Gyan Ganga: भगवान श्रीराम ने स्वयं सुग्रीव का राज्याभिषेक क्यों नहीं करवाया

By सुखी भारती | Jun 03, 2021

भगवान श्रीराम के आदेशानुसार सुग्रीव को राज पद् से अलंकृत कर दिया गया और यह समस्त क्रिया-कलाप सम्पन्न हुए श्री लक्ष्मण जी के दिशा निर्देशन में। यहां एक जिज्ञासा निश्चित ही चिंतन का विषय है, कि श्रीराम जी ने यह कार्यभार श्रीलक्ष्मण जी को ही क्यों दिया? श्रीराम जी ने स्वयं अपने करकमलों से यह ऐतिहासिक क्षण को मूर्त रूप क्यों नहीं दिया? इसके पीछे निश्चित ही कोई विशेष लीला छुपी होगी। वास्तव में श्रीलक्ष्मण जी वैराग्य का अवतार हैं। और वैराग्य के द्वारा किसी जीव को राज गद्दी पर बिठाना, अपने आप में एक गहरा संदेश समेटे हुए है। श्रीराम जी का उद्देश्य समाज को मात्र कोई अच्छी समाजिक व्यवस्था देना ही नहीं है, अपितु एक सुंदर आत्मिक अवस्था देना भी है। श्रीराम जी ने देखा कि सुग्रीव को भले ही राज पद मिल रहा है। लेकिन साधक जीवन के लिए यह पद् कोई कांटों के ताज से कम नहीं होता है। कारण कि पद् के साथ मद् न आये ऐसा हो ही नहीं सकता-

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‘नहिं कोउ अस जनमा जग माहीं।

प्रभुता पाई जाहि मद नाहीं’।।


केवल राज सिंघासन पर बैठने मात्र से तो राज करना नहीं आ जाता। क्योंकि राज सिंघासन पर बैठे राजा की मन की सुंदर अवस्था ही, सुंदर व्यवस्था का परिचायक होती है। न्याय व अन्याय का निर्णय करने के लिए कठोर मन, स्थिर बुद्धि व श्रेष्ठ आत्मिक चिंतन की आवश्यक्ता होती है। जिस राजा के पास यह तीनों गुण नहीं हैं, उसका राज्य कब छिन जाये, कुछ पता नहीं है। जो राजा यह मिथ्या धारणा से पीड़ित है कि प्रजा जनों पर राज करना उसका जन्म सिद्ध अधिकार है, वह राजा यह जानता ही नहीं, कि राजा का प्रथम कर्तव्य ही यह है कि वह प्रजा की सेवा करे, न कि प्रजा पर राज करे। प्रजा के मन को अगर जीतना है, तो अपने आदेशों, अधिकारों व सामर्थ्य के बल से कभी भी नहीं जीता जा सकता। अपितु प्रजा के समक्ष अपने अहंकार को हराकर व प्रजा का हित सर्वोपरि रखकर ही, प्रजा के मन को जीता जा सकता है। अन्य कोई रास्ता नहीं है, जिस राजा को यह ज्ञान हो गया, कि राजपद् मुझे दूसरों पर शासन करने को नहीं, अपितु स्वयं पर करने को मिला है, वास्तव में वही राजा श्रेष्ठ है। शासन तभी सुंदर आकार लेता है, जब ‘शासन’, ‘अनुशासन’ से प्रेरित हो, और अनुशासन सीधे-सीधे जुड़ा होता है राजा के त्याग, तपस्या व निष्पक्षता से।

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श्रीराम जी की यह दृढ़ भावना व इच्छा है, कि मैं जिसे राजा बनते देखुं, उसकी आधारशिला वैराग्य से सिंचित व अभिभूत हो। क्योंकि संसार की माया उसे ही प्रभावित करती है, जिसे संसार के विषयों से वैराग्य न हो। वैराग्य वह कवच है, जिसके समक्ष इस जगत के समस्त विषय निष्प्रभावी सिद्ध होते हैं। श्रीलक्ष्मण जी क्योंकि वैराग्य के अवतार हैं। और किसी राजा का राजतिलक वैराग्य के द्वारा हो, तो भला इससे बढ़कर सौभाग्य का विषय और क्या हो सकता है? वानर जाति तो वैसे भी अतिअंत चंचल व विषयों के आधीन मानी जाती है। ऐसे में सुग्रीव को भला, कैसे इन विकारों की बस्ती में अकेला छोड़ा जा सकता था? सो प्रभु ने श्री लक्ष्मण जी को यह जिम्मा सौंपा कि हे प्रिय अनुज! मैं चाहता हूँ कि सुग्रीव के राजतिलक में अगर आपके वैराग्य का मिश्रण रहेगा, तो सुग्रीव के लिए अधिक हितकारी रहेगा। यहाँ जिज्ञासा जन्म लेती है, कि श्रीराम जी वैराग्य को इतनी प्राथमिक्ता क्यों दे रहे हैं? सज्जनों केवल श्रीराम जी ही नहीं, अपितु समस्त महापुरूषों ने ही वैराग्य को प्रथम श्रेणी में रखा है। भगवान श्रीकृष्ण जी भी, जब अर्जुन को गीता का उपदेश दे रहे हैं, तो वे भी स्वीकार करते हैं, कि मन की चंचलता को जीतना निःसंदेह अतिअंत दुश्कर कार्य है। लेकिन निरंतर अभ्यास व वैराग्य से इस मन को जीता जा सकता है-


