अपने विधायकों को No Network Zone में क्यों ले गये थे Omar Abdullah? Dachigam Secret Meeting में कौन-सी राजनीतिक खिचड़ी पकाई गयी?

By नीरज कुमार दुबे | Jun 05, 2026

आखिर जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला अपने विधायकों, सांसदों और मंत्रियों को नो नेटवर्क जोन में क्यों ले गए थे? यह सवाल इन दिनों कश्मीर की राजनीति में सबसे ज्यादा चर्चा में है। दाचीगाम राष्ट्रीय उद्यान में हुई यह गोपनीय बैठक केवल सरकार के कामकाज की समीक्षा भर नहीं थी, बल्कि नेशनल कान्फ्रेंस के भीतर बढ़ते असंतोष, राज्य का दर्जा बहाल होने में हो रही देरी और राजनीतिक अधिकारों को लेकर गहराती बेचैनी पर मंथन की कोशिश थी। श्रीनगर से करीब 22 किलोमीटर दूर स्थित इस इलाके को बैठक के लिए चुनना भी अपने आप में राजनीतिक संदेश माना जा रहा है।

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दरअसल नेशनल कान्फ्रेंस के भीतर यह भावना लगातार मजबूत हो रही है कि जनता ने जिस उम्मीद के साथ पार्टी को सत्ता सौंपी थी, वह पूरी नहीं हो रही। अक्टूबर 2024 में सरकार बनने के बाद से राज्य का दर्जा बहाल कराने और विशेष अधिकारों की बहाली को लेकर कोई ठोस प्रगति दिखाई नहीं दी। पार्टी के कई नेता खुलकर यह कहने लगे हैं कि सरकार अपने राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने में नाकाम रही है।

सबसे मुखर आवाज श्रीनगर से सांसद आगा रुहुल्ला मेहदी की रही है। उन्होंने खुलकर उमर अब्दुल्ला पर जनादेश से विश्वासघात करने का आरोप लगाया और यहां तक कह दिया कि मुख्यमंत्री को माफी मांगकर इस्तीफा दे देना चाहिए। दिलचस्प बात यह रही कि उन्हें इस रणनीतिक बैठक में बुलाया ही नहीं गया। इससे साफ संकेत मिलता है कि पार्टी के भीतर मतभेद अब निजी नाराजगी की सीमा पार कर राजनीतिक टकराव का रूप लेने लगे हैं।

बैठक ऐसे समय हुई जब विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी लगातार यह दावा कर रहे हैं कि नेशनल कान्फ्रेंस के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है। विधानसभा में विपक्ष के नेता सुनील शर्मा ने तो इसे मुख्यमंत्री का शक्ति परीक्षण तक बता दिया। उनका कहना है कि उमर अब्दुल्ला यह परखना चाहते थे कि पार्टी विधायक अभी भी उनके साथ खड़े हैं या नहीं।

बैठक में शामिल एक विधायक के बयान ने जम्मू-कश्मीर की मौजूदा सत्ता व्यवस्था की वास्तविकता को उजागर कर दिया। उनका कहना था कि निर्वाचित सरकार की हालत ऐसी कर दी गई है कि वह एक पटवारी तक का तबादला नहीं कर सकती। राजस्व विभाग सरकार के अधीन होने के बावजूद प्रशासनिक नियंत्रण व्यवहार में कहीं और है। यह बयान उस राजनीतिक हताशा का प्रतीक है जो नेशनल कान्फ्रेंस के भीतर तेजी से फैल रही है।

दाचीगाम बैठक का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष संसद के मानसून सत्र के पहले दिन नई दिल्ली में प्रदर्शन करने का निर्णय रहा। पार्टी ने साफ संकेत दिया है कि अब वह राज्य का दर्जा बहाल कराने के मुद्दे को सड़क से संसद तक ले जाएगी। नेशनल कान्फ्रेंस प्रवक्ता तनवीर सादिक ने कहा कि पार्टी अब इस अभियान को और तेज करेगी। इससे स्पष्ट है कि उमर अब्दुल्ला अब टकराव से बचने की बजाय दबाव की राजनीति की राह पर आगे बढ़ सकते हैं।

उधर, मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के हालिया बयान भी इसी दिशा की ओर इशारा करते हैं। मई में एक कॉलेज कार्यक्रम में उन्होंने कहा था, "मुझ पर भरोसा रखिए, मैं बादल फटने की तरह फटना चाहता हूं।" उस वक्त इस टिप्पणी को प्रतीकात्मक माना गया था, लेकिन अब दाचीगाम बैठक के बाद यह बयान राजनीतिक चेतावनी जैसा लगने लगा है। देखा जाये तो इस पूरे घटनाक्रम के कई राजनीतिक निहितार्थ हैं। पहला, नेशनल कान्फ्रेंस अब केंद्र सरकार के प्रति नरम रुख से हटकर अधिक आक्रामक राजनीति की ओर बढ़ सकती है। दूसरा, पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर असहमति बढ़ने पर आने वाले समय में आंतरिक चुनौती और तेज हो सकती है। तीसरा, यदि राज्य का दर्जा बहाल करने का मुद्दा फिर से जन आंदोलन का रूप लेता है तो जम्मू-कश्मीर की राजनीति में नया ध्रुवीकरण देखने को मिल सकता है।

बहरहाल, उमर अब्दुल्ला के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह अपनी पार्टी के भीतर भरोसा बनाए रखें और जनता को यह विश्वास दिलाएं कि उनकी सरकार केवल प्रशासन चलाने तक सीमित नहीं, बल्कि राजनीतिक अधिकारों की बहाली के लिए भी गंभीर है। दाचीगाम की यह बैठक दरअसल एक सैर नहीं, बल्कि जम्मू-कश्मीर की राजनीति में आने वाले नए संघर्ष की भूमिका साबित हो सकती है।

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