Gyan Ganga: अंगद को देखकर आखिर राक्षसों का गला क्यों सूख गया था?

By सुखी भारती | May 02, 2023

वीर अंगद लंका नगरी में अपने कदम रख चुके हैं। उनके कदम की धमाल क्या है, यह तो अभी प्रत्यक्षदर्शीयों को पता चलनी थी। वीर अंगद ने सर्वप्रथम तो चारों और सूर्य के समान धधकती अपनी आँखों को घुमाया। उन्होंने देखा, कि रास्ते में ही रावण का एक बेटा उनके सामने आ गया। यह तो उसका दुर्भाग्य ही माना जायेगा, कि उसके समक्ष बालिपुत्र अंगद नहीं, अपितु साक्षात उसका काल आ गए थे। वीर अंगद के लंका प्रवेश की सूचना, रावण तक कैसे अच्छे से पहुँचे, इसका तरीका वीर अंगद ने बड़ा विलक्षण ढूँढ़ लिया था। जी हाँ, रावण का बेटा तो वीर अंगद से झगड़ता, अथवा पता नहीं, न भी झगड़ता, लेकिन सामने से वीन अंगद स्वयं ही रावण के बेटे से भिड़ गए। दोनों का झगड़ा पलक झपकते ही इतना बढ़ गया, कि दोनों में हाथापाई हो गई। वीर अंगद को तो मानों बहाना चाहिए था। उन्होंने रावण के बेटे को पकड़ा, और घुमा कर धरती पर पटक दिया। भले ही रावण का बेटा भी युवा और बड़ा भारी योद्धा था, लेकिन यह पटकनी वह सह नहीं पाया। जी हाँ, धरा पर अब रावण का बेटा नहीं, अपितु उसका मृत शरीर पड़ा था। जैसे ही वहाँ राक्षसों के समूहों ने यह दृश्य देखा, तो वहाँ भगदड़-सी मच गई। सब राक्षस यहाँ-तहाँ भागने लगे। वे इस प्रकार से घबराये कि वे मदद के लिए किसी को पुकार भी नहीं पा रहे थे। वीर अंगद के आने की दहशत, पूरी लंका नगरी में वनों की आग की भाँति फैल गई। रावण तो अपनी सभा में था। लेकिन नगर में एक विचित्र से शौर की भनक उसे भी हो रही थी। पूरी लंका नगरी में कोई किसी को कुछ भी नहीं बतला रहा था। सब होठों से तो चुप थे, लेकिन भयक्रांत आँखों से सब बता रहे थे। लेकिन यह ख़बर छुपने वाली भला कहाँ थी। सब ओर यह कोलाहल मच गया, कि अरे! भागो-भागो, क्योंकि लंका में वही वानर फिर से घुस आया है, जिसने पहले लंका को जला कर भस्म कर दिया था-


‘एक एक सन मरमु न कहहीं।

समुझि तासु बध चुप करि कहहीं।।

भयउ कोलाहल नगर मझाराी।

आवा कपि लंका जेहिं जारी।।’


