायरा बढ़ा रहा है और समाज के अलग अलग क्षेत्रों तक पहुंच बनाना चाहता है।

इसी दौरान भागवत ने युवाओं और फैशन पर हल्की मगर अर्थपूर्ण टिप्पणी भी की। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि आज के युवा अक्सर देखते हैं कि सलमान खान क्या पहनते हैं और उसी तरह का स्टाइल अपनाते हैं। इस टिप्पणी में एक संदेश छिपा था कि समाज में आदर्श केवल किताबों या भाषणों से नहीं बनते, लोकप्रिय चेहरे भी युवाओं को प्रभावित करते हैं। इसका मतलब यह भी निकाला गया कि जो लोग समाज में प्रभावी रूप में दिखते हैं, उन पर कई जिम्मेदारी भी होती है।

देखा जाए तो मोहन भागवत के बयान कई स्तर पर संकेत देते हैं। पहला, संघ और भाजपा के रिश्ते को लेकर उन्होंने यह साफ कर दिया कि दोनों के बीच का संबंध विचार और कार्यकर्ता आधार पर बना है। भाजपा यदि राजनीतिक सफलता चाहती है तो उसे उस सामाजिक आधार को समझना होगा जिसे संघ ने खड़ा किया है। दूसरा, यूसीसी जैसे संवेदनशील मुद्दे पर उनका समावेशी रुख बताता है कि संघ की ओर से भी यह समझ है कि विविध समाज में संवाद जरूरी है। तीसरा, जाति से ऊपर उठकर नेतृत्व की बात करना दिखाता है कि संघ खुद को बदलते समाज के साथ जोड़कर देखना चाहता है।

साथ ही हिंदू और हिंदुत्व की परिभाषा भी संतुलित रूप से सामने रख कर संघ प्रमुख ने समाज को एकजुट करने का शानदार प्रयास किया है। वीर सावरकर के लिए भारत रत्न की बात कर उन्होंने एक तरह से राष्ट्र की इच्छा का प्रकटीकरण भी किया।

कुल मिलाकर भागवत का संबोधन केवल संगठनात्मक भाषण नहीं था, बल्कि यह राजनीतिक संदेश, सामाजिक संकेत और सांस्कृतिक समझ का मिश्रण था। इससे यह भी जाहिर होता है कि आने वाले समय में संघ अपनी भूमिका को केवल पृष्ठभूमि तक सीमित नहीं रखना चाहता, बल्कि विचार स्तर पर दिशा देने वाला केंद्र बने रहना चाहता है।

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