‘असंशयंमहाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।

अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्येते’।।


वैराग्य शब्द का अर्थ ही यह है जिसमें कोई राग ना हो। रास-रंग से सर्वदा विलग हो, जो जिज्ञासु जन बैरागी हो जाते हैं, उनके लिए यह मान लिया जाता है, कि इन्हें अब सांसारिक विषयों से कोई सरोकार नहीं है। बैरागी अवस्था को एक और नाम से संबोधित किया जाता है, जिसे हम ‘विरक्त’ के नाम से जानते हैं। विरक्त का अर्थ होता है, जो रक्त से हीन हो। वह चाम जिसमें रक्त का प्रवाह हो, अर्थात जिसमें जीवन प्राण वायु प्रवाहित हो, उसमें विषयों का प्रवाह भी निश्चित ही होगा ही। लेकिन जिसमें रक्त प्रवाह ही नहीं, अर्थात जो मृत है, तो उसमें भला विषयों का क्या संचार होगा। और उसकी समाज को हानि भी, लगभग शून्य ही होगी। महापुरूषों ने कहा, कि जीते जी ही जो स्वयं को मृत के समान बना लेता है। अर्थात रक्त प्रवाह के दुष्परिणामों से रहित हो जाता है। वही ‘विरक्त’ अथवा ‘बैरागी’ कहलाता है। इनकी यही विशेषता होती है, कि वे वैराग्य को विषयों के प्रति ढाल की तरह प्रयोग करते हैं। रणक्षेत्र में योद्धायों के पास जो ढाल होती है, उसका निर्माण भी कुछ ऐसे ही किया जाता है। ढाल में चमड़े का प्रयोग किया जाता है। चमड़ा भी वह जिसमें रक्त पूर्णतः सूख रखा हो। रक्त की रत्ती भर मात्र भी उस चमड़े को एक अच्छी ढाल में परिर्वतित होने में बाधा डाल सकती है। पूर्ण रक्त विहीन चमड़े की ढाल ही उत्तम मानी जाती है। गैंडे की खाल को भी इसीलिए अच्छा माना जाता है, क्योंकि गैंडे की खाल सूखने पर, रक्त की शून्य मात्र भी अपने भीतर नहीं रखती। योगी जन वैराग्य को अपनी ढाल बना विषयों से स्वयं को सुरक्षित रखते हैं। वास्तव में यही सुखों का सार भी है। संसार में रहते हुए, संसार के विकारों से मुक्त रहना, और प्रभु में सदैव अनुरक्त रहना, यही योगी, बैरागी अथवा विरक्त होने की वास्तविक परिभाषा है। महापुरूषों ने जीव को ऐसे ही जीने का उपदेश दिया है। गुरबाणी में भी वर्णन है-


‘जैसे जल महि कमलु निरालमु मुरगाई नै साणै।।

सुरति सबदि भव सागरू तरीऐ नानक नामु वखणै’।।


अर्थात् जल में कमल के खिलने की प्रक्रिया जीवन के महान सूत्र को समेटे हुए हैं। कमल का उदय कीचड़ में होता है। वह वहीं पलता बढ़ता है। कीचड़ से ही अपना पोषण लेता है। लेकिन उसमें स्वच्छ व पावन रहने की कला ऐसी है कि कमल कभी भी कीचड़ से मलिन नहीं होता। क्योंकि ज्यों-ज्यों कीचड़ का स्तर ऊँचा उठता है, वैसे-वैसे कमल भी स्वयं को ऊँचा उठा लेता है। दूसरा उदाहरण महापुरूष मुरगाबी अर्थात जल में रहने वाली मुर्गी का देते हैं। जल मुर्गी रहती तो पानी में ही है, पानी में डुबकियां भी खूब लगाती है। लेकिन तब भी उसके पंख सदैव सूखे ही रहते हैं। ठीक ऐसे ही मनुष्य भी भले ही संसार में विचरण करे, लेकिन तब भी अगर वह निरंतर प्रभु के भाव में रंगा रहे तो वह सही मायनों में योगी है, बैरागी है व विरक्त है। और श्रीराम जी सुग्रीव में ऐसे ही व्यक्तित्व की रचना करना चाहते हैं।


इसके पश्चात् श्रीराम जी सुग्रीव को स्वयं भी उपदेश करते हैं। क्या है वह उपदेश? जानेंगे अगले अंक में---(क्रमशः)--- जय श्रीराम!


-सुखी भारती

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