राक्षसों में वीर अंगद जी का ऐसा भय व्याप्त हो गया, कि सब मन ही मन विचार करने लगे, कि विधाता अब न जाने क्या करेगा। वे बिना पूछे ही, वीर अंगद को रावण के दरबार का पता बता देते। मार्ग में वीर अंगद जिसे भी अपनी तेजस्वी दृष्टि से देख लेते, वह वहीं सूख जाता। सूखना तो बनता ही था। कारण कि श्रीहनुमान जी के प्रताप व उनके लंका दहन की याद अभी भी वे भूले नहीं थे। सबके मन में भय था, कि पिछली बार तो जो वानर आया था, वह तो फिर भी ठीक था। कारण कि उसने लंका में घुसने के बहुत समय पश्चात, रावण के पुत्र अक्षय कुमार का वध किया था। लेकिन यह वानर तो अपनी लंका यात्रा का आरम्भ ही रावण पुत्र के वध से कर रहा है। विधाता जानें अब लंका में क्या होने वाला है। शीघ्र ही वीर अंगद रावण की सभा के द्वार पर खड़े थे। धीर, वीर और बल की राशि वीर अंगद वहाँ सिंह की भाँति निर्भीक खड़े, वहाँ चारों ओर झाँक रहे थे। वहाँ उपस्थित एक भी राक्षस में ऐसा साहस नहीं था, कि वीर अंगद को कुछ पूछ ही पाता, कि बताओ तुमने रावण पुत्र को क्यों मारा। सबको बस एक ही भय सताये जा रहा था, यह वानर तो मानों आया ही सीधा रावण से लड़ने के लिए है। हम इससे उलझ कर नाहक ही अपने प्राणों से च्यूत क्यों हों? सामने आये बवंड़र से जितना बचा सके, उतना ही श्रेयस्कर है। अब प्रश्न तो यह था, कि रावण को भीतर जाकर कौन बताये, कि उसके झूठे ऐश्वर्य की धज्जियाँ उड़ाने वाला बाहर आ थमा है। वीर अंगद ने वहीं एक राक्षस को कहा, कि जाओ, रावण को मेरे आने का संदेशा दो। राक्षस ने रावण को जब कहा, कि बाहर एक वानर आये हैं। तो एक बार के लिए तो रावण भी सोच में पड़ गया। कारण कि, यह वाला वानर, पहले वाले वानर से भिन्न प्रतीत हो रही है। क्योंकि पहले वाले वानर को तो हम बँधी बना कर लाये थे। और यह वाला वानर तो सीधे हमीसे मिलने आन पहुँचा। ऊपर से इसने तो मेरे एक पुत्र को भी मार डाला। निश्चित ही इसकी मंशा मेरे हित की नहीं है। रावण ने सोचा, कि अगर उसका सामना नहीं करता, तो मेरा उपहास होगा। तब रावण पहले तो हँसा, फिर बोला, कि अच्छा ले आओ, देखें तो कहाँ का बँदर है। रावण से कोई पूछने वाला हो, कि भई कहाँ का बंदर होने का क्या अर्थ है। क्या उसे नहीं पता, कि वह तो निश्चित ही श्रीराम जी का वानर है। तो ऐसे बोलने का क्या अर्थ? वास्तव में खिसिआनी-सी हँसी कर, वह अपने भीतर पल रहे भय को छुपाने का प्रयास कर रहा है।

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रावण का आदेश पाकर राक्षस, वीर अंगद को लिवाने आन पहुँचा। कई राक्षसों के बीच, वीर अंगद ऐसे चल रहे हैं, मानों सौ भेड़ियों के बीच एक मतवाला हाथी चलता है। वीर अंगद जैसे ही रावण की सभा में पहुँचे, तो एक और ऐसी घटना घटी, जिसने रावण को क्रोधित कर डाला। जी हाँ, घटना यह घटी, कि वीर अंगद जैसे ही रावण की सभा में दाखिल हुए, सभी सभासद् अपने-अपने स्थान पर खड़े हो गए। कोई उन्हें पूछने वाला हो, कि भई वीर अंगद कोई रावण के मित्र थोड़ी न हैं, जो तुम लोग उनके सम्मान में खड़े हो रहे हो। लेकिन श्रीराम जी हैं ही ऐसे, कि उन्हें रावण की सभा में भले ही सम्मान न मिले, लेकिन वे अपने दूत को अवश्य सम्मान दिलाते हैं। इसीलिए रावण क्रोधित हो गया-


‘गयउ सभाँ मन नेकु न मुरा।

बालितनय अतिबल बाँकुरा।।

उठे सभासद कपि कहुँ देखी।

रावन उर भा क्रोध बिसेषी।।’


वीर अंगद को बैठने के लिए, रावण ने तो आसन देना ही नहीं था। इसलिए वीर अंगद मन ही मन श्रीराम जी को प्रणाम करके, स्वयं अपना आसन लगा कर बैठ गए। आगे रावण से वीर अंगद की क्या वार्ता होती है, जानेंगे अगले अंक में---(क्रमशः)---जय श्रीराम।


- सुखी भारती